जैन धर्म और भगवान् महावीर (Jainism and Lord Mahavira)

छठी शताब्दी ई.पू. के संप्रदायों में प्राचीनतम् संप्रदाय निगंठों अथवा जैनों का था। जैन परंपरानुसार इस धर्म में 24 तीर्थंकर हुए हैं। महावीरपूर्व प्रवर्तमान काल के तेईस तीर्थंकरों में से आज इतिहास प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ, 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ और 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ कोऐतिहासिक अस्तित्त्व स्वीकार करता है।

पार्श्वनाथ (Parshvanath)

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव थे, किंतु पार्श्वनाथ संभवतः इस धर्म के वास्तविक संस्थापक थे। इनका जन्म वाराणसी के राजा अश्वसेन की पत्नी वामा (वर्मला) के उदर से हुआ था। इनका समय महावीर के 250 वर्ष पूर्व था। पार्श्वनाथ तीस वर्ष की आयु में गृह-त्याग कर संन्यासी हो गये। इन्होंने सम्मेय पर्वत (पारसनाथ पर्वत) पर 83 दिन की कठोर तपस्या के बाद कैवल्यज्ञान प्राप्त किया और 70 वर्ष तक अपने उपदेशामृत द्वारा जनकल्याण करते हुए सम्मेद शिखर (पार्श्वनाथ गिरि, हजारी बाग) पर निर्वाण प्राप्त किया। इनके अनुयायियों को निर्ग्रंथ कहा जाता था। पार्श्वनाथ के समय में निर्ग्रंथ संप्रदाय चार गणों (संघों) में सुसंगठित था।

पार्श्वनाथ भी वैदिक यज्ञ, कर्मकांड, देववाद, वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा के कटु आलोचक थे। वे प्रत्येक व्यक्ति को मोक्ष का अधिकारी मानते थे चाहे वह किसी भी जाति का हो। उन्होंने नारियों को भी अपने धर्म में साध्वी अथवा श्राविका के रूप में प्रवेश देकर मुक्ति की ओर उन्मुख होने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने चार यम- अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का उपदेश दिया, इसलिए इनके धर्म को चतुर्याम् कहा गया है। महावीर के माता-पिता भी ‘पार्श्वपत्यीय’ परंपरा के अनुयायी थे।

वर्धमान महावीर (Vardhman Mahaveer)

Jainism and Lord Mahavira
जैन धर्म जैन धर्म और भगवान् महावीर

महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं थे, अपितु इस धर्म के अंतिम तथा सर्वाधिक प्रसिद्ध तीर्थंकर थे। इनका जन्म 599 ई.पू. में बिहार प्रांत में विदेह क्षेत्र के अंतर्गत वैशाली (आधुनिक बनिया बसाढ़) के समीपवर्ती कुंडपुर (कुंडग्राम) के क्षत्रियकुंड में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था जो ज्ञातृकवंशीय क्षत्रिय थे और वज्जि संघ के एक प्रमुख गणराज्य कुंडपुर के राजा थे। इनकी माता त्रिशला लिच्छवि गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थी। कहा जाता है कि वर्धमान पहले ऋषभदत्त नामक ब्राह्मण की पत्नी देवानंदा के गर्भ में आये, किंतु अभी तक सभी तीर्थंकर क्षत्रिय वंश में उत्पन्न हुए थे, इसलिए इंद्र ने वर्धमान को ब्राह्मणी देवानंदा के गर्भ से क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थापित कर दिया। संभवतः ब्राह्मण वर्ग की अपेक्षा क्षत्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर बल देने के कारण यह कथा निर्मित की गई। मथुरा की एक मूर्ति में इसका अवतरण भी प्राप्त होता है।

वर्धमान का प्रारंभिक जीवन सुख-सुविधापूर्ण था। राजकुमार होने के कारण इन्हें अनेक विद्याओं तथा कलाओं की शिक्षा दी गई। बड़े होने पर उनका विवाह कौडिण्य गोत्र की कन्या यशोदा से हुआ जो या तो बसंतपुर के राजा समरवीर या कलिंग के शासक जितमित्र की पुत्री थी। इससे वर्धमान को एक पुत्री प्रियदर्शना (अणोज्जा) उत्पन्न हुई थी जो उनके भानजे क्षत्रिय जामालि से ब्याही गई थी।

वर्धमान प्रारंभ से ही चिंतनशील प्रवृ़त्त के थे। जब वे तीस वर्ष के थे, उनके पिता सिद्धार्थ की मृत्यु हो गई। उन्होंने बड़े भाई नंदिवर्धन तथा अन्य कौटुंबिक लोगों की अनुमति से मात्र एक वस्त्र धारण करके चंद्रप्रभा नामक पालकी में सवार होकर ज्ञातृकों के खंडवन नामक उद्यान की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर वे पालकी से उतरकर एक अशोक वृक्ष के नीचे अपने समस्त आभूषणों को त्याग दिया और सिर के बालों को पांँच मुष्टियों में उखाड़ कर निर्ग्रंथ-भिक्षु का जीवन धारण कर लिया।

आचारांगसूत्र और कल्पसूत्र से पता चलता है कि बारह वर्ष तक कठिन आत्म-साधना और विभिन्न परीषहों तथा उपसर्गों को सहते हुए वर्धमान को तेरहवें वर्ष में जृम्भिकग्राम (जम्भियगाँव) के बाहर ऋजुपालिका (ऋतुबालुका) सरिता के उत्तर तट पर श्यामांग गृहस्थ के खेत में शाल वृक्ष के नीचे ‘कैवल्य’ (सर्वज्ञत्व) की प्राप्ति हुई और वे सुख-दुःख के बंधनों से मुक्त होकर ‘केवली’ हो गये।

कैवल्य-प्राप्ति के उपरांत महावीर अर्हत्, केवली, जिन्, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी आदि संज्ञाओं के धारक हुए। अपनी समस्त इंद्रियों को जीतने के कारण वे ‘जिन्’ कहलाये। भय उत्पन्न होनेवाली स्थिति में अचल रहनेवाले, अपने संकल्प से तनिक मात्र भी विचलित नहीं होनेवाले, निष्कंप परीषहों और उपसर्गों को शांत भाव से सहन करने में समर्थ, भिक्षा-नियमों का दृढ़ता से पालन करनेवाले, शोक और हर्ष में समभावी, सद्गुणों के आगार तथा अतुलबली होने के कारण वर्धमान को ‘महावीर’ कहा गया।

