जैन परंपरा में लोक और ईश्वर (Folk and God in Jain Tradition)

विश्व, जगत् अथवा संसार के लिए जैन परंपरा में सामान्यरूप से लोक शब्द का व्यवहार हुआ है। जैन साहित्य में लोक का दो रूप मिलता है। कहीं पर पंचास्तिकाय को लोक कहा गया है तो कहीं पर षड्द्रव्य को लोक माना गया है।

व्याख्याप्रज्ञप्ति (भगवतीसूत्र) में एक स्थान पर बताया गया है कि लोक पंचास्तिकायरूप है। पंचास्तिकाय हैं- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय। प्रवचनसार में लोक का स्वरूप बताते हुए कहा गया है कि जो आकाश पुद्गल और जीव से संयुक्त है तथा धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और काल से भरा हुआ है वह लोक है।

सामान्यतः लोक में छः तत्त्व हैं- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल। इस प्रकार लोक इन छः तत्त्वों का समुच्चय है। इनके अतिरिक्त लोक कुछ नहीं है। ये छः तत्त्व अनादि-अनंत हैं। ये छः तत्त्व स्वतः सत् हैं। इनको न किसी ने बनाया है और न कोई मिटा सकता है। ये हमेशा से हैं और हमेशा रहेंगे। इनमें सदैव परिवर्तन होते रहते है किंतु ये सर्वथा नष्ट नहीं होते। इनकी न एकदम नई उत्पति ही होती है और न सर्वथा विनाश ही। अपनी उत्पत्ति, विनाश और स्थिरता के लिए ये स्वयं उत्तरदायी हैं, अन्य कोई शक्ति नहीं।

विश्व का आकार नियत एवं अपरिवर्तनीय है। इसके नाप के लिए रज्जु का आधार लिया जाता है। विश्व की ऊँचाई चौदह (14) रज्जुप्रमाण है। चौड़ाई उत्तर-दक्षिण में सात रज्जु है। पूर्व-पश्चिम में सबसे नीचे सात रज्जु है, फिर क्रमशः घटते-घटते ठीक मध्य भाग में अर्थात् सात रज्जु की ऊँचाई पर एक रज्जु रह जाती है। फिर धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते शेष अर्धभाग के मध्य में पाँच रज्जु हो जाती है, फिर क्रमशः घटते-घटते सबसे ऊपर एक रज्जु रह जाती है। विश्व का घनाकार नाप तीन सौ तैतालिस (343) रज्जुप्रमाण है। यह दिगंबर-मत है।

श्वेतांबर मत के अनुसार उत्तर-दक्षिण व पूर्व-पश्चिम दोनों ओर की चौड़ाई क्रमशः घटती-बढ़ती है, किंतु विश्व का घनाकार नाप तीन सौ तैतालिस (343) रज्जुप्रमाण ही रहता है।

लोक तीन भागों में विभक्त है- अधः, मध्य और ऊर्ध्व। अधोभाग मेरुपर्वत के समलत से नौ सौ योजन नीचे से प्रारंभ होता है। समतल से नौ सौ योजन ऊँचे से ऊर्ध्वभाग शुरू होता है। ऊर्ध्वलोक से नीचे और अधोलोक से ऊपर अठारह सौ योजन का मध्यभाग अर्थात् मध्यलोक स्थित है। ऊर्ध्वलोक आकार में पखावज के समान है।

अधोलोक का आकार औंधे किए हुए शराव के समान है अर्थात् नीचे-नीचे विस्तीर्ण है। मध्यलोक थाली के समान गोलाकार है अर्थात् समान लम्बाई- चौड़ाई वाला है।

अधोलोक में नारकियों का निवासस्थान है जबकि मध्यलोक में मानव और तिर्यंच रहते हैं। ऊर्ध्वलोक में वैमानिकदेव रहते हैं जो कल्पोपपन्न और कल्पातीत होते हैं।

लोक चार प्रकार से जाना जाता है- द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से और भाव से। द्रव्य की अपेक्षा से लोक एक है और सांत है।

