जैन दर्शन में ज्ञान मीमांसा (Epistemology in Jain Philosophy)

व्यवहार की दृष्टि से ज्ञान का अर्थ जानना, समझना या परिचित होना होता है। प्रत्येक प्राणी अपने इंद्रियों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। अध्यात्म की दृष्टि से ज्ञान का अर्थ परमज्ञान है, जिसके द्वारा मनुष्य वस्तु की प्रकृति या वास्तविकता को जानता है।

परमज्ञान का अर्थ है- आत्मा को जानना, आत्मा का साक्षात्कार करना। ज्ञान-साधन आत्मज्ञान प्राप्त करने का साधन है। परमज्ञान प्रमा है।

प्रमा का अर्थ है- प्रत्यक्ष ज्ञान, प्रतिबोध, यथार्थ ज्ञान। यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का उपाय प्रमाण की रीति हैं। जाननेवाला प्रमाता है। ज्ञान का अवलंबन ज्ञेय अथवा प्रमेय है। तत्त्वज्ञान प्राप्त करने का साधन अर्थात् प्रमा का करण प्रमाण है।

भारतीय दर्शनों में चार्वाक केवल इंद्रियों के द्वारा प्राप्त ज्ञान को ही प्रत्यक्ष प्रमाण मानता है। नैयायिक चार प्रमाण मानते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द। वेदांती और मीमांसक इन चार प्रमाणों के अलावा अनुपलब्धि और अर्थापत्ति को भी प्रमाण मानते हैं। सांख्य दर्शन में प्रत्यक्ष, अनुमान, और शब्द प्रमाण मान्य हैं। बौद्धों ने प्रत्यक्ष और अनुमान दो भेद किए हैं- ‘प्रत्यक्ष अनुमानं च’।

जैन दर्शन में प्रमाण या निर्णायक ज्ञान आत्मा का गुण है। कहीं-कहीं तो ज्ञान और आत्मा को एक ही मान लिया गया है। भेद दृष्टि से आत्मा ज्ञाता है, एवं ज्ञान जानने का साधन।  व्यवहारनय में आत्मा और ज्ञान में भेद है, किंतु निश्चयनय में आत्मा और ज्ञान में कोई भेद नहीं है। अभेद दृष्टि से ज्ञाता और ज्ञान दोनों आत्मा है। व्यवहारदृष्टि से केवली सभी द्रव्यों को जानता है। परमार्थतः आत्मा को ही जानता है।

ज्ञान का सामान्य धर्म है कि वह अपने आपको जानता हुआ ही दूसरे पदार्थ को जनता है। इसीलिए ज्ञान को स्वपरभासी कहा गया है। जिस प्रकार सूर्य अपने को प्रकाशित करता है तथा संसार की अन्य वस्तुओं को भी प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ज्ञान भी स्वपरभासी है।

राजप्रश्नीय सूत्र के अनुसार निर्ग्रन्थ पाँच प्रकार के ज्ञान मानते हैं- आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यायज्ञान, केवलज्ञान।

अवधिज्ञान, मनः पर्यायज्ञान और केवलज्ञान ही प्रत्यक्ष के भेद है। क्षेत्र, विशुद्धि आदि की दृष्टि से इनमें तारतम्य है। आभिनिबोधिकज्ञान और श्रुतज्ञान परोक्ष ज्ञान के भेद हैं। आभिनिबोधिकज्ञान को मतिज्ञान भी कहते हैं। श्रुतज्ञान का आधार मन है। मतिज्ञान का आधार इन्द्रियाँ और मन दोनों है। मति, श्रुतादि के अनेक अवांतर भेद हैं। जैन दार्शनिकों ने प्रमाण का दो भेद किया है- प्रत्यक्ष और परोक्ष (प्रमाणं द्विधा। प्रत्यक्षं परोक्षं च)।

प्रत्यक्ष ज्ञान

जैन दर्शन की ज्ञान-मीमांसा में प्रत्यक्ष ज्ञान की अर्थवत्ता अन्य भारतीय दर्शनों में मान्य अर्थवत्ता से भिन्न है। जैन दर्शन में आत्मप्रत्यक्ष (इंद्रियों से निरपेक्ष ज्ञान को) को ही वास्तविक प्रत्यक्ष माना गया है और इंद्रियों के माध्यम से ग्रहीत ज्ञान को परोक्ष अथवा अप्रत्यक्ष ज्ञान माना गया है।

परवर्ती काल में प्रत्यक्ष को इंद्रिय-प्रत्यक्ष एवं नोइन्द्रिय-प्रत्यक्ष इन दो भागों में बाँटा गया। इंद्रिय-प्रत्यक्ष में इंद्रियजन्य ज्ञान को स्थान मिला, जो वास्तव में इंद्रियाश्रित होने से परोक्ष है।

नोइंद्रिय-प्रत्यक्ष में वास्तविक प्रत्यक्ष रखा गया, जो इंद्रियाश्रित न होकर सीधा आत्मा से उत्पन्न होता है। इंद्रियप्रत्यक्ष जैनेत्तर दृष्टि का, जिसे लौकिक दृष्टि कहा जा सकता हैं, प्रतिनिधित्व करता है। नोइंद्रियप्रत्यक्ष जैन दर्शन की वास्तविक परंपरा का ही द्योतक है।

जैन दर्शन में ज्ञान से अभिप्राय सम्यक् ज्ञान से है और यही प्रमाण है। जिस प्रकार से जीव एवं अजीव पदार्थ अवस्थित हैं, उस प्रकार से उसको जानना सम्यक् ज्ञान है।

मिथ्याज्ञान में असंगत, असंबद्ध एवं वचन-विरोधी ज्ञान का आभास होने के कारण इसको अप्रमाण माना जाता है।  मिथ्याज्ञान के तीन भेद हैं- कुमति, कुश्रुत एवं कुअवधि।

प्रमाण एवं नय

जैन दर्शन में सम्यक् ज्ञान के दो भेद बताये गये हैं- प्रमाण ज्ञान एवं नयज्ञान। जैन दर्शन में प्रमाण के साथ-साथ ‘नय‘ को भी ज्ञान का साधन माना गया है। प्रमाण ज्ञान अंशभेद किये बिना पदार्थ को समग्र भाव से जानता है। जो पदार्थ जिस रूप में अवस्थित है, उसे उसी रूप में स्वीकार करनेवाला ज्ञान प्रमाण है।

वस्तु अनंतधर्मात्मक है और प्रत्येक पदार्थ में विविध गुण एवं उसके अनंत पर्याय हैं। वस्तु को उसके एक-एक धर्म (एकांत) द्वारा जानना नयज्ञान है। सम्यक् एकांत नय है। सम्यक् अनेकांत प्रमाण है। सामान्यतः प्रमाण समग्र वस्तु का ज्ञान देनेवाला होता है, जबकि नय वस्तु के किसी अंशविशेष का अर्थात् एकांगी ज्ञान प्रदान करते हैं।

‘प्रमाण’ तथा ‘नय’ दोनों के द्वारा किसी विषय का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जाता है (प्रमाणनयैरधिगम)।  प्रमाण और नय में मात्र इतना अंतर है कि प्रमाण सकलादेशी है और नय विकलादेशी है।

अतीन्द्रिय ज्ञान या नोइंद्रियप्रत्यक्ष

प्रत्यक्ष का लक्षण वैशद्य या स्पष्टता है ‘विशदः प्रत्यक्षम्’ अर्थात् जिसके प्रतिभास के लिए किसी प्रमाणांतर की आवश्यकता न हो अथवा जो ‘यह इदंतया प्रतिभासित होता हो, उसे वैशद्य कहते हैं (प्रमाणान्तरा व्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यम)। पारमार्थिक अपरोक्ष ज्ञान वह है, जिसमें इंद्रियादि की सहायता के बिना आत्मा और ज्ञेय वस्तुओं का साक्षात् संबंध होता है।