सहज शारीरिक एवं बौद्धिक परिश्रम और शक्ति से उन्होंने तप आदि नानाविध आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर आरूढ़ होकर कठोर परिश्रम किया, एतदर्थ वे श्रमण कहलाये। बौद्ध साहित्य में इन्हें ‘निगंठ नाटपुत्त’ (निर्ग्रंथ ज्ञातपुत्र) कहा गया है। निर्ग्रंथ इसलिए कि उन्होंने समस्त बंधनों को तोड़ दिया था, ज्ञातृपुत्र इसलिए कि वे ज्ञातृक वंशीय राजा के पुत्र थे।

कैवल्य के पश्चात् महावीर धर्मोपदेश देकर लोगों को अपने मत में दीक्षित करते हुए इधर-उधर घूमते रहे। इन यात्राओं के दौरान महावीर ने पहला वर्षावास अस्थिक ग्राम में, तीन चातुर्मास्य चंपा तथा पष्ठियंपा में, बारह वैशाली तथा वण्यि ग्राम में, चौदह राजगृह, छः मिथिला में, दो भद्विका में, एक अलभिका में, एक ब्रजभूमि (पणित भूमि) में, एक श्रावस्ती में तथा एक पावापुरी में व्यतीत किया, जहाँ इनकी मृत्यु हो गई।

धर्म-प्रचार

भगवान् महावीर ने चंपा, वैशाली, राजगृह आदि नगरों में घूम-घूमकर अपने धर्म का प्रचार किया। राजपरिवार से संबंधित होने के कारण महावीर को धर्म-प्रचार में शासक वर्ग से पर्याप्त सहायता मिली। उनकी माता लिच्छवि नरेश चेटक की बहन थीं और चेटक का अनेक समकालीन शक्तिशाली शासकों के साथ वैवाहिक और मैत्रीपूर्ण संबंध था।

जैन अनुश्रुतियों के अनुसार श्रेणिक, चेटक, प्रद्योत, शतानीक, उद्दायन, वीअंगप, वीरजस, संजय, शंख, कासिवद्धण आदि राजागण महावीर के अनुयायी थे। ओवाइय सूत्र के अनुसार अजातशत्रु महावीर का भक्त था। चंपा नरेश दधिवाहन की महावीर में अपार श्रद्धा थी और उसकी पुत्री चंदना महावीर की प्रथम भिक्षुणी थी। रानियों में उदयन की पत्नी पद्मावती, कोशांबी की मृगावती एवं जयंती, श्रेणिक और प्रद्योत की रानियाँ महावीर के संघ की श्राविकाएँ थीं। वज्जिसंघ एवं मल्ल गणराज्य में भी महावीर का बड़ा सम्मान था। दशार्ण (मध्य प्रदेश के विदिशा) का शासक दशार्णभद्र महावीर के निर्ग्रंथ-संघ में दीक्षित हुआ था। विदिशा में अवंतिराज प्रद्योत द्वारा जीवंतस्वामी की मूर्ति प्रतिष्ठित करने का विवरण मिलता है।

हरिवंश पुराण से पता चलता है कि महावीर ने कलिंग में जैन धर्म का प्रचार किया था। कलिंग शासक करकंडु ने भी निर्ग्रंथ धर्म स्वीकार किया था। हाथीगुंफा लेख से पता चलता है कि नंदराज द्वारा कलिंग से मगध ले जाई गई जिन् मूर्ति को खारवेल तीन सौ वर्ष बाद वापस लाया था। भास्कर द्वारा रचित ‘जीवन्धर चरित’ से ज्ञात होता है कि दक्षिण भारत का शासक जीवन्धर निर्ग्रंथ-संघ में दीक्षित हुआ था।

धर्म-प्रचार करते हुए महावीर स्वामी को 72 वर्ष की आयु में पावा (पावापुरी, जिला नालंदा) में राजा हस्तिपाल के महल में कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन निर्वाण प्राप्त हुआ। कल्पसूत्र से ज्ञात होता है कि अमावस्या की रात्रि को महावीर चतुर्विध अघाती कर्म-दल का क्षय करके सिद्ध, बुद्ध, मुक्त अवस्था को प्र्राप्त हुए थे। जैन परंपरा में महावीर की निर्वाण-तिथि 527 ई.पू. मानी जाती है।

महावीर की शिक्षाएँ (Teachings of Mahaveer)

Jainism and Lord Mahavira
महावीर की शिक्षाएँ

जैन धर्म निवृत्तिमार्गी धर्म है। इसके अनुसार संसार के समस्त सुख दुःखमूलक हैं। मनुष्य जरा और मृत्यु से ग्रस्त है। व्यक्ति की तृष्णा और इच्छाएँ आकाश के समान अनंत हैं, संपत्ति संचय के साथ उसकी इच्छाएं बढ़ती जाती हैं। जैन धर्म दुःखों से छुटकारा पाने हेतु तृष्णाओं के त्याग पर बल देता है। कामभोग विष के समान हैं जो अंततः दुःख ही उत्पन्न करते हैं। संसार-त्याग तथा संन्यास ही व्यक्ति को सच्चे सुख की ओर ले जा सकता है।

जैन धर्म के अनुसार इस सृष्टि का कर्त्ता कोई ईश्वर नही है, किंतु संसार एक वास्तविक तथ्य है जो अनादिकाल से विद्यमान है। संसार के सभी प्राणी अपने-अपने संचित कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में उत्पन्न होते हैं और कर्मफल भोगते हैं। जैन धर्म में भी सांसारिक तृष्णा-बंधन से मुक्ति को ‘निर्वाण’ कहा गया है। कर्मफल ही जन्म तथा मृत्यु का कारण है। कर्मफल से छुटकारा पाकर ही मानव निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि पूर्वजन्म के संचित कर्म को समाप्त किया जाये और वर्तमान जीवन में कर्म-फल के संग्रह से बचा जाए।

त्रिरत्न

जैन धर्म में कर्मफल से छुटकारा पाने के लिए त्रिरत्न का विधान किया गया है (सम्यक्-दर्शन-ज्ञान-चरित्राणि मोक्षमार्ग)। यही मोक्ष का मार्ग है। मोक्ष-प्राप्ति के इन तीनों साधनों को जैन दर्शन में ‘रत्न-त्रय’ की संज्ञा दी गई है- 1. सम्यक् दर्शन, 2. सम्यक् ज्ञान और 3. सम्यक् चरित्र।

सत् में विश्वास ही सम्यक् दर्शन है। सद्रूप का असंदिग्ध तथा दोषरहित ज्ञान सम्यक् ज्ञान है। कर्मों के पूर्ण विनाश के बाद ही केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुःख के प्रति समभाव सम्यक् आचरण है। सम्यक् चरित्र से अभिप्राय है अनासक्ति की भावना से नैतिक सदाचारमय जीवन व्यतीत करना। इसके पालन के लिए निम्नलिखित आचरण अपेक्षित है-