क्षेत्र की अपेक्षा से लोक असंख्यात योजन कोटाकोटि विस्तार और असंख्यात योजन कोटाकोटि परिक्षेप प्रमाण है। इसलिए क्षेत्र की अपेक्षा से लोक सांत है।  काल की अपेक्षा से कोई काल ऐसा नहीं जब लोक न हो, अतः लोक ध्रुव है, नित्य है, शाश्वत है, अक्षय है, अव्यय है, अवस्थित है। भाव की अपेक्षा से लोक के अनंत वर्णपर्याय, गन्धपर्याय, रसपर्याय, स्पर्शपर्याय हैं। अनंत संस्थान पर्याय हैं, अनंत गुरुलघुपर्याय हैं, अनंत अगुरुलघुपर्याय हैं।

इस प्रकार लोक द्रव्यदृष्टि से सांत है क्योंकि द्रव्य संख्या में एक है, क्षेत्रदृष्टि से भी लोक सांत है क्योंकि सकल आकाश के कुछ क्षेत्र में ही लोक है। कालदृष्टि से लोक अनंत है क्योंकि वर्तमान, भूत और भविष्यत् का कोई ऐसा क्षण नहीं जिसमें लोक का अस्तित्व न हो। भावदृष्टि से भी लोक अनंत है क्योंकि एक लोक के अनंत पर्याय हैं।

ईश्वर की कर्तृत्व-शक्ति

कहा जाता है कि ईश्वर से तात्पर्य परमात्मा, गाड या खुदा से है, जिसके विभिन्न हजारों नामों हैं और जिसे प्रायः सभी धर्म-दर्शनों में आराध्य या उपास्य स्वीकार किया गया है।

ईश्वर के संबंध में बहुसंख्यक लोगों की मान्यता है कि वह इस जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता है, और बहुत लोगों के अनुसार उसे इसी अर्थ में सृजनहार, पालनहार और विध्वन्सक कहा जाता है।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है, कुछ भी कर सकता है, पल भर मे राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है। संपूर्ण जगत् का कण-कण उसी की इच्छानुसार परिणमन करता है, वही एक सबका भला, बुरा करने वाला है, सबको सुख-दुख की सामग्री देनेवाला है अथवा जैसा चाहे वैसा करनेवाला है इत्यादि।

अधिकांश धर्म और दर्शन ईश्वर को सृष्टि एवं जीवों का उत्पन्न करनेवाला, उनका पालन करनेवाला एवं उनके भाग्य का निर्धारण करनेवाला मानते हैं। कर्तावादी संप्रदाय भी पदार्थ का तथा उसके परिणमन का कर्ता ईश्वर को ही मानते हैं। इस विचारधारा के दार्शनिकों ने ईश्वर की परिकल्पना संपूर्ण ब्रह्मांड की परमशक्ति के रूप में की है जो समस्त प्राणियों के भाग्य का विधाता है।

भारतीय आत्मवादी दर्शनों में ईश्वर- कर्तृत्व को मान्यता प्रदान की गई है। जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं स्वीकार करता। वह ईश्वर को सृष्टिकर्ता भी नहीं मानता। इसका कारण यह है कि ऐसा मानने से उसे संसार के पापों और कुकर्मों का भी कर्ता मानना पड़ेगा।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में ऐसा कोई भी ईश्वर या भगवान् सम्भव नहीं है क्योंकि यह संपूर्ण जगत् एक निश्चित कारण-कार्य व्यवस्था के अनुसार संचालित है, तथा उस कारण-कार्य व्यवस्था के विरुद्ध कुछ भी उल्टा सीधा कार्य कभी भी कोई नहीं कर सकता है। सृष्टि के समस्त कार्य एक सुनिश्चित कार्य-कारण व्यवस्था के अनुसार स्वयमेव संचालित हो रहे हैं, उन्हें कोई ईश्वर या परमात्मा संचालित करनेवाला नहीं है तथा उन कार्यों को कभी कोई ईश्वर उल्टा सीध परिणमन नहीं कर सकता है।

आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस संपूर्ण विश्व में जितने पदार्थ प्रारंभ से थे, उतने ही आज हैं और भविष्य में भी अनंतकाल तक उतने ही बने रहेगें। उनमें से कभी किसी पदार्थ को मूलतः न तो पैदा किया जा सकता है और नही सर्वदा नष्ट किया जा सकता है। मात्र पदार्थों का अवस्था परिवर्तन होता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता कोई ईश्वर आधुनिक विज्ञान से सिद्ध नहीं होता है। इसी प्रकार सब जीवों का सुखी-दुखी होना भी अपने-अपने कर्मों और भावों पर निर्भर करता है। उसमें भी किसी ईश्वर जैसे अन्य तत्व की कोई आवश्यकता नहीं है।