चार्वाक तथा मीमांसकों को छोड़कर शेष सभी भारतीय दार्शनिक मान्यताएँ अतींद्रिय ज्ञान में विश्वास करती हैं। आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी अतींद्रिय ज्ञान की तथ्यात्मकता स्वीकार करते हैं। अपरोक्ष ज्ञान (अतींद्रिय ज्ञान) तीन प्रकार के होते हैं- अवधि, मनः पर्याय तथा केवल ज्ञान।

अवधि ज्ञान

इंद्रियों तथा मन के निमित्त के बिना रूपी पदार्थों और उनकी कुल पर्यायों को स्पष्ट जानना अवधिज्ञान है। अवधि का विषय केवल रूपी पदार्थ हैं, अर्थात् जिसमें रूप, रस, गंध तथा स्पर्श हो, वही अवधि-ज्ञान का विषय बनता है। अवधि ज्ञान की सीमा लोकाकाश तक ही है।

मनःपर्याय

अवधि ज्ञान से रूपी पदार्थ का ज्ञान होता है जबकि मनः पर्याय ज्ञान से दूसरों के मनोद्रव्य की पर्यायों का ज्ञान होता है (‘तदन्तभागे मनः पर्यायस्य)।

अवधि ज्ञान और मनःपर्याय ज्ञान में गुणात्मक एवं स्वरूपात्मक अंतर है। मनःपर्यायज्ञानी भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों के मनोगत विचारों को जानता है। इंद्रिय अथवा मन की सहायता के बिना द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा सहित रूपी पदार्थों को प्रत्यक्ष जानना अवधि ज्ञान है तथा द्रव्य क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादा सहित मन की पर्यायों को प्रत्यक्ष जानना मनःपर्याय ज्ञान है।

अवधि और मनःपर्याय ज्ञान में विशुद्धता, क्षेत्र, स्वामी और विषय की भिन्नता होती है। यह मनुष्य क्षेत्र तक सीमित है तथा गुण के कारण उत्पन्न होता है। अवधि ज्ञान में मन के ज्ञान से अर्थ का ज्ञान होता है, क्योंकि मनःपर्याय ज्ञान से साक्षात् अर्थ-ज्ञान का होना असंभव है, उसका विषय रूपीद्रव्य का अनंतवाँ भाग है।

मनःपर्याय ज्ञान दो प्रकार का होता है- ऋजुमति और विपुलमति। क्षेत्र और कालापेक्षा की दृष्टि से विपुलमति ज्ञान, ऋजुमति ज्ञान से विस्तीर्ण और गंभीर होता है।

विपुलमति ज्ञान में सभी प्रकार के मानसिक रूपी पदार्थों का ज्ञान होता है। इसमें अपने तथा दूसरों के जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-अलाभ इत्यादि का भी ज्ञान होता है।

ऋजुमति ज्ञान होकर छूट भी जाता है, किंतु विपुलमति विशुद्ध ज्ञान है तथा वह केवलज्ञान होने तक बना रहता है, छूटता नहीं। ऋजुमति क्षणस्थायी होता है, जबकि विपुलमति स्थायी। इस प्रकार अवधिज्ञान एवं मनःपर्याय ज्ञान साधना की उत्तरोत्तर विकसित सीढि़याँ हैं।

केवल ज्ञान

केवल ज्ञान का विषय सर्वद्रव्य और उसकी सब पर्यायें हैं अर्थात् केवल ज्ञान एक ही साथ सभी पदार्थों और उनकी सभी पर्यायों को जानता है। केवल ज्ञानी लोक और अलोक दोनों को जानने लगता है।

भगवान् महावीर की जीवनगाथा में केवल ज्ञान प्राप्ति का विवरण मिलता है। केवल ज्ञान की प्राप्ति के क्रम में सर्वप्रथम मोहनीय कर्म का क्षय होता है, तदनंतर पाँच ज्ञानावरण कर्म, चार दर्शनावरण कर्म तथा पाँच अंतराय कर्मों का क्षय करने के बाद अंततः तिरसठ प्रवृत्तियों का नाश करके केवलज्ञान प्राप्त होता है। आत्मा की ज्ञान-शक्ति का पूर्ण विकास या आविर्भाव ही केवलज्ञान है। केवलज्ञान शुद्ध-निर्मल, सकल परिपूर्ण असाधारण एवं अनन्त है। केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष होने के कारण संपूर्ण है।

प्रत्यक्ष ज्ञान के इन तीनों भेदों में अवधिज्ञान एवं मनःपर्याय ज्ञान की सीमाएँ निर्धारित हैं, इसीलिए इनको विकल ज्ञान कहा गया है। केवलज्ञान सकल ज्ञान है, सफल ज्ञान है क्योंकि यह पूर्ण ज्ञान है।

‘केवल ज्ञान में समस्त द्रव्यों की तीनों कालों की पर्यायें एक साथ ज्ञात होने पर भी प्रत्येक पर्याय का विशिष्ट स्वरूप प्रदेश, काल, आकारादि विशेषताएँ स्पष्ट ज्ञात होती हैं। संपूर्ण प्रदेशों की अविकल सत्ता केवली के ज्ञान का स्पष्ट विषय होती है।

परोक्ष ज्ञान (इंद्रिय प्रत्यक्ष)

आत्मा जब इंद्रिय और मन के माध्यम से ज्ञेय को जानता है, तब वह परोक्ष ज्ञान है। जैन परंपरा इंद्रियों के माध्यम से ग्रहीत ज्ञान को परोक्ष ज्ञान कहती है, जबकि जैनेत्तर भारतीय दर्शन प्रायः मानते हैं कि इंद्रियों से प्रत्यक्ष ज्ञान तथा अन्य साधनों से परोक्ष ज्ञान प्राप्त होता है।

परवर्ती जैन चिंतकों ने भारतीय दार्शनिक मतवादों के प्रभाव के कारण इंद्रियों के माध्यम से ग्रहीत ज्ञान को लौकिक दृष्टि से ‘प्रत्यक्ष’ नाम दिया है।

नन्दि सूत्रकार ने इसे ‘इंद्रिय प्रत्यक्ष’ तथा जिनभद्र ने ‘संव्यवहार प्रत्यक्ष’ नाम से अभिहित किया है, किंतु तत्त्वार्थाधिगम सूत्र में जिनभद्र की विचारधारा से असहमति व्यक्त की गई है।

वस्तुतः मतिज्ञान एवं श्रुतज्ञान के उपयोग के समय इंद्रिय या मन निमित्त होते हैं, इसलिए पर-अपेक्षा के कारण उन्हें परोक्ष कहा गया है, स्व-अपेक्षा से पाँचों प्रकार के ज्ञान प्रत्यक्ष हैं। मन का संबंध एक साथ एक इंद्रिय से ही होता है। इस कारण परोक्ष ज्ञान में एक काल में एक पदार्थ की एक ही पर्याय ही जानी जा सकती है।

लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार के हैं, जिन्हें मति और श्रुति की संज्ञा दी गई है। श्रुतिज्ञान मतिपूर्वक ही होता है, जबकि मतिज्ञान के लिए आवश्यक नहीं कि वह श्रुतिपूर्वक ही हो।

मति ज्ञान (आभिनिबोधिक ज्ञान)

इंद्रिय और मन से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान मतिज्ञान है। आगमों में मतिज्ञान को आभिनिबोधिकज्ञान कहा गया है। उमास्वाति ने मति, स्मृति, संज्ञा, चिंता और अभिनिबोध को एकार्थक बताया है, तो भद्रबाहु ने इसके लिए ईहा, अपोह, विमर्श, मार्गणा, गवेषणा, संज्ञा, स्मृति, मति, प्रज्ञा शब्द का प्रयोग किया है।