पंचमहाव्रत

1. अहिंसा

जैनाचार की मूलभित्ति अहिंसा है। हिंसात्मक प्रवृत्ति का पूर्णतया परित्याग ही अहिंसा है। प्रत्येक आत्मा चाहे वह पृथ्वी-संबंधी हो, चाहे वह जलगत हो, चाहे उसका आश्रय कीट अथवा पतंग हो, चाहे वह पशु अथवा पक्षी में रहती हो, चाहे उसका निवास स्थान मानव हो, तात्त्विक दृष्टि से उनमें कोई भेद नहीं है। जैन दृष्टि कोयह साम्यवाद भारतीय संस्कृति का गौरव है। इसी साम्यवाद के आधार पर जैन परंपरा ‘जीओ और जीने दो’ का उद्घोष करती है।

अहिंसा के पूर्ण पालन के लिए निम्नलिखित पांँच भावनाओं का पालन करना आवश्यक है- 1. ईर्या समिति अर्थात् गमनागमन संबंधी सावधानी, 2. भाषा समिति अर्थात् वचन की अपापकता, 3. एषणा समिति अर्थात् खान-पान संबंधी सचेतता, 4. आदान-प्रेक्षा समिति अर्थात् पात्रादि उपकरण संबंधी सावधानी, 5. व्युत्त्सर्ग समिति अर्थात् मानसिक विकार रहितता। इन तथा इसी प्रकार की अन्य प्रशस्त भावनाएं अहिंसाव्रत को सुदृढ़ करती हैं।

2. सत्य

मिथ्या-वचन का परित्याग ही सत्य है और सत्य का आदर्श सूनृत है। सूनृत से तात्पर्य ऐसे सत्य से है जो सभी के लिए प्रिय एवं हितकारी हो। सत्य होने पर भी अवज्ञासूचक शब्दों का प्रयोग न करें, किंतु सम्मानसूचक शब्द प्रयोग में लें। इस व्रत का पालन भी मन, वचन और कर्म से करना चाहिए।

सत्य के लिए भी पाँच उपनियम बताये गये हैं- 1. वाणी-विवेक अर्थात् सोच-समझ कर भाषा का प्र्रयोग करना, 2. लोभ-त्याग अर्थात् लालच में न फंसना, 3. क्रोध-त्याग अर्थात् गुस्सा न करना, 4. हास्य-त्याग अर्थात् हंसी-मजाक न करना तथा 5. भय-त्याग अर्थात् निर्भीक रहना। इन व इसी प्रकार की अन्य प्रशस्त भावनाओं से सत्यव्रत की रक्षा होती है। इस प्रकार श्रमण को क्रोधादि कषायों का त्याग कर, समभाव धारणकर विवेकपूर्वक संयमित सत्याचरण करना चाहिए।

3. अस्तेय

श्रमण बिना दी हुई कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करता। वह बिना अनुमति के एक तिनका उठाना भी स्तेय अर्थात् चोरी समझता है। जिस प्रकार वह स्वयं अदत्तादान का सेवन नहीं करता, उसी प्रकार किसी से करवाता भी नहीं और करनेवालों का समर्थन भी नहीं करता है।

अस्तेय-व्रत की दृढ़ता एवं सुरक्षा के लिए भी पाँच निर्देश दिये गये हैं- 1. सोच-विचार कर वस्तु की याचना करना, 2. आचार्य आदि की आज्ञा से भोजन ग्रहण करना, 3. परिमित पदार्थ स्वीकार करना, 4. पुनः-पुनः पदार्थों की मर्यादा करना तथा 5. सहधार्मिक से परिमित वस्तुओं की याचना करना।

4. अपरिग्रह

किसी भी वस्तु का ममत्व-पूर्वक संग्रह परिग्रह कहलाता है। परिग्रह का दूसरा नाम ग्रंथि (गाँठ) भी है। जितनी अधिक गाँठ बाँधी जाती है, उतना ही अधिक परिग्रह बढ़ता है। यह गाँठ जब तक नहीं खुलती, तब तक विकास का द्वार बंद रहता है। महावीर ने ग्रंथि-भेदन पर अधिक जोर दिया है, इसीलिए उनका नाम निर्ग्रंथ पडा़ और उनकी परंपरा भी निर्ग्रंथ संप्रदाय के नाम से प्रसिद्ध हुई।

अपरिग्रह व्रत की पाँच भावनाएं इस प्रकार हैं- 1. श्रौत्रोन्द्रिय के विषय शब्द के प्रति अनासक्त भाव, 2. चक्षुरिन्द्रिय के विषय रूप के प्रति अनासक्त भाव, 3. घ्राणेन्द्रिय के विषय गंध के प्रति अनासक्त भाव, 4. रसनेन्द्रिय के विषय रस के प्रति अनासक्त भाव और 5. स्पर्शनेन्द्रिय के विषय स्पर्श के प्रति अनासक्त भाव।

5. ब्रह्मचर्य

मैथुन-त्याग को सर्व मैथुन-विरमण कहा जाता है। श्रमण के लिए मैथुन का पूर्ण त्याग अनिवार्य है। उसके लिए मन, वचन एवं काय से मैथुन का सेवन करने, करवाने तथा अनुमोदन करने का निषेध है। इसे नवकोटि ब्रह्मचर्य अथवा नवकोटि-शील भी कहते हैं।

गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले जैनियों के लिए भी इन्हीं व्रतों की व्यवस्था है, किंतु इनकी कठोरता में पर्याप्त कमी की गई है और इसलिए इन्हें ‘अणुव्रत’ कहा गया है।

तीन गुणव्रत

पंचव्रतों की रक्षा तथा विकास के लिए जैन आचार-शास्त्रा में तीन गुणव्रतों की व्यवस्था की गई है-

  1. अपनी त्याग-वृत्ति के अनुसार व्यवसायादि प्रवृत्तियों के निमित्त दिशाओं की मर्यादा निश्चित करना द्धदिशा-परिमाण व्रत),
  2. उपभोग एवं परिभोग की मर्यादा निश्चित करना (उपभोग-परिभोग-परिमाण व्रत) और
  3. अपने अथवा अपने कुटुम्ब के जीवन निर्वाह के निमित्त होने वाले अनिवार्य हिंसापूर्ण व्यापार-व्यवसाय के अतिरिक्त समस्त पापपूर्ण प्रवृत्तियों से निवृत्त होना (अनर्थदंड-विरमण व्रत)।

गुणव्रत से प्रधानतया अहिंसा एवं अपरिग्रह का पोषण होता है।

शिक्षाव्रत

शिक्षा का अर्थ होता है अभ्यास। श्रावक (गृहस्थ) को कुछ व्रतों का बार-बार अभ्यास करना होता है। इसी अभ्यास के कारण इन व्रतों को शिक्षाव्रत कहा जाता है। ये चार हैं-