स्तुति से प्रसन्न होकर भला करनेवाला और निंदा से नाराज होकर बुरा करनेवाला ईश्वर वैज्ञानिक दृष्टि से भी न्यायसम्पन्न परमपूज्य सिद्ध नहीं होता है। सांख्य, मीमांसा आदि अनेक प्राचीन दर्शनों में भी ईश्वर या परमात्मा को आरम्भतः जगत् का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं माना गया है और इस प्रकार की धारण बहुत परवर्ती है जो किसी प्रकार के ठोस प्रमाण पर आधारित नहीं है।

विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि यह विश्व किसी की इच्छा का परिणाम नहीं है।

भौतिक द्रव्य या पदार्थ का कभी विनाश नहीं होता, उसका केवल रुपांतर होता है। भौतिक द्रव्य अथवा पदार्थ के ध्रौव्यता और अविनाश- सिद्धांत की पुष्टि की जा चुकी है।

समकालीन अस्तित्ववादी दर्शन भी ईश्वर का निषेध करते हैं। साम्यवादी दर्शन भी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है। ईश्वर मनुष्य का स्रष्टा नहीं है अपितु मनुष्य ही ईश्वर का स्रष्टा है, इसीलिए हजारों वर्ष पूर्व प्रवर्तित श्रमण परंपरा ने भी ईश्वर- कर्तृत्व को मान्यता नहीं दी है।

दर्शन का आधार तर्क होता है परतु यह विडंबना है कि अनेक भारतीय दार्शनिक और उनकी कृतियाँ अंधानुकरण कर तमाम अवधारणाएँ ढ़ोती चली आ रही हैं। श्रमण दर्शनों को नास्तिक मानना ऐसी ही अवधारणा है। लोग समझते हैं कि भारतीय दर्शन की आस्तिक-नास्तिक दो शाखाएँ है। वैदिक दर्शन को आस्तिक और जैन-बौद्ध जैसे अवैदिक दर्शनों को नास्तिक कहा जाता है। यह वर्गीकरण निराधार और दुराग्रहपूर्ण है। आस्तिक, नास्तिक शब्द ‘अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः’ इस पाणिनि सूत्र के अनुसार बने हैं। पाणिनीय व्याकरण के सूत्र पर काशिका और महाभाष्य लिखने वाले क्रमशः कैयट तथा पतंजलि से इसका अर्थ किया है कि ‘जो परलोक, कर्मफल को मानता है वह आस्तिक है और जो उसे नहीं मानता वह नास्तिक है।’

कैयट की परिभाषा के आधार पर यदि आस्तिक और नास्तिक माना जाय तो जैन और बौद्ध भी आस्तिक दर्शन सिद्ध होते हैं, क्योंकि इन दोनों दर्शनों में स्पष्टतया परलोक, पुनर्जन्म और उसके जनक शुभ-अशुभ कर्मों को स्वीकार किया गया है। इनका मौलिक अर्थ यही है कि जो परलोक की सत्ता मानता है वह आस्तिक है और जो नहीं मानता, वह नास्तिक है। इस अर्थ में जैन-बौद्ध को नास्तिक नहीं कहा जा सकता है।

श्रमण धारा वैदिक परंपरा को न मानकर भी आत्मा, जड़भिन्न ज्ञान संतान, पुण्य-पाप, परलोक, निर्वाण आदि में विश्वास रखती है, अतः पाणिनि की परिभाषा के अनुसार आस्तिक है। वेद को या ईश्वर को जगत् कर्ता न मानने के कारण श्रमण धारा को नास्तिक कहना उचित नहीं है, क्योंकि अपनी अमुक परंपरा को न मानने के कारण यदि श्रमण नास्तिक हैं, तो श्रमण परंपरा को न मानने के कारण वैदिक भी मिथ्यादष्ष्टि आदि विशेषणों से पुकारे गये हैं।

जैन दर्शन उतना ही आस्तिक या नास्तिक है, जितना हिन्दुओं का कोई भी दर्शन। जैन परंपरा सृष्टिकर्ता के रूप में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करता है। जैनों की भाँति बौद्ध भी ईश्वर की सत्ता का खंडन करते हैं, इसलिए दोनों धर्मों (जैन और बौद्ध) को अनीश्वरवादी धर्म कहा जाता है।