मन को सर्वार्थग्राही इंद्रिय कहा गया है- ‘सर्वार्थग्रहणं मनः’। उपादान आत्मा ही होता है, उसके कार्य के समय निमित्त मात्र आरोप कारण होता है।

आचार्य उमास्वामी ने मतिज्ञान को ‘सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष’ भी कहा गया है। मतिज्ञान इंद्रिय-प्रत्यक्ष के चार भेद हैं- अवग्रह, ईहा, अवाय या अपाय एवं धारणा।

अवग्रह

इंद्रिय और अर्थ का संबंध होने पर नाम आदि की विशेष कल्पना से रहित सामान्य मात्र का ज्ञान अवग्रह है (अक्षार्थयोगे दर्शनानन्तरमर्थ-ग्रहणमवग्रहः)।

अवग्रह ज्ञान में निश्चित प्रतीति नहीं होती कि किस पदार्थ का ज्ञान हुआ है। अवग्रह ज्ञान के दो प्रकार हैं- व्यंजनावग्रह तथा अर्थावग्रह। अर्थ और इंद्रियों के संयोग के पूर्व का अव्यक्त ज्ञान व्यंजनावग्रह है। यह चक्षु तथा मन के बिना होता है।

अर्थावग्रह सामान्य ज्ञान रूप होता है, संयोग रूप नहीं। इसलिए यह चक्षु और मन से होता है, इन दोनों का विषयग्रहण सामान्य ज्ञान रूप ही है। इसे व्यक्त ज्ञान कहा गया है। जैसे-यदि कोई व्यक्ति सो रहा है और उसे पुकारा जाता है, तो प्रथम बार के कुछ शब्द कान में जाकर शान्त भाव में टकराकर रह जाते हैं तथा उनकी अभिव्यक्ति नहीं होती, पुनः तीन-चार बार पुकारने पर कान में अत्यधिक शब्द एकत्र हो जाते हैं, तब उसे यह ज्ञान होता है कि ‘कोई बुला रहा है’। लेकिन बार-बार पुकारने के बाद ‘उसे कोई बुला रहा है’ का ज्ञान होता हैं। इन दोनों परिस्थितियों में पहली स्थिति व्यंजनावग्रह की है तथा दूसरी अर्थावग्रह की।

ईहा

इंद्रियार्थ सन्निकर्ष से उत्पन्न सामान्य प्रतीति के फलस्वरूप दृश्य विषय के गुणों के ज्ञान की इच्छा ही ईहा है (अवगृहीतार्थ की विशेषकांक्षणमीहा)। यद्यपि ईहा में पूर्ण निर्णय नहीं हो पाता, फिर भी ज्ञान निर्णय की ओर झुक अवश्य जाता है।

ईहा संशय की स्थिति नहीं है, क्योंकि इसमें ज्ञान का झुकाव न स्वीकारात्मक होता है और न ही नकारात्मक। इसका उदाहरण है कि पुकारनेवाला पुरुष है या स्त्री?

अवाय

ईहितार्थ का विशेष निर्णय अवाय है- ‘ईहितविशेष निर्णयो वायः’। जो गुण पदार्थ के अंदर नहीं है, उनका निवारण अवाय है और जो गुण पदार्थ में है, उनका स्थितिकरण धारण है। असद्गुणों का निवारण या सद्गुणों का स्थितिकरण अथवा दोनों एक ही साथ हो- सभी अवाय के अंतर्गत ही हैं।

धारणा

अवाय की अपेक्षा वस्तु का निर्दिष्ट ज्ञान धारणा में अधिक दृढ़ होता है। धारणा को स्मृति का हेतु कहा गया है (स्मृतिहेतुः धारणा)। धारणा में दृश्य वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान होने के पश्चात् द्रष्टा के अंतःकरण एवं स्मृति में उस वस्तु का संस्कार बन जाता है।

आत्मज्ञान के संबंध में मतिज्ञान में जब आत्मा, इंद्रियों तथा मन द्वारा पदार्थों में प्रवर्तमान बुद्धि को मर्यादित करता है तथा पर पदार्थ से विमुख होकर स्वयं स्वसन्मुख लक्ष करता है, तब आत्मा-संबंधी ज्ञान का आभास होता है, यह आत्मा का अर्थावग्रह हुआ।

स्वविचार के निर्णय की ओर उन्मुख होना ईहा तथा निर्णय करना अवाय है। कालांतर में आत्मा-संबंधी संशय तथा विस्मरण का न होना धारणा है।

श्रुतज्ञान

श्रुत का अर्थ है- सुना हुआ, ध्यान लगाकर श्रवण किया हुआ। श्रुत ज्ञान का अर्थ है- ‘सुनकर ज्ञान प्राप्त करना’ अथवा ‘धर्मशास्त्रों से प्राप्त ज्ञान’। श्रुतज्ञान मतिपूर्वक होता है (श्रुतं मतिपूर्वद्धनद्वादशभेदम्)।

श्रुतज्ञान आगमों के अध्ययन और आप्त-वचनों के श्रवण से प्राप्त होता है। यह साक्षात् तीर्थंकर द्वारा प्रकाशित एवं गणधरों द्वारा सूत्रबद्ध ग्रन्थों से प्राप्त होता है। आवश्यक निर्युक्ति के अनुसार ‘जितने अक्षर हैं तथा उनके जितने विविध संयोग हैं, उतने ही श्रुतज्ञान के भेद हैं।’

अप्रत्यक्ष प्रमाण

परोक्ष प्रमाण प्रत्यक्ष प्रमाण के विपरीत हैं। इस प्रमाण में अविशदता अथवा अस्पष्टता होती है- ‘अविशदः परोक्षम्।’  परोक्ष ज्ञान के पाँच भेद स्वीकार किये गये हैं- 1. स्मृति, 2. प्रत्यभिज्ञान, 3. तर्क, 4. अनुमान और 5. आगम

स्मृत्यादि पाँचों ज्ञान ज्ञानांतरापेक्ष हैं। स्मरण में धारणा रूप अनुभव (मति), प्रत्यभिज्ञान में अनुभव तथा स्मरण, तर्क में अनुभव, स्मृति और प्रत्यभिज्ञान, अनुमान में लिंगदर्शन, व्याप्ति स्मरण और आगम में शब्द, संकेतादि अपेक्षित हैं- उनके बिना उनकी उत्पत्ति संभव नहीं है।

स्मृति

स्मृति, जो ज्ञान अनुभव की वासना की जागृति के फलस्वरूप उत्पन्न होता है- ‘वासनोद्बोधहेतुकात् दिव्याकारा स्मृतिः’। स्मृति अतीत के अनुभव का स्मरण करानेवाला ज्ञान है।

स्मृति को प्रमाण न मानने पर अनुमान भी प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि लिंग एवं लिंगी का संबंध-ग्रहण प्रत्यक्ष का विषय नहीं है, और लिंग-लिंगी का संबंध स्मृति के अभाव में स्थापित नहीं किया जा सकता है।

प्रत्यभिज्ञान

प्रत्यभिज्ञान ज्ञान दर्शन एवं स्मरण से उत्पत्र होता है, जिससे ‘यह वही है‘ का बोध होता है। प्रत्यभिज्ञान ज्ञान में प्रत्यक्ष और स्मृति दोनों का संकलन रहता है। प्रत्यभिज्ञान ज्ञान प्रमाण में उपमान वैलक्षण्य, भेद, अभेद आदि सभी का ग्रहण होता है।