  1. मन, कर्म एवं वचन की पवित्रता-शुद्धता के साथ त्रस और स्थावर के प्रति समभाव का अभ्यास करना
  2. मर्यादित क्षेत्र के बाहर न आने-जाने का अभ्यास करना,
  3. आत्म-तत्त्व के पोषण के लिए उपवासपूर्वक नियत समय व्यतीत करना और
  4. अतिथि आदि के स्वागत के निमित्त अपनी आय का एक निश्चित विभाग करना।

चारित्र

जैन धर्म में बंधन से मुक्ति के लिए पाँच चारित्रों का भी विधान बताया हैं- 1. सामाजिक चारित्र अर्थात् समभाव में रहना, 2. छेदोपस्थापना अर्थात् गुरु के समीप अपने पूर्व दोषों को स्वीकार कर दीक्षा लेना, 3. परिहार विशुद्धि, 4. सूक्ष्म संपूराय अर्थात् लोभ के अंश को छोड़कर क्रोध आदि कषायों का उदय न होना एवं 5. यथाख्यात् अर्थात् सभी कषायों का निरोध होना। चारित्र की प्राप्ति मन, वचन और काय के संयम से होती है।

दशलक्षण धर्म

जैनग्रंथ समवायांग में श्रमणों के दस गुणों का वर्णन है। राग-द्वेष रहित आत्मा का सहज स्वभाव क्षमा, मृदुता, सरलता, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, औदासीन्य (आकिंचन्य) तथा ब्रह्मचर्य हैं। जैनों के अनुसार धर्म के इन दस लक्षणों एवं अंगों का पालन अति आवश्यक है।

काया-क्लेश

जैन धर्म में काया-क्लेश, तप, यातना और योग पर भी अत्यधिक बल दिया गया हे। आत्मा को घेरने वाले भौतिक तत्त्व का दमन करने के लिए तपस्या और काया-क्लेश भी आवश्यक है। जैन धर्म में काया-क्लेश के अंतर्गत उपवास द्वारा शरीर के अंत का भी विधान है। जैन अनुश्रुति के अनुसार मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त ने मैसूर के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर इसी प्रकार मृत्यु का वरण किया था।

महावीर ने वेदों की प्रमाणिकता को नहीं माना और वेदवाद का विरोध किया। उन्होंने वैदिक यज्ञवाद के विरुद्ध त्याग तथा संन्यास-प्रधान जीवन को स्थापित किया। घोर अहिंसावादी होने के कारण रक्तिम् यज्ञों तथा उनमें दी जाने वाली बलि और जटिल कर्मकांडों का विरोध करना जैन धर्म के लिए स्वाभाविक ही था। महावीर का मानना था कि यज्ञ में जीवों का विनाश पाप उत्पन्न करता है। अग्नि-प्रज्ज्वलन तथा जल-मज्जन केवल बाहरी शुद्धता प्रदान कर सकते हैं। जैन मत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह कर्त्तव्यों का निर्देश जातिवाद से ऊपर उठकर मनुष्यमात्र के लिए एक ही आचार-पद्धति का निर्देश देता है।

महावीर स्वामी ने जन्मना वर्ण-प्रथा को अस्वीकार कर दिया और कर्म को वर्ण तथा जाति का आधार माना। कर्म से ही कोई ब्राह्मण होता है और कर्म से ही कोई क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होता है। सामाजिक धरातल पर ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की अधिक प्रतिष्ठा पर जैन ग्रंथों में बल दिया गया है।

जैन धर्म किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं स्वीकार करता है। विश्व जिन जीवों (चेतनाओं) एवं पुद्गलों (पदार्थों) का समुच्चय है, वे तत्त्वतः अविनाशी एवं आंतरिक हैं। किसी भी नवीन पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती, मात्रा पदार्थ में अवस्थाओं का रुपांतर होता रहता है। जीव या आत्मा स्वेच्छानुसार एवं सामर्थ्यानुकूल कर्म करने में स्वतंत्र है। उसका सुख-दुःख उसके अपने कर्मों और भावों पर निर्भर करता है। वह अपने ही कर्मों का फल भोगता है, फल-प्रदाता कोई दूसरा नहीं है। जो कुछ कर्म हम करते हैं और उनके जो फल हैं, उसके बीच कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। एक बार कर लिए जाने के बाद कर्म हमारे प्रभु बन जाते हैं और उनके फल भोगने ही पड़ते हैं।

इस प्रकार जैन धर्म प्रतिपादित करता है कि कल्पित् एवं सर्जित शक्तियों के पूजन से नहीं, अपितु त्रिरत्न् (सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चरित्र) के द्वारा ही आत्म-साक्षात्कार संभव है, मुक्ति संभव है। मुक्ति दया का दान नहीं है, यह प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसके लिए ईश्वर या परमशक्ति की सत्ता में विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

पार्श्वनाथ और महावीर की शिक्षाओं में अंतर (Differences in the Teachings of Parshvanath and Mahavir)

पार्श्वनाथ ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) तथा अपरिग्रह के चतुर्याम का विधान किया था, महावीर ने उसमें ब्रह्मचर्य को पाँचवे व्रत के रूप में सम्मिलित कर उसे पंचयाम् कर किया।

दूसरे, पार्श्वनाथ वस्त्र-धारण के विरुद्ध नहीं थे, किंतु महावीर स्वामी ने सांसारिकता से पूर्णरूपेण अनासक्ति के लिए नग्नता को आवश्यक माना। नग्नता से काया-क्लेश तथा अपरिग्रह को प्रोत्साहन मिलता है। कालांतर में वस्त्र धारण करने तथा निर्वस्त्रता के आधार पर जैन धर्म श्वेतांबर और दिगंबर दो संप्रदायों में विभक्त हो गया। आधारतः उनके मूल सिद्धांतों में कोई भेद नहीं था और उनके तात्त्विक विचार समान थे।

जैन दर्शन (Jain Philosophy)

छः द्रव्य

जैन धर्म के अनुसार सृष्टिकर्त्ता कोई ईश्वर नहीं हैं, किंतु संसार वास्तविक तथ्य है जो अनादिकाल से विद्यमान है। यह लोक छः द्रव्यों- जीव (चेतन), पुद्गल (भौतिक तत्त्व) धर्म, अधर्म आकाश एवं काल से निर्मित है।