जब आत्मा अनादि-निधन है और भौतिक द्रव्य, पदार्थ भी अनादि-निधन हैं तब सृष्टि के कर्ता-धर्ता तथा जीवात्माओं के शरीर, इंद्रिय और मन के कारण तथा उनके भाग्य-विधाता के रूप में ईश्वर की सत्ता मानने का कोई औचित्य नहीं है। यदि ईश्वर नियंता, निर्माता और भाग्यविधाता है और वह जीव को बिना कर्म के स्वेच्छा से फल प्रदान कर सकता है फिर मनुष्य के धर्म, आचरण, त्याग, तपस्या का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

जीव या आत्मा स्वेच्छानुसार एवं सामर्थ्यानुकूल कर्म करने में स्वतंत्र है। उसमें ईश्वर के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं है। वह अपने ही कर्मों का फल भोगता है, फल-प्रदाता कोई दूसरा नहीं है। इसलिए उत्पत्ति एवं विनाश के हेतु किसी परमशक्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है।

तात्त्विक दृष्टि से ईश्वर को फल-प्रदाता मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। कारण-कार्य के सिद्धांत के आधार पर भी विश्व के समस्त घटनाओं की तार्किक व्याख्या करना संभव है। विश्व जिन जीवों (चेतनाओं) एवं पुदगल (पदार्थों) का समुच्चय है वे तत्त्वतः अविनाशी एवं आंतरिक हैं। इसलिए जगत् को मिथ्या, स्वप्नवत् या शून्य भी नहीं माना सकता है।

किसी भी नवीन पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती। पदार्थ में अपनी अवस्थाओं का रुपांतर होता रहता है। ब्रह्मांड के प्रत्येक मूल-तत्त्व की अपनी मूल-प्रकृति है। कार्य-कारण के नियम के आधार पर प्रत्येक मूल-तत्त्व अपने गुणानुसार बाह्य स्थितियों से प्रतिक्रियाएँ करता है। इस कारण जगत् मिथ्या नहीं है। संसार के पदार्थ अविनाशी हैं, इसलिए विश्व स्वप्नवत् भी नहीं है। शून्य से किसी वस्तु का निर्माण नहीं होता। जैन दर्शन के अनुसार तात्विक दृष्टि से मुक्त आत्मा अथवा मुक्त जीव और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। स्वभाव की दृष्टि से सभी जीव समान हैं।

जैन धर्म ने ईश्वर की कर्तृत्व-शक्ति को सिद्धांत: अस्वीकार किया है। जैन धर्म मूल्यों में आस्था रखता है। जैन धर्म में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रहाचर्य तथा अपरिग्रह जैसे पंचमहाव्रतों की मीमांसा हुई है। प्रत्येक जैन इसका पालन सतर्कतापूर्वक करता है, तथा सम्यक् चरित्र को प्रमुख स्थान प्रदान करता है। मूल्यों की प्रधानता के कारण ही जैन धर्म, धर्म की कोटि में आता है। नैतिक मूल्यों के नियंत्रण के लिए ही जैन तीर्थंकरों में आस्था रखते हैं। यद्यपि तीर्थंकर जैन धर्म में ईश्वर के सदृश हैं किंतु वे सृष्टि या पदार्थ के नियामक नहीं हैं। जैन धर्म ईश्वर में तो विश्वास नहीं करता, लेकिन देवत्व में विश्वास करता है।

वस्तुतः जैन धर्म प्रत्येक मुक्त जीव को देवता मानता है, और ऐसे देवता बहुत होंगे, क्योंकि उनकी संख्या में वृद्धि ही हो सकती है, हृास नहीं।  यदि हम ‘ईश्वर’ उस परमपुरुष को समझते हैं जो इस विश्व की सृष्टि करता है, तो जैन धर्म निश्चय ही नास्तिक है। वह तर्क से ईश्वर की धारणा को स्वविरोधी बताता है।  यदि ईश्वर को विश्व की सृष्टि की आवश्यकता है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसमें कोई अपूर्णता है, जो कि उसके सर्वोच्च होने के नाते अनिवार्यतः पूर्ण माने जाने से संगति नही रखता। अतः कोई ईश्वर नही है और विश्व की कभी सृष्टि नहीं हुई। यद्यपि यह मत मनुष्य की सामान्य आस्था के विरुद्ध है, पर तार्किक आधार से एकदम शून्य नहीं है।