तर्क

उपालम्भानुपलंभ निमित्त ज्ञान को तर्क की संज्ञा दी जाती है। इसे ‘ऊह’ भी कहते हैं (उपालम्भानुपलम्भनिमित्तं व्याप्तिज्ञानमूहः)। तर्क ज्ञान में लिंग के सद्भाव से साध्य के सद्भाव का ज्ञान होता है तथा इसके विपरीत साध्य के असद्भाव का ज्ञान होता है। इसके अंतर्गत धूम को लिंग तथा अग्नि को साध्य माना जाता है। जिस प्रकार धूम के होने पर अग्नि होती है, वैसे ही अग्नि के अभाव में धूम नहीं हो सकता।

जिस प्रकार प्रत्यक्ष का विषय वर्तमान काल है, उसी प्रकार तर्क का विषय भूत, वर्तमान तथा भविष्यत् काल है। यह अनुमान का आधार भी है, क्योंकि तर्क से व्याप्ति ज्ञान होने पर ही अनुमान की प्रवृत्ति संभव हो सकती है।

अनुमान

साधन से साध्य का ज्ञान होना अनुमान है (साधनात् साध्यविज्ञानमनुमानम्)। जैसे धूम (साधन) को देखकर अग्नि (साध्य) का अनुमान करना।

साधन का अर्थ है- हेतु अथवा लिंग। साधन एवं साध्य के बीच जो संबंध होता है, उसे अविनाभाव संबंध कहते हैं। अनुमान के दो भेद स्वीकार किए गये हैं- 1. स्वार्थानुमान, 2. परार्थानुमान। साध्य के साथ अविनाभाव संबंध से रहनेवाले स्वनिश्चित साधन से साध्य का ज्ञान करना स्वार्थानुमान है।

स्वार्थानुमान के पाँच प्रकार के साधन माने गये हैं- स्वभाव, कारण, कार्य, एकार्थ-समवायी और विरोधी (स्वभावः कारणं कार्यमेकार्थसमवायि विरोधि चेति पंचया साधनम्)।

साधन तथा साध्य के अविनाभाव संबंध के कथन से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान परार्थानुमान कहा जाता है। परार्थानुमान ज्ञानात्मक है, किंतु उपचार से उसे बतानेवाले वचन को भी परार्थानुमान कहा गया है। परार्थानुमान के पाँच अवयव हैं- प्रतिज्ञा  (साध्य का निर्देश), हेतु (साधनत्व को अभिव्यक्त करनेवाला वचन), उदाहरण (दृष्टान्त), उपनाम (हेतु का धर्मी में उपसंहार) तथा निगमन (साध्य का पुनर्कथन)।

पाँचों अवयवों से युक्त परार्थानुमान का पूर्णरूप इस प्रकार  है- इस पर्वत में अग्नि है, क्योंकि इसमें धूम है। जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है- जैसे पाकशाला। धूम और अग्नि के बीच के संबंध को ‘व्याप्ति‘ कहा जाता है।

जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि है, इस प्रकार के साहचर्यनियम को व्याप्ति कहते हैं। लिंग एवं साध्य के बीच इस प्रकार का व्याप्य-व्यापक भाव ही अनुमान का मुख्य कारण होता है।

आगम

आप्त पुरुष के वचन से आर्विभूत होनेवाला अर्थ-संवेदन आगम है (आप्तवचनादार्विभूतमर्थसंवेदनमागमः)। आप्त पुरुष का अर्थ है- तत्त्व को यथावस्थित जानने वाला व यथावस्थित निरुपण करनेवाला। उपचार से आप्त के वचनों का संग्रह भी आगम है। परार्थानुमान से यह इसलिए अलग है कि इसमें आप्तत्व अनिवार्य है।

लौकिक और लोकोत्तर के भेद से आप्त दो प्रकार के होते हैं- साधारण व्यक्ति लौकिक आप्त हो सकते हैं, जबकि लोकोत्तर आप्त तीर्थंकरादि विशिष्ट पुरुष ही होते हैं।

नय-विमर्श

अभिनव धर्मभूषण ने ‘प्रमाणनयैरधिगमः’ के आधार पर न्याय का लक्षण बताते हुए कहा है कि ‘प्रमाण-नयात्मको न्यायः अर्थात् प्रमाण और नय न्याय हैं क्योंकि इन दोनों के द्वारा पदार्थों का सम्यक् ज्ञान होता है। प्रमाण तथा नय दोनों ही ज्ञानात्मक पर्याय हैं, तथा इन दोनों में निकटवर्ती संबंध है।

जब मन का कोई विकल्प वस्तु को अखंड भाव से स्वीकार करता है, तब प्रमाण ज्ञान होता है तथा जब किसी एक अंश को मुख्य करके दूसरे अंश को गौण करके वस्तु को स्वीकार करता है, तब वह नयज्ञान होता है। प्रमाण ज्ञान में अंशभेद अविवक्षित रहता है, जबकि नयज्ञान में अंशभेद विवक्षित होता है।

‘अनन्तधर्मात्मकं वस्तु’ के आधार स्वरूप धर्म को ग्रहण करनेवाले अभिप्राय भी अनन्त होते हैं, इसलिए नय भी अनंत कहे जा सकते हैं। जितने वचन-विकल्प हैं, उतने ही नय भी संभव हैं।

नयों के मूलतः दो भेद हैं- 1. द्रव्यार्थिक नय तथा 2. पर्यायार्थिक नय। इनमें सन्दर्भ एवं दृष्टि भेद से भिन्नत्व है। जो पर्याय को गौण करके द्रव्य को ग्रहण करता है, उसे द्रव्यार्थिक नय कहते हैं। द्रव्यार्थिक नय तीन प्रकार का है- 1. नैगम, 2. संग्रह, 3. व्यवहार। जो द्रव्य को गौण करके पर्याय को ग्रहण करता है, उसे पर्यायार्थिक नय कहते हैं। पर्यायार्थिक नय के चार भेद हैं- 1. ऋजुसूत्र,  2. शब्द, 3. समाभिरूढ़, 4. एवंभूत।

नैगम नय

नैगम नय में गुण और गुणी, अवयव और अवयवी, जाति और जातिमान, क्रिया तथा कारक, भेद और अभेद आदि की विवक्षा की जाती है। दूसरे शब्दों में, भेद का ग्रहण करते समय अभेद को गौण तथा भेद को मुख्य, और अभेद का ग्रहण करते समय भेद गौण और अभेद को मुख्य समझना नैगम है। जैसे जीव कहने से ज्ञानादि गुण गौण होकर जीव-द्रव्य ही मुख्य रूप में विवक्षित होता है।

नैगम नय में अनेक प्रकार के सामान्य एवं विशेष ग्राहक ज्ञान के द्वारा वस्तु तत्त्व का निश्चित किया जाता है। जब अवयव और अवयवी, गुण और क्रियावान आदि में सर्वथा भेद माना जाता है, तब नैगमाभास होता है, क्योंकि गुण गुणी से पृथक् अपनी सत्ता नहीं रखता और न ही गुणों की अपेक्षा करके गुणी ही अपना अस्तित्व रख सकता है। नैगम नय का अन्य प्रकार से भी लक्षण किया गया है जैसे जो भावी कार्य के संकल्प को बतलाता है, वह नैगम नय है।

संग्रह नय

सामान्य या अभेद को स्वीकार करनेवाली दृष्टि संग्रह नय कहलाती है। प्रत्येक पदार्थ के सामान्य विशेषात्मक अथवा भेद विभेदात्मक, इन दो धर्मों में से सामान्य एवं विशेष के प्रति उपेक्षाभाव इस नय में होता है। संग्रह नय जो प्रतिपक्ष की अपेक्षा के साथ ‘सन्मात्र’ को ग्रहण करता है वह संग्रह नय है। जैसे ‘सत्’ कहने पर चेतन, अचेतन सभी पदार्थों का संग्रह हो जाता है, किंतु सर्वथा सत् कहने पर चेतन, अचेतन विशेषों का निषेध होने से वह संग्रहाभास है।