जीव के सिवाय सभी द्रव्य (पुद्गल आदि पाँचों) अजीव तत्त्व हैं। सभी द्रव्य तत्त्वतः अविनाशी एवं शाश्वत हैं। किसी भी द्रव्य (पदार्थ) की न तो उत्पत्ति होती है और न ही विनाश होता है, मात्र इन द्रव्यों की अवस्थाओं में परिवर्तन होता रहता है। इन द्रव्यों के भाँति-भाँति के संगठन-विघटन से विभिन्न वस्तुओं का स्वरूप अस्तित्व में आता है तथा उनका रूप परिवर्तित होता है। इस प्रकार यह संसार भी नित्य, शाश्वत तथा परिवर्तनशील है। जैन दर्शन के अनुसार जीव (आत्मा) चेतन तत्त्व है जो स्वभावतः अनंत और अरूपी अर्थात् अभौतिक सत्ता है। यह संसार की सभी वस्तुओं में है।

जीव में स्वाभावतः चार प्रकार की पूर्णताएँ- अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत वीर्य और अनंत आनंद पाई जाती हैं, जिन्हें ‘अनंत-चतुष्ट्य’ कहा गया है। जीव (आत्मा) को भौतिक तत्त्व घेरे रहते हैं। अज्ञानता के कारण जीव में मूलतः क्रोध, मान, लोभ तथा माया चार वासनाएँ रहती हैं। पुद्गल-कणों को आकृष्ट करने के कारण इन्हें ‘कषाय’ कहा जाता है।

बंधन

जैन धर्म में जीव तथा अजीव के संबंध को तथा आत्मा या पुद्गल (भौतिक तत्त्वों) के संयोग को बंधन बताया गया है। जीव एवं अजीव के मध्य संयोजन-कड़ी कर्म है। कर्म जीव की ओर आकर्षित होने लगता है, इसलिए उसे आस्रव कहा जाता है। जैसे ताप लोहे से तथा जल दूध से संयुक्त हो जाता है, उसी प्रकार कर्म जीव से संयुक्त हो जाता है। कर्म ही बंधन का कारण है। यहाँ कर्म को सूक्ष्मतत्त्व भूततत्त्व के रूप में माना गया है जो जीव में प्रवेशकर उसे नीचे संसार की ओर खींच लाता है।

कर्म-पुद्गल जड़ होने के कारण स्वयं जीव में प्रवेश नही कर सकते, इसलिए शरीर, मन और वचन के परिस्पंद की सहायता से आत्मा के प्रदेशों में एक प्रकार का कम्पन होता है जिसे ‘योग’ कहते हैं (कायावाड.मनः कर्मयोगः)। संसारी जीव योग एवं कषाय के द्वारा कर्म का बंध करता है। संसार के सभी प्राणी अपने-अपने संचित कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं और कर्मफल भोगते हैं।

मोक्ष

जीव का परम लक्ष्य है कर्म-फल को नष्ट कर अपने को भौतिक तत्त्वों से मुक्त करना। इसके लिए आवश्यक है कि ‘संवर’ द्वारा वर्तमान जीवन में नवीन कर्म-पुदगलों के प्रवेश को रोक दिया जाये और ‘निर्जरा’ द्वारा पूर्वजन्म के संचित कर्मों को नष्ट कर दिया जाए। जब जीव आत्म-संयम द्धसंवर) द्वारा मन-वचन-कर्म को नियंत्रित कर बंधन में बाँधनेवाले नवीन कर्मों (आस्रव) का मार्ग अवरुद्ध करके कृत-कार्यों को क्षीण कर (निर्जरा) सर्वज्ञ तथा सर्वद्रष्टा होकर मुक्ति का अनुभव करता है, तो यही मोक्ष की अवस्था है। यही शुद्ध अवस्था जीव (आत्मा) की वास्तविक अवस्था है, जो सादि होकर अनंत है।

मोक्ष से तात्पर्य केवल दुःखों का अंत ही नहीं, अपितु आत्मा को ‘अनंतचतुष्ट्य’ की प्राप्ति होती है। जीव अपनी स्वाभाविक शक्ति अनन्तचतुष्ट्य- अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत वीर्य, अनंत आनंद को प्राप्त कर ऊर्ध्वगामी होकर सिद्धलोक में अनंतकाल तक ‘सिद्धशिला’ पर निवास करता है। फिर जीव न तो लोक के परे जा सकता है और न संसार में लौटकर आ सकता है।

ज्ञान

जैन दर्शन में अनेक प्रकार के ज्ञान को परिभाषित किया गया है। इन्द्रिय-जनित ज्ञान को ‘मति’, श्रवण-ज्ञान को ‘श्रुति’, दिव्य ज्ञान को ‘अवधि’ तथा अन्य व्यक्ति के मन-मस्तिष्क की बात जान लेने को ‘मनःपर्याय’ कहा गया है। इसके अलावा सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण ज्ञान को ‘केवल’ कहा जाता है जो निर्ग्रंथों और जिनेन्द्रियों को ही प्राप्त होता है। जैन दर्शन में ज्ञान के तीन स्रोत माने गये हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान और तीर्थंकरों के वचन। ज्ञान-संबंधी जैन सिद्धांत की अपनी विशिष्टता है।

अनेकांतवाद

अनेकांतवाद के अनुसार लोक में अनेक वस्तुएँ हैं और प्रत्येक वस्तु के अनेक धर्म होते हैं (अनंतधर्मकं वस्तुः) और साधारण मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि के द्वारा वस्तु के मात्र कुछ ही धर्मों को जान सकता है। वस्तु के अनंत धर्मों का ज्ञान केवल मुक्त व्यक्ति (केवली) ही केवलज्ञान के द्वारा प्राप्त कर सकता है। प्रत्येक तत्त्व में एकता और अनेकता, भाव और अभाव, एक और अनेक दोनों साथ-साथ रहते हैं। प्रत्येक पदार्थ स्वसत्ता, स्वक्षेत्र, स्वकाल एवं स्वभाव से अस्तिरूप है। प्रत्येक पदार्थ परसत्ता, परक्षेत्र एवं परस्वभाव की अपेक्षा से नास्तिरूप या असत् है। जो सत् है वही असत् है; जो तत् है वही अतत् है; जो अभेद-दृष्टि से एक है, वही भेद-दृष्टि से अनेक है; जो द्रव्यार्थिक नय से नित्य है, वही पर्यायार्थिक नय से अनित्य है।

इस प्रकार एक और अनेक, नित्य और अनित्य, सांत और अनंत धर्मों का अनेकांतवाद के आधार पर समन्वय हुआ है। वस्तुतः पदार्थ के पदार्थत्व में विद्यमान परस्पर विरुद्ध शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकांत है। महावीर के स्याद्वाद, अहिंसा, अपरिग्रह आदि की तमाम अवधारणाएं अनेकांत की ही नींव पर खड़ी हैं।