ईश्वरवादी दर्शन प्रायः ईश्वर पर मानवत्व का आरोप कर देते हैं। वे ईश्वर को नीचे मनुष्य के स्तर पर ले आते हैं। इसके विपरीत, जैन धर्म प्राणिमात्र को ही तब ईश्वर के रूप मे देखता है जब उसकी सहज शक्तियाँ पूर्ण विकास की अवस्था में होती हैं। यहाँ ईश्वर जीव के सर्वोत्तम रूप के लिए ही प्रयुक्त एक दूसरा शब्द है। आदर्श मानव ही मानव का आदर्श है, और उसकी सिद्धि का एकमात्र उपाय यह है कि हम आदर्श मनुष्यों को उदाहरण के रूप में अपने सामने रखें तथा उसी तरह प्रयत्न करें जिस तरह अन्यों (मुक्तात्माओं) ने किया था। ऐसा आदर्श हमें पूरी आशा और पूरा प्रोत्साहन देता है, क्योंकि जो एक व्यक्ति कर चुका है उसे दूसरा भी कर सकता है।

जैन धर्म ईश्वर के स्थान पर तीर्थंकरों को प्रतिष्ठित करता है। ये तीर्थंकर मुक्त होते हैं, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य, अनंत आनंद संपन्न होकर सिद्धशिला में निवास करते हैं। जैन धर्म तीर्थकरों और पंचपरमेष्ठि (अर्हत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा साधु) की आराधना करते हैं, उनके प्रति भक्ति रखते हुए उनकी पूजा करते हैं, तथा वे मूर्तिपूजा का प्रतिपादन करते हैं किंतु तीर्थंकर या पंचपरमेष्ठि ईश्वर नहीं हैं।

जैनों का विश्वास है कि तीर्थंकर या पंचपरमेष्ठि के बताये हुए मार्ग पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है, इसलिए जैन धर्म आशावादी भी है। ईश्वर को, जो पहले से ही है, अस्वीकार करने में तथा साथ ही इस विश्वास को कि मोक्ष उसकी दया से प्राप्तव्य है, अस्वीकार करने में जैन धर्म और उसकी तरह के अन्य दर्शन यह मानते हैं कि समग्र अनुभव की व्याख्या के लिए कर्म स्वतः बिना किसी ईश्वरीय शक्ति के हस्तक्षेप की अपेक्षा रखे पर्याप्त है और इस प्रकार से मनुष्य के अंदर यह धारणा पैदा करते हैं कि जो कुछ वह करता है उसके लिए स्वंय ही पूर्णतः उत्तरदायी है।

जैन धर्म मनुष्य को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता देने में हर अन्य धर्म से बढ़कर है। जो कुछ कर्म हम करते हैं और उनके जो फल हैं उसके बीच कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। एक बार कर लिए जाने के बाद कर्म हमारे प्रभु बन जाते हैं और उनके फल भोगने ही पड़ते हैं। मेरा स्वतंत्रता जितनी बड़ी है, उतना ही बड़ा मेरा दायित्व भी है। जैन दर्शन यह उद्घोष करता है कि धर्म की साधना करनेवाले साधक को देवता भी नमस्कार करते है।

जैन धर्म प्रतिपादित करता है कि कल्पित् एवं सर्जित शक्तियों के पूजन से नहीं, अपितु त्रिरत्न् (सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चरित्र) के द्वारा ही आत्म-साक्षात्कार संभव है, उच्चतम् विकास संभव है, मुक्ति संभव है। मुक्ति दया का दान नहीं है, यह प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसके लिए ईश्वर या परमशक्ति की सत्ता में विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

धर्म एवं दर्शन की सामाजिक प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि धर्म से सदाचरण की प्रेरणा प्राप्त होती है। धर्म उत्कृष्ट मंगल है। धर्म दिखावा नहीं, रूढि़ नहीं, प्रदर्शन नहीं, किसी के प्रति घृणा नहीं, मानव और मानव के बीच भेदभाव नहीं अपितु मानव में मानवीयता के गुणों की विकास-शक्ति है, सार्वभौम चेतना का सत्-संकल्प है।