व्यवहार नय

संग्रह नय द्वारा गृहीत अर्थ का विधिपूर्वक अवहरण करना व्यवहार नय कहलाता है। दूसरे शब्दों में, गृहीत सामान्य का भेदपूर्वक ग्रहण करना व्यवहार-नय है। व्यवहार नय भेदपूर्वक द्रव्य का ग्रहण करता है, फलतः इसका अन्तर्भाव पर्यायार्थिक नय में नहीं अपितु द्रव्यार्थिक नय में होता है। व्यवहार नय का मुख्य प्रयोजन व्यवहार की सिद्धि है। पर मात्र कल्पना से जो भेद करता है, वह व्यवहारनयाभास है।

ऋजुसूत्र नय

वर्तमान समय में होनेवाले पर्याय को मुख्य रूप से ग्रहण करनेवाले अध्यवसाय को ऋजुसूत्र नय कहते हैं। ऋजुसूत्र नय में भेद अथवा पर्याय की विवक्षा से कथन किया जाता है।

ऋजुसूत्र नय मानता है कि वस्तु की प्रत्येक अवस्था भिन्न है, एक क्षण तथा दूसरे क्षण की अवस्था में भेद है तथा दोनों अलग-अलग क्षण अपने आप में सीमित हैं, जैसे- ‘बगुला उजला है’, इस वाक्य में ‘बगुला’ तथा ‘उजलापन’ की जो एकता है, उसकी उपेक्षा करने के लिए यह नय कहता है कि बगुला, बगुला है तथा उजलापन, उजलापन है।

वस्तुतः बगुला तथा उजलापन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हैं। इसकी विशेषता है कि इस नय में पर्याय की मुख्यता रहती है, किंतु द्रव्य का अस्तित्व गौण रूप से वर्तमान रहता है।

शब्द नय

जो काल, कारक और लिंग के भेद से शब्द में कथंचित् अर्थभेद को बतलाता है, वह शब्दनय है। शब्द नय के अनुसार प्रत्येक शब्द का एक विशेष अर्थ होता है।

शब्द के उच्चारण से वस्तु के उन गुणों का स्मरण हो जाता है, जिसकी वह द्योतक है, यद्यपि यह अनेक पर्याय अर्थात् अनेक शब्दों द्वारा सूचित वाच्यार्थ को एक ही पदार्थ समझता है, जैसे कुम्भ, कलश तथा घट आदि शब्द एक ही पदार्थ के वाचक हैं।

दूसरे शब्दों में काल, कारक, लिंग तथा संख्या के भेद से शब्दभेद होने पर उनके भिन्न अर्थों का ग्रहण करनेवाला शब्द नय है।  ‘दिल्ली शहर था’ और ‘दिल्ली शहर है’ वाक्यों में अर्थ-भेद स्पष्ट है। काल के भेद से यहाँ अर्थ में भेद उत्पन्न हो गया है।

इसी प्रकार शब्दनय लिंगों से अर्थ में भिन्नता आती है, क्योंकि स्त्रीलिंग से वाच्य अर्थ का बोध पुल्लिंग में नहीं हो सकता। पुनः उपसर्ग के कारण एक ही धातु के भिन्न-भिन्न अर्थ हो जाते हैं।

अर्थभेद को कथं चित् माने बिना शब्दों को सर्वथा नाना बतलाकर अर्थ भेद करना शब्दनयाभास है।

समभिरूढ़ नय

जो पर्याय भेद पदार्थ का कथंचित् भेद निरूपित करता है, वह समभिरूढ़ नय है। शब्दों को उनकी रूढि़ के अनुसार पृथक् करना आवश्यक है।

एक अर्थ अनेक शब्दों का वाचक नहीं हो सकता और एक शब्द अनेक अर्थों का भी वाचक नहीं हो सकता। प्रत्येक शब्द के व्युत्पत्ति-निमित्त तथा प्रवृत्ति-निमित्त अलग-अलग होते हैं। उनके अनुसार वाच्यभूत अर्थ में पर्याय-भेद अथवा शक्ति-भेद मानना चाहिए। समभिरूढ़ नय में प्रत्येक पर्यायवाची शब्द का अर्थ-भेद माना जाता है। उदाहरण स्वरूप इंद्र, शक्र तथा पुरन्दर यद्यपि शब्दनय की दृष्टि से इनका एक ही अर्थ होता है किंतु व्युत्पत्ति के आधार पर ये तीनों शब्द विभिन्न अवस्था के वाचक हैं।

इंद्र का व्युत्पत्तिलब्ध अर्थ होता है- जो शोभित हो, वह इंद्र है। जो शक्तिशाली है, वह शक्र है तथा जो नगर का विध्वंस करता है, वह पुरंदर है। पर्याय-भेद माने बिना उनका स्वतन्त्र रूप में कथन करना समभिरूढ़ नयाभास है।

एवंभूत नय

जो क्रिया भेद से वस्तु के भेद का कथन करता है, वह एवंभूत नय हैं। जैसे पढ़ाते समय ही पाठक या अध्यापक अथवा पूजा करते समय ही पुजारी कहना। यह नय क्रिया पर निर्भर है। इसका विषय बहुत सूक्ष्म है। क्रिया की अपेक्षा न कर क्रिया-वाचक शब्दों का कल्पनिक व्यवहार करना एवंभूत नयाभास है।

इस प्रकार जिस काल में जो क्रिया हो रही है, उस काल में उस क्रिया से संबद्ध विशेषण अथवा विशेष्य नाम का व्यवहार करानेवाला विचार एवंभूत नय कहलाता है। दूसरे शब्दों में, पदार्थ जिस समय जिस क्रिया में परिणत हो, उस समय उसी क्रिया में निष्पन्न शब्द की प्रवृत्ति स्वीकार करना एवंभूत नय है, जैसे इंद्रासन पर शोभायमान होने पर ’इंद्र’ कहना चाहिए, शक्ति के प्रदर्शन के समय ’शक्र’ शब्द का प्रयोग करना चाहिए।

क्रिया की अपेक्षा न कर क्रिया-वाचक शब्दों का काल्पनिक व्यवहार करना एवंभूतनयाभास है। इन नयों में पहले के तीन नय सामान्य तत्त्व तथा शेष चार नय विशेष पर बल देते हैं।

उसी प्रकार पहले के तीन नय द्रव्यार्थिक और शेष चार नय पर्यायार्थिक अथवा प्रादेशिक हैं। पुनः अर्थ की प्रधानता के कारण प्रथम चार नय अर्थनय कहे गये हैं, और शेष तीन नय शब्द की मुख्यता के कारण शब्दनय। नयों के सभी दृष्टिकोण आंशिक हैं, इनमें से किसी एक को सत्य मानने से नयाभास का दोष उत्पन्न होता है।

नयाभास

जैन दर्शन में जहाँ सम्यक् एकांत को नय कहा गया है, वहीं मिथ्या एकांत को नयाभास कहते हैं। इसी प्रकार सम्यक् एकांत को प्रमाण और मिथ्या एकांत को प्रमाणाभाव कहा गया है। जैनदर्शन में किसी भी दृष्टिकोण को निरपेक्ष सत्य मानना अनुचित समझा गया है तथा इस सत्य को दृष्टिगत न रखने के कारण प्रायः सभी दार्शनिकों ने अपने-अपने सिद्धांतों को परमसत्य मानने की महान भूल की है। वस्तुतः सभी मत किसी न किसी दृष्टिकोण से अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार सत्य हैं।