स्याद्वाद

अनेकांत को व्यक्त करनेवाली भाषा-अभिव्यक्ति के माध्यम का नाम है- स्याद्वाद। स्याद्वाद से जिस पदार्थ का कथन होता है वह अनेकांतात्मक है, इसलिए स्याद्वाद को अनेकांतवाद भी कहते हैं (अनेकांतात्मकार्थ कथनं स्याद्वादः)। अनंतधर्मात्मक वस्तु के सभी धर्मों का ज्ञान केवल मुक्त व्यक्ति (केवली) ही केवल ज्ञान के द्वारा प्राप्त कर सकता है। साधारण मानव किसी वस्तु कोएक समय में एक ही धर्म जान सकता है, इसलिए उसका ज्ञान अपूर्ण और आंशिक होता है। वस्तु के इस आंशिक ज्ञान के आधार पर जो परामर्श होता है उसे ‘नय’ कहते हैं।

जैन दर्शन में प्रत्येक नय के प्रारंभ में ‘स्यात्’ शब्द जोड़ने का निर्देश दिया गया है। ‘स्यात्’ शब्द से यह पता चलता है कि उसके साथ प्रयुक्त ‘नय’ की सत्यता किसी दृष्टि-विशेष पर निर्भर करती है। यही स्याद्वाद का सिद्धांत है। वस्तुतः स्याद्वाद वस्तु या पदार्थ के दूसरे धर्म या लक्षणों का प्रतिरोध किये बिना धर्म-विशेष/लक्षण-विशेष का प्रतिपादन करता है। अतः यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है। अनेकांतवाद व्यापक विचार-दृष्टि है, स्याद्वाद उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम है।

जैन दर्शन के अनुसार दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण प्रत्येक नय (परामर्श) को सात विभिन्न स्वरूपों में व्यक्त किया जा सकता है- स्यात् है (स्यात् अस्ति); स्यात् नहीं है (स्यात् नास्ति); स्यात् है और नहीं है (स्यात् अस्ति च नास्ति च); स्यात् कहा नहीं जा सकता (स्यात् अव्यक्तव्यम्); स्यात् है और कहा नहीं जा सकता (स्यात् अस्ति च अव्यक्तव्यम् च); स्यात् नहीं है और कहा नहीं जा सकता (स्यात् नास्ति च अव्यक्तव्यम् च); स्यात् है, नहीं है और कहा नहीं जा सकता (स्यात् अस्ति च नास्ति च अव्यक्तव्यम् च)। वस्तुतः इन सात नयों से ही वस्तु की सही व्याख्या होती है क्योंकि ये सात वस्तुनिष्ठ धर्म- सत्, असत, उभय, अव्यक्तव्यत्व, सत्व्यक्तव्यत्व, असत्व्यक्तव्यत्व, और सत्वासत्वाव्यक्तव्यत्व वस्तु में स्वभावतः हैं और स्वभाव में तर्क नहीं होता।

जैन दर्शन के अनुसार एक दृष्टि से जो नित्य प्रतीत होता है, वही दूसरी दृष्टि से अनित्य है। यद्यपि नित्यता और अनित्यता, एकता और अनेकता आदि परस्पर विरोधी धर्म हैं, किंतु उनका विरोध अपनी दृष्टि से है, वस्तु की दृष्टि से नहीं। वस्तु दोनों को आश्रय देती है, दोनों की सत्ता से ही वस्तु का स्वरूप पूर्ण होता है। इस प्रकार स्याद्वाद ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है और कथन का अहिंसावादी माध्यम है।

कभी-कभी जैन-बौद्ध जैसे अवैदिक दर्शनों को नास्तिक कहा जाता है, किंतु यह वर्गीकरण निराधार और दुराग्रहपूर्ण है। पाणिनीय व्याकरण के सूत्र पर काशिका और महाभाष्य लिखनेवाले क्रमशः कैयट तथा पतंजलि के अनुसार ‘जो परलोक, कर्मफल को मानता है, वह आस्तिक है और जो उसे नहीं मानता, वह नास्तिक है।’ इस आधार पर जैन और बौद्ध भी आस्तिक दर्शन सिद्ध होते हैं, क्योंकि इन दोनों दर्शनों में स्पष्ट रूप से परलोक, पुनर्जन्म और उसके जनक शुभ-अशुभ कर्मों को स्वीकार किया गया है। वस्तुतः जैन दर्शन उतना ही आस्तिक या नास्तिक है, जितना हिंदुओं का कोई भी दर्शन।

जैन संघ (Jain Association)

Jainism and Lord Mahavira
भगवान् महावीर

भगवान् महावीर के पूर्व ही जैन संघ की स्थापना हो चुकी थी। अनुत्तर योगी महावीर ने जैन धर्म अथवा श्रमण संघ का पुनर्संस्कार किया। उन्होंने अपनी अद्भुत संगठन शक्ति के द्वारा गणतंत्र पद्धति के आधार पर मुनि और गृहस्थ धर्म की अलग-अलग व्यवस्थाएँ बाँधी और मुनि (साधु), आर्यिका (साध्विकाएँ), श्रावक (गृहस्थ अनुयायी) व श्राविका द्धगृहणियां) के आधार पर चतुर्विध-तीर्थ को पुनर्गठित किया। इनमें से प्रथम दो श्रमण परिव्राजकों के थे और अंतिम दो गृहस्थों के।

महावीर ने पावा में सर्वप्रथम गौतम इंद्रभूति आदि ग्यारह ब्राह्मणों को निर्ग्रंथ-धर्म में दीक्षित किया जो उनके सर्वप्रथम अनुयायी थे। उन्होंने अपने सारे अनुयायियों को ग्यारह गणों (समूहों) में विभक्त किया और प्रत्येक गण (समूह) का गणधर इन्हीं ग्यारह ब्राह्मणों को बनाया। इन गणधरों के नाम हैं- गौतम इंद्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति, आर्यव्यक्त, सुधर्मा, मंडित (मंडिकेट), मौर्यपुत्र, अकंपित, अचलभ्राता, मेतार्य तथा प्रभास। इन्हीं गणों में से एक सुधर्मा भगवान् महावीर के बाद जैनसंघ का अध्यक्ष (प्रधान) हुआ।

इंद्रभूति और सुधर्मा को छोड़कर शेष सभी का निर्वाण महावीर के जीवन-काल में ही हो गया था। भगवान् महावीर ने संघ और निर्वाण का द्वार सभी वर्गों के लिए खोल दिया तथा स्त्रियों को भी पुरुषों के समान संघ में पूर्ण अधिकार प्रदान किया।

जैन धर्म के प्रमुख संप्रदाय (Major Sects of Jainism)