जैनों के अनुसार दृष्टिकोणों की सापेक्षता ही उनका वास्तविक रहस्य एवं अंतिम सत्य है। नयशास्त्र संबंधी यह विचारधारा स्याद्वाद नामक दार्शनिक सिद्धांत की पहली सीढ़ी है, जो जैन दर्शन के प्रमाण विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग है।

अनेकांतवाद

अनेकांत परमागम जैनागम का प्राण है और वह वस्तु के विषय में उत्पन्न एकांतवादियों के विवादों को उसी प्रकार दूर करता है, जिस प्रकार हाथी को लेकर उत्पन्न जन्मांधों के विवादों को  सचक्षुः (नेत्रवाला) व्यक्ति दूर कर देता है।

समंतभद्र के अनुसार वस्तु को अनेकांत मानना इसलिए आवश्यक है कि एकांत के आग्रह से एकांती समझता है कि वस्तु उतनी ही है, अन्य रूप नहीं है, इससे उसे अहंकर आ जाता है और अहंकार से उसे राग, द्वेष आदि उत्पन्न होते हैं, जिससे उसे वस्तु का सही दर्शन नहीं होता।

अनेकांती को एकांत का आग्रह न होने से उसे न अहंकार पैदा होता है और न राग, द्वेष आदि उत्पन्न होते हैं। फलतः उसे उस अनंतधर्मात्मक अनेकांत रूप वस्तु का सम्यक् दर्शन होता है।  जैन दर्शन में अनेकांतवाद या विभाज्यवाद, सापेक्षवाद और स्याद्वाद में पर्याप्त संबंध है।

‘अनेकांत’ शब्द ‘अनेक’ एवं ‘अंत’ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘अंत’ का अर्थ यहाँ ‘धर्म’ है। अनेकांतवाद वह सिद्धांत है जो विश्व की समस्त वस्तुओं में दो प्रकार के विरोधी सत्यों को स्वीकार करता है, जैसे- आकाश नित्य भी है और अनित्य भी। अनेकांतवाद सिद्धांत के अनुसार कोई भी मत पूर्णरूप से मिथ्या नहीं कहा जा सकता।

जैन दर्शन में पदार्थ के अनेक धर्मों को स्वीकार किया गया है-अनंतधर्मकं वस्तुः। पदार्थ अनन्त धर्मात्मक होता है।  जड़ और चेतन में, अनात्मा और आत्मा में अनेक धर्म एवं गुण होते हैं।

एकांत का अर्थ एक में अंत होनेवाला या केवल सत्ता को माननेवाला है। अनेकांत का अर्थ अनेक में अंत होनेवाला या बहुत गुणों को माननेवाला है।

प्रत्येक पदार्थ में विविध गुणों की सत्ता की स्वीकृति अन्य दर्शनों में भी है किंतु पदार्थ को अनंत धर्मात्मक माननेवाले सभी दर्शन अनेकांतवादी नहीं हैं। अनेकांतवाद एकांतवादी आग्रह का निषेध करता है। जब आग्रह समाप्त होता है, संकीर्णताएँ टूटती हैं, तब अनेकांत दृष्टि का उदय होता है। प्रत्येक पदार्थ स्वसत्ता, स्वक्षेत्र, स्वकाल एवं स्वभाव से अस्तिरूप है और प्रत्येक पदार्थ परसत्ता, परक्षेत्र, एवं परस्वभाव की अपेक्षा से नास्तिरूप या असत् है। जो सत् है, वही असत् है, जो तत् है वही अतत् है, जो अभेद दृष्टि से एक है, वही भेद दृष्टि से अनेक है, जो द्रव्यार्थिक नय से नित्य है, वही पर्यायार्थिक नय से अनित्य है।

पदार्थ के पदार्थत्व में विद्यमान परस्पर विरुद्ध शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकांत है। अनेकांत दो प्रकार का है- सम्यगनेकांत और मिथ्या अनेकांत। परस्पर विरुद्ध दो शक्तियों का प्रकाशन करनेवाला सम्यगनेकांत है अथवा सापेक्ष एकांतों का समुच्चय सम्यगनेकांत है। निरपेक्ष नाना धर्मों का समूह मिथ्या अनेकांत है।

एकांत भी दो प्रकार के हैं- सम्यक् एकांत और मिथ्या एकांत।  सापेक्ष एकांत सम्यक् एकांत है। वह इतर धर्मों का संग्रहक है। अतः वह नय का विषय है। निरपेक्ष एकांत मिथ्या एकांत है, जो इतर धर्मों का तिरस्कारक है। वह दुर्नय या नयाभास का विषय है। जैन दर्शन में सम्यक् अनेकांतवाद को स्वीकार किया गया है।

जैन दर्शन के अनुसार किसी वस्तु के दो रूप होते हैं- एकता और अनेकता, नित्यता और अनित्यता, स्थायित्व और अस्थायित्व। इसमें प्रथम पक्ष ध्रौव्यसूचक है-गुणसूचक है। द्वितीय पक्ष उत्पाद और व्ययसूचक है-पर्यायसूचक है। विनाश और उत्पाद के बीच एक प्रकार की स्थिरता रहती है, जो न तो नष्ट होती है और न उत्पन्न। यही जो स्थिरता या एकरूपता है, वही ध्रौव्य है-नित्यता है।

इस प्रकार जैन दर्शन में सत् एकांतरूप से नित्य या अनित्य नहीं माना गया है। गुण अथवा अन्वय की अपेक्षा से वह नित्य है और पर्याय की दृष्टि से अनित्य है।

जैन दर्शन में परिवर्तन या पर्याय द्रव्य से भिन्न नहीं है, अपितु अवस्था-विशेष है। यह द्रव्य और पर्याय की अभेद दृष्टि है। जैन दर्शन में द्रव्य और पर्याय के भेद का भी समर्थन किया गया है। अस्थिर पर्याय का नाश होने पर भी द्रव्य स्थिर रहता है। इसमें भेद-दृष्टि की झलक मिलती है। द्रव्य की पर्यायें बदलती रहती हैं, किंतु द्रव्य अपने आप में नहीं बदलता। पर्याय-दृष्टि की प्रधानता से द्रव्य और पर्याय के भेद का समर्थन किया जा सकता है, जबकि द्रव्य-दृष्टि की प्रधानता से द्रव्य और पर्याय के अभेद की पुष्टि की जा सकती है।

यह संसार भिन्न प्रकार के द्रव्यों का संयोग है। द्रव्यों के गुण परिवर्तनशील नहीं होते हैं, इस दृष्टि से संसार नित्य है। किंतु उसके पर्याय बदले रहते हैं, इस दृष्टि से संसार अनित्य तथा परिवर्तनशील है।

इस प्रकार जैन एक दृष्टि से संसार को नित्य तथा दूसरी दृष्टि से अनित्य मानते हैं। वस्तु के अनंत धर्मों का ज्ञान मुक्त व्यक्ति (केवली) ही केवलज्ञान के द्वारा प्राप्त कर सकता है।  अनेकांत का आशय पदार्थ को विभक्त करना है, विश्लेषित करना है। इसके बाद एक-एक गुण धर्म को देखना है, विचार करना है, पहचानना है। तदन्तर एक ही पदार्थ में अविरोधपूर्वक विधि और निषेध के भावों में समन्वय स्थापित करना है।

अनेकांतवाद सीमित ज्ञान-शक्ति के होते हुए भी पदार्थ के एक-एक गुण-धर्म का ज्ञान करने के अनंतर पदार्थ के समस्त धर्मों एवं गुणों को पहचानना है; अनंत को अनेक अपेक्षाओं, अनेक दृष्टियों, अनेक रूपों से देखना एवं जानना है। अनेकांत साधन है-ज्ञान की अनावृत्त दशा की प्राप्ति का।  अनेकांतवाद सामान्य व्यक्ति के द्वारा भी सत्य के सम्पूर्ण साक्षात्कार की शोध-प्रविधि का नाम है। अनेकांत को व्यक्त करनेवाली भाषा-अभिव्यक्ति के मार्ग का नाम है- स्याद्वाद।

अनेकांतवाद ज्ञानरूप है, स्याद्वाद वचनरूप है। अनेकांतवाद व्यापक विचार दृष्टि है, स्याद्वाद उसकी अभिव्यक्ति का मार्ग है। महावीर ने संसार को अनेकान्तवाद का पाठ पढ़ाया अर्थात् ‘जो मैं कह रहा हूँ, वह भी सत्य है और दूसरा जो कह रहा है, वह भी सत्य हो सकता है।’

अनेकांतवाद दृष्टि के कारण भगवान महावीर ने विरुद्ध प्रतीत होनेवाले मतों को एक सूत्र में पिरो दिया। महावीर के स्याद्वाद, अहिंसा, अपरिग्रह आदि की तमाम अवधारणाएँ अनेकांत की ही नींव पर खड़ी हैं। विचार में जो अनेकांत है, वही वाणी में स्याद्वाद है, आचार में अहिंसा है और समाज-व्यवस्था में अपरिग्रह है। महावीर अनेकांत के द्वारा ही व्यक्ति और समाज के लिए समतावादी, शांत और निष्कपट जीवन की स्थापना की जा सकती है।

अनेकान्तवाद व्यापक विचार-दर्शन है जिससे विभिन्न दर्शनों एवं धर्मों को व्यापक पूर्णता में संयोजित किया जा सकता है, सर्वधर्म समभाव की स्थापना की जा सकती है। अनेकांतवाद जीवन के प्रत्येक पक्ष के विश्लेषण विवेचन की वैज्ञानिक प्रविधि है।

स्याद्वाद

स्याद्वाद की निष्पत्ति ‘स्यात्’ से हुई है जिसका व्यवहारिक अर्थ शायद या कदाचित् है। स्याद्वाद को संशयवाद माना जाता है, किंतु महावीर ने जिस शैली में इसका प्रतिपादन किया है, वह संशय और संदेह को मिटानेवाली शैली थी। जैन दर्शन में ‘स्यात्’ निपात किसी पदार्थ के समस्त सम्भावित सापेक्ष गुणों एवं धर्मों का एक-एक रूप में अपेक्षा से प्रतिपादन करना है।

स्यात् का अर्थ है- अपेक्षा। स्याद्वाद का अर्थ है- अपेक्षावाद। यह स्यात् अनेकांत को व्यक्त करता है। अनेकांत को व्यक्त करनेवाली भाषा-अभिव्यक्ति के मार्ग का नाम है- स्याद्वाद।  अनेकांतात्मक अर्थ का कथन स्याद्वाद है- (अनेकान्तात्मकार्थ कथनं स्याद्वादः)। इस प्रकार स्याद्वाद ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है।

स्याद्वाद उसी प्रकार अनेकांत का वाचक अथवा व्यवस्थापक है, जिस प्रकार ज्ञान उस अनेकांत का व्यापक अथवा व्यवस्थापक है। जब ज्ञान के द्वारा वह जाना जाता है, तो दोनों में ज्ञान-ज्ञेय का संबंध होता है और जब वह स्याद्वाद के द्वारा कहा जाता है, तो उनमें वाच्य-वाचक संबंध होता है। ज्ञान का महत्त्व यह है कि वह ज्ञेय को जानकर उन ज्ञेयों की व्यवस्था बनाता है- उन्हें मिश्रित नहीं होने देता है। स्याद्वाद वचनरूप होने से वाच्य को कहकर उसके अन्य धर्मों की मौन व्यवस्था करता है।

ज्ञान और वचन में अंतर यही है कि ज्ञान एक साथ अनेक ज्ञेयों को जान सकता है, पर वचन एक बार में एक ही वाच्य धर्म को कह सकता है, क्योंकि एक बार बोला गया वचन एक ही अर्थ का बोध कराता है।

अनेकांतवाद ज्ञानरूप है, स्याद्वाद वचनरूप है। अनेकांतवाद व्यापक विचार दृष्टि है, स्याद्वाद उसकी अभिव्यक्ति का मार्ग है। अनेकांत पदार्थ के बोध का दर्शन है, स्याद्वाद उसके स्वरूप की विवेचना पद्धति है। स्याद्वाद से जिस पदार्थ का कथन होता है, वह अनेकांतात्मक है, इसलिए स्याद्वाद को अनेकांतवाद भी कहते हैं।

अनेकांतवाद पदार्थ के एक-एक धर्म, एक-एक गुण को देखता है।  स्याद्वाद पदार्थ के एक-एक धर्म, एक-एक गुण को मुख्य करके प्रतिपादन करने की शैली है। स्याद्वाद दूसरे धर्म या लक्षणों का प्रतिरोध किये बिना धर्म-विशेष/लक्षण-विशेष का प्रतिपादन करता है। स्याद्वाद व्यक्ति को सचेत किये रहता है कि जो कथन है, वह पूर्ण निरपेक्ष सत्य नहीं है। अपेक्षा दृष्टि से व्यक्त कथन आंशिक सत्य का उद्घाटन करता है। इस प्रकार अनेकान्तवाद परस्पर प्रतीयमान विरोधी गुणों/धर्मों/लक्षणों को अंश-अंश रूप में जानकर समग्र एवं अनंत को जान जाता है। समस्त सम्भावित सापेक्ष गुणों एवं धर्मों को प्रतिपादित कर समग्र एवं अनंत को अभिव्यक्त करने की वैज्ञानिक प्रविधि का नाम स्याद्वाद है।

समंतभद्र की ‘आप्त-मीमांसा’, जिसे स्याद्वाद-मीमांसा कहा जा सकता है, में एक साथ स्याद्वाद, अनेकांत और सप्तभंगी तीनों का विशद् और विस्तृत विवेचन है।

साधारण मनुष्य का ज्ञान अपूर्ण एवं आंशिक होता है और उस ज्ञान के आधार पर जो परामर्श होता है, उसे भी ‘नय’ कहते हैं। नय किसी वस्तु को समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण हैं। किसी भी वस्तु के संबंध में जो निर्णय होता है, वह सभी दृष्टियों से सत्य नहीं होता। उसकी सत्यता उसके नय पर निर्भर करती है, अर्थात् उसकी सत्यता उस विशेष-दृष्टि तथा विशेष-विचार से ही मानी जाती है, जिस विशेष-दृष्टि से उसका परामर्श किया जाता है।

नय के लिए जैन दार्शनिकों ने हाथी और छः अंधों का दृष्टांत दिया है जो हाथी का आकार जानने के उद्देश्य से हाथी के भिन्न-भिन्न अंगों का स्पर्श कर हाथी को खंभे, रस्सी, सूप, अजगर, दीवार और छाती के समान मानने का आग्रह करते हैं।

इस प्रकार हाथी के आकार के संबंध में पूर्णतया मतभेद हो जाता है और प्रत्येक अंधे को अपना ज्ञान ठीक लगता है, किंतु जैसे ही उन्हें यह ज्ञात होता है कि प्रत्येक ने हाथी का एक-एक अंग ही स्पर्श किया है, तो उनका मतभेद समाप्त हो जाता है। दार्शनिकों के बीच मतभेद इसलिए होता है कि वे किसी विषय को भिन्न-भिन्न दृष्टि से देखते हैं और अपने ही मत को सत्य मानने का आग्रह करते हैं। दृष्टि-साम्य होने पर मतभेद की संभावना समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार हाथी-अंधे के दृष्टांत में प्रत्येक अंधे का ज्ञान अपने ढंग से स्पष्टतया सत्य है, उसी प्रकार विभिन्न दार्शनिक मत अपने-अपने दृष्टि से सत्य हो सकते हैं।