तीर्थंकर महावीर के समय तक अविछिन्न रही जैन परंपरा ईसा की तीसरी सदी में दिगंबर और श्वेतांबर नामक दो संप्रदायों में विभक्त हो गई। भद्रबाहुकृत जैनकल्पसूत्र से पता चलता है कि महावीर के 20 वर्षों बाद सुधर्मन् की मृत्यु हुई तथा उसके बाद जंबू 44 वर्षों तक संघ का अध्यक्ष रहा। अंतिम नंद शासक के समय में सम्भूतिविजय तथा स्थूलभद्र संघ के अध्यक्ष थे। यही दोनों प्राचीन जैन ग्रंथों- चौदह पूर्वों को जाननेवाले अंतिम व्यक्ति थे। सम्भूतिविजय की मृत्यु चंद्र्रगुप्त के राज्यारोहण के समय हो गई।

ई.पू. 310 के आसपास उत्तर भारत में बारह वर्ष का भयंकर अकाल पड़ा। आचार्य भद्रबाहु 12,000 जैन मुनियों (श्रमणों) के साथ दक्षिण की ओर वर्तमान तमिलनाडु और कर्नाटक चले गये, किंतु कुछ जैन साधु स्थूलभद्र के साथ उत्तर भारत में ही रुक गये। अकाल के कारण यहाँ रुके हुए साधुओं का निर्वाह आगमानुरूप नहीं हो पा रहा था, इसलिए उत्तर भारत के जैन भिक्षुओं ने उज्जैन में सभा की और अपनी कई क्रियाएँ शिथिल कर लीं। स्थूलभद्र ने उत्तर भारत में भिक्षुओं को श्वेत वस्त्र पहनने की अनुमति दी थी।

भद्रबाहु के बारह वर्ष बाद दक्षिण से लौटने पर मगध के जैन साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया। मगध में रहने वाले स्थूलभद्र के अनुयायी ‘श्वेतांबर’ कहे गये क्योंकि वे श्वेत वस्त्र धारण करते थे। भद्रवाहु और उनके समर्थक, जो नग्न रहने में विश्वास करते थे, ‘दिगंबर’ कहे गये। तब जैन धर्म में दिगंबर और श्वेतांबर दो संप्रदाय पैदा हो गये।

पाटलिपुत्र में जैन सभा (Jain Sabha in Pataliputra)

पवित्र जैन साहित्य का संकलन करवाने के उद्देश्य से स्थूलभद्र ने चतुर्थ शताब्दी ई.पू. में पाटलिपुत्र में जैन भिक्षुओं की एक सभा आयोजित की, किंतु भद्रबाहु के अनुयायियों ने इसमें भाग नहीं लिया। इस जैन समिति में केवल ग्यारह अंगों का ही संकलन हो सका। बारहवाँ अंग पूर्ण नहीं हो सका क्योंकि उसमें वर्णित चौदह पूर्वों की जानकारी स्थूलभद्र को पूर्णरूप से नहीं थी। भद्रबाहु ने चौदह पूर्वों में से केवल दस का ही ज्ञान स्थूलभद्र को दिया था। पाटलिपुत्र की सभा में जो निर्णय किये गये, वही श्वेतांबर संप्रदाय के मूल सिद्धांत बन गये।

बल्लभी (गुजरात) की महासभा

General Assembly of Ballabhi (Gujarat)

जैन धर्म का स्वरूप निश्चित करने के लिए छठी शताब्दी ई. में जैनियों की एक दूसरी महासभा बल्लभी (गुजरात) में आयोजित की गई। इस सभा की अध्यक्षता देवर्द्धिगणी क्षमाश्रमण ने की। इस सभा में प्राकृत भाषा में जैन धर्म के मूल ग्रंथों को लिपिबद्ध किया गया।

श्वेतांबर और दिगंबर

(Shwetambar and Digambar)

श्वेतांबर और दिगंबर दोनों संप्रदायों में मतभेद दार्शनिक सिद्धांतों से अधिक चरित्र, विशेषकर नग्नता को लेकर है। जैन धर्म के दोनों संप्रदायों में मुख्य भेद इस प्रकार हैं-

  1. दिगंबर संप्रदाय के मुनि वस्त्र नहीं पहनते हैं। ‘दिग्’ अर्थात् दिशा, दिशाएँ ही अंबर हैं जिसका, वह ‘दिगंबर’ है। श्वेतांबर संप्रदाय के मुनि श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।
  2. दिगंबर मत के तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ पूर्ण नग्न बनाई जाती हैं और उनका श्रृंगार नहीं किया जाता है, पूजन पद्धति में फल और फूल नहीं चढाये जाते हैं। श्वेतांबर तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ लंगोट और धातु की आँख, कुंडल सहित बनाई जाती हैं और उनका श्रृंगार किया जाता है।
  3. दिगंबर संप्रदाय में महावीर को त्रिशला का पुत्र माना गया है, जबकि श्वेतांबर विचारधारा में कल्पसूत्र, आचारांगसूत्र एवं भगवतीसूत्र के अनुसार महावीर सर्वप्रथम ब्राह्मणी देवानंदा के गर्भ में आये, फिर इंद्र ने इनको क्षत्राणी त्रिशला के गर्भ में स्थापित किया।
  4. दिगंबर परंपरा के अनुसार महावीर ने अचानक सांसारिक माया-मोह से दूर होकर गृहत्याग कर दिया। गृह-त्याग के पूर्व उन्होंने राजसी जीवन व्यतीत किया। श्वेतांबरों के अनुसार महावीर बचपन से ही दार्शनिक प्रवृत्ति के थे, किंतु माता-पिता के जीवित रहते उनके दबाव में गृह-त्याग नहीं कर पाये। उनकी मृत्यु के बाद ही गृह-त्याग संभव हो सका।
  5. दिगंबरों के अनुसार महावीर ने वैवाहिक जीवन नहीं जिया था। जैन ग्रंथों के अनुसार पाँच तीर्थंकरों ने कुमार जीवन व्यतीत किया था। महावीर उनमें से एक थे। श्वेतांबर महावीर को न केवल विवाहित मानते हैं बल्कि उनकी पुत्री अणोज्या का भी वर्णन करते हैं।
  6. दिगंबर संप्रदाय मानता है कि मूल आगम ग्रंथ चौदह पूर्व एवं बारह अंग लुप्त हो चुके हैं। श्वेतांबर विचारधारा के अनुसार केवल चौदह पूर्व ही नष्ट हुए थे तथा ग्यारह अंग समाप्त नहीं हुए हैं।
  7. दिगंबर के अनुसार साधारण उपासक जैन साहित्य का अध्ययन नहीं कर सकता है। श्वेतांबर विचारधारा के अनुसार यह सभी वर्गों के लिए संभव है।
  8. दिगंबर मतानुसार स्त्री शरीर से ‘कैवल्य ज्ञान’ संभव नहीं है। स्त्री तीर्थंकर तभी बन सकती है, जब वह पुनः पुरुष जन्म ले। श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी मानते हैं कि स्त्री कैवल्य की अधिकारिणी है। उन्होंने उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ को स्त्री माना है।
  9. दिगंबर मोर के पंख, तथा दातून के अतिरिक्त कुछ नहीं रखते हैं, जबकि श्वेतांबर चौदह वस्तुएँ (पात्र, पात्रबंध, पात्र स्थापन, पात्र पार्मजनिका, पटल, रजस्त्राण, गुच्छक, दो चादरें, ऊनी कंबल, रजोहरण, मुखवस्त्र, मातक व चोलपष्टक) रख सकते हैं।
  10. तीर्थों के जीवन चरित लिखते समय दिगंबर ‘पुराण’ शब्द का प्रयोग करते हैं, जबकि श्वेतांबर ‘चरित्र’ शब्द का उल्लेख करते हैं।
  11. जैन धर्म की दिगंबर शाखा में तीन शाखएँ हैं- मंदिरमार्गी, मूर्तिपूजक और तेरहपंथी। श्वेतांबर में शाखाओं की संख्या दो है- मंदिरमार्गी और स्थानकवासी। ये लोग मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं।