सप्तभंगी नय

समंतभद्र के पूर्व आगमों में स्याद्वाद और सप्तभंगी का जो निर्देश मिलता है, वह बहुत कम और आगमिक विषयों के निरूपण में है। सप्तभंगीनय का आधुनिक स्वरूप महावीर के निर्वाणोपरांत विकसित हुआ।

अन्य दर्शनों में भी चार नयों की चर्चा है। बौद्ध धर्म के अव्याकृत में अस्ति, नास्ति, उभय तथा नोभय का दृष्टान्त मिलता है। दीघनिकाय के ब्रह्मजाल सुत्त में उल्लिखित अमराविक्खेपिक (अमराविक्षेपवाद) नामक दार्शनिक भी वस्तु के अस्तित्व एवं नास्तित्व की स्थिति तथा अभाव के विषय में अनेक मतवाद की पुष्टि करते थे।

आचार्य समंतभद्र ने स्याद्वाद के द्वारा सप्तभंगीनयों (सात उत्तरवाक्यों) से अनेकांत रूप वस्तु की व्यवस्था का विधान किया और उस विधान को व्यावहारिक बनाया तथा भाववाद एवं अभाववाद का समन्वय किया।

स्यादस्ति

स्यात् (कथंचित्) वस्तु भावरूप ही है क्योंकि वह स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव से वैसी ही प्रतीत होती है।

स्यात् नास्ति

स्यात् (कथंचित्) वस्तु अभावरूप ही है, क्योंकि वह परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल, और परभाव की अपेक्षा से वैसा ही अवगत होती है।

स्यादस्ति-नास्ति

वस्तु कथंचित् उभय रूप ही है, क्योंकि क्रमशः दोनों विवक्षाएँ होती हैं। ये दोनों विवक्षाएँ तभी संभव हैं जब वस्तु कथंचित् दोनों रूप हो।

स्यात् अव्यक्तव्य

वस्तु (कथंचित्) अव्यक्तव्य ही है, क्योंकि दोनों को एक साथ कहा नहीं जा सकता। एक बार में उच्चारित एक शब्द एक ही अर्थ (वस्तु धर्म- भाव या अभाव) का बोध कराता है, अतः एक साथ दोनों विवक्षताओं के होने पर वस्तु को कह न सकने से वह अव्यक्तव्य ही है।

चार भंगों को दिखाकर वचन की शक्यता और अशक्यता के आधार पर समंतभद्र ने अपुनरूक्त तीन भंग और दिखाकर सप्तभंगी संयोजित की गई है।

  1. स्यात् अस्ति अव्यक्तव्य अर्थात् वस्तु (कथंचित्) भाव और अव्यक्तव्य ही है।
  2. स्यात् नास्ति अव्यक्तव्य अर्थात् वस्तु (कथंचित्) अभाव एवम् अव्यक्तव्य ही है।
  3. स्यात् अस्ति च नास्ति च अव्यक्तव्य अर्थात् वस्तु (कथंचित्) भाव, अभाव और अव्यक्तव्य ही है।

सप्तभंगी नय सात उत्तरवाक्य हैं जो प्रश्नकर्ता के सात प्रश्नों के उत्तर हैं। उनके सात प्रश्नों का कारण उनकी सात जिज्ञासाएँ हैं, उनके सात जिज्ञासाओं का कारण उनके सात संदेह हैं और उन सात संदेहों का भी कारण वस्तुनिष्ठ सात धर्म- सत्, असत, उभय, अव्यक्तव्यत्व, सत्व्यक्तव्यत्व, असत्व्यक्तव्यत्व, और सत्वासत्वाव्यक्तव्यत्व हैं।

जैन दर्शन में द्वैत-अद्वैत (एकानेक), नित्य-अनित्य, भेद-अभेद, अपेक्षा-अनपेक्षा, हेतुवाद-अहेतुवाद, पुण्य-पाप आदि युगलों के एक-एक पक्ष को लेकर होनेवाले विवाद को समाप्त करते हुए दोनों को सत्य बताया गया है और दोनों को ही वस्तुधर्म निरूपित किया गया है।

समस्त निर्णयों के दो रूप होते हैं, सब पदार्थ हैं भी और नहीं भी हैं, अर्थात् सद्असदात्मक हैं- ‘स्वरूपेण सत्तात् पररूपेण न असत्त्वात्’।  प्रत्येक निषेध का एक सकारात्मक आधार होता है।

वस्तु को सर्वथा अद्वैत (एक) मानने पर क्रिया-कारक का भेद, पुण्य-पाप का भेद, लोक-परलोक का भेद, बन्ध-मोक्ष का भेद, स्त्री-पुरुष का भेद आदि लोक प्रसिद्ध अनेकत्त्व का व्यवहार नहीं बन सकेगा, जो यथार्थ है, मिथ्या नहीं है।

वस्तु कथंचित् एक ही है क्योंकि उसका सभी गुणों और पर्यायों में अन्वय (एकत्व) पाया जाता है। वस्तु (कथंचित्) अनेक ही है क्योंकि वह उन गुणों और पर्यायों से अविष्कभूत है।  इसी प्रकार भाव और अभाव की तरह अद्वैत और द्वैत में तीसरे आदि पाँच भंगों की और योजना करके सप्तभंगनय से वस्तु को अनेकांत सिद्ध किया गया है। जैन दर्शन के अनुसार एक दृष्टि से जो नित्य प्रतीत होता है, वही दूसरी दृष्टि से अनित्य है।  स्याद्वाद यह नहीं कहता कि जो नित्यता है, वही अनित्यता है या जो एकता है, वही अनेकता है। नित्यता और अनित्यता, एकता और अनेकता आदि परस्पर-विरोधी धर्म हैं, यह सत्य है; किंतु उनका विरोध अपनी दृष्टि से है, वस्तु की दृष्टि से नहीं।  वस्तु दोनों को आश्रय देती है, दोनों की सत्ता से ही वस्तु का स्वरूप पूर्ण होता है। जब एक वस्तु द्रव्य-दृष्टि से नित्य और पर्याय-दृष्टि से अनित्य है, तो उसमें विरोध का कोई प्रश्न ही नहीं है। भेद और अभेद के लिए भिन्न-भिन्न आश्रय मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो वस्तु भेदात्मक है, वही वस्तु अभेदात्मक है।दोनों धर्म अखंड वस्तु के ही धर्म हैं।  भेद-अभेद दोनों का आश्रय एक ही है। एक ही वस्तु में सामान्य और विशेष दोनों रहते हैं।

स्याद्वाद ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है। ज्ञान निर्भर करता है स्थान, काल तथा दृष्टिकोण पर। इसलिए यह सापेक्षवाद है। सापेक्षवाद दो प्रकार का होता है- विज्ञानवादी सापेक्षवाद तथा वस्तुवादी सापेक्षवाद। विज्ञानवादी के अनुसार वस्तु की सत्ता देखनेवाले पर निर्भर करती है। वस्तु का कोई निजी गुण नहीं है। वस्तु का गुण अनुभवकर्ता की अनुभूति पर निर्भर करता है।

वस्तुवादी सापेक्षवाद के अनुसार वस्तुओं का गुण देखनेवाले पर निर्भर नहीं करता, अपितु ये मानव मन से स्वतंत्र हैं। वस्तुवादी सापेक्षवाद वस्तुओं की स्वतंत्र सत्ता में विश्वास करते हैं।  जैनों का सापेक्षवाद वस्तुवादी है, क्योंकि इसकी मान्यता है कि वस्तुओं के अनंत गुण देखनेवाले पर निर्भर नहीं करते, बल्कि उनकी स्वतंत्र सत्ता है।  जैन दर्शन वस्तुओं की वास्तविकता में विश्वास करता है।