जैनियों की अन्य शाखाओं में ‘बीसपंथी’, ‘तारणपंथी’ और ‘यापनीय’ आदि कुछ और भी उप-शाखाएँ हैं। जैन धर्म के इन सभी संप्रदायों में थोड़ा-बहुत मतभेद होने के बावजूद भगवान् महावीर तथा अहिंसा, संयम और अनेकांतवाद में सबका समान विश्वास है।

जैन धर्म का योगदान (Contribution of Jainism)

अपने सीमित प्रभाव के बावजूद जैन धर्म ने भारत के सांस्कृतिक जीवन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। साहित्य, कला, दर्शन और समाज के क्षेत्र में जैन धर्म का विशेष योगदान रहा है। जैन विद्वानों ने लोक भाषाओं में अपनी कृतियों की रचना किया, जिसके कारण प्राकृत, अपभ्रंश, कन्नड़, तमिल, तेलगू आदि में जैन साहित्य मिलते हैं।

प्राकृत भाषा को विकसित करने में जैन लेखकों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्वमध्यकाल में हेमचंद्र्र राय जैसे विद्वानों ने काव्य, व्याकरण, ज्योतिष, नाटक, छंदशास्त्र आदि विविध विषयों पर प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं में साहित्य लिखकर इनका बहुमुखी विकास किया।

दक्षिण में कन्नड़ एवं तेलगू में भी कुछ जैन ग्रंथों की रचना की गई। तमिल ग्रंथ ‘कुरल’ के भी कुछ अंश जैनियों द्वारा ही रचित माने जाते हैं। इसके अलावा कुछ जैन ग्रंथ संस्कृत भाषा में भी मिलते हैं। इस प्रकार प्रादेशिक भाषाओं का विकास जैनियों ने किया।

प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य के विकास में भी जैनियों कोयोगदान महत्त्वपूर्ण रहा है। हस्तलिखित जैन ग्रंथों पर खींचे हुए चित्र पूर्वमध्ययुगीन चित्रकला के सुंदर उदाहरण हैं।

मध्य भारत, उड़ीसा, गुजरात, राजस्थान आदि अनेक स्थानों से जैन मंदिर, मूतियाँ, गुहास्थापत्य आदि के उदाहरण मिलते हैं।

उड़ीसा की उदयगिरि पहाड़ी से अनेक जैन गुफाएं मिली हैं। लोहानीपुर से मौर्यकालीन जिनमूर्तियों के दो घड़ मिले हैं। खजुराहो, सौराष्ट्र, राजस्थान आदि स्थानों से भव्य जैन मंदिर प्राप्त होते हैं। खजुराहो में कई जैन तीर्थंकरों- पार्श्वनाथ, आदिनाथ आदि के मंदिर हैं।

राजस्थान के आबू पर्वत पर स्थित दिलवाड़ा क्षेत्र में चार जैन मंदिर हैं जो जैन कला के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला से भी कई जैन मंदिर मिले हैं। यहाँ तीर्थंकरों की मूर्तियों से सुशोभित मंदिर ‘बस्ति’ और पहाड़ी चोटियों पर खुले आंगन की तरह मंदिरों को ‘बेत्त’ कहा जाता है जिनमें गोम्मटेश्वर की प्रतिमाएँ है। इस प्रकार भारतीय कला को समृद्धिशाली बनाने में जैन धर्म का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

दार्शनिक और सामाजिक क्षेत्र में अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांतवाद (स्याद्वाद) जैसी मौलिक सिद्धांत जैन धर्म की अद्वितीय देन हैं जो भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि हैं। संप्रदायातीत दृष्टि, समभाव एवं समदृष्टि, सामाजिक समता एवं एकता, आत्मतुल्यता एवं लोकमंगल की आचरणमूलक भूमिका, जीवन के सकारात्मक मूल्य के रूप में अहिंसा और अहिंसा से अनुप्राणित अर्थतंत्र के रूप में अपरिग्रह, वैचारिक अहिंसा का पर्याय-अनेकांतवाद और प्राणिमात्र के कल्याण की भावना जैन धर्म की ही देन है। पहली बार जैन धर्म ने ही ‘जिओ और जीने दो’ का सूत्र प्रदान किया।

इस प्रकार भगवान् महावीर स्वामी ने किसी नये धर्म की स्थापना नहीं की, वरन् पार्श्वनाथ के विचारों को ही संशोधित रूप में प्रचारित किया। महावीर की महानता इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने धर्म को कर्मकांडों, अंधविश्वासों, पुरोहितों के शोषण तथा भाग्यवाद की अकर्मण्यता की जंजीरों के जाल से बाहर निकाला और अपने युग के संशयग्रस्त मानव-समाज के विवेक को जागृत कर प्राणि-मात्र की समता का उद्घोष किया। उन्होंने अहिंसा को परमधर्म के रूप में मान्यता प्रदान कर, धर्म की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया और आर्थिक विषमता के समाधान का मार्ग परिग्रह-परिमाण-व्रत के विधान द्वारा प्रस्तुत किया। उन्होंने सामाजिक सद्भाव, अनुराग, विश्वन्धुत्व के लिए आत्मतुल्यता एवं समभाव की आचरणमूलक भूमिका प्रदान की।