जर्मनी का एकीकरण (Unification of Germany)

इटली के एकीकरण के समानांतर जर्मनी का एकीकरण भी उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। राष्ट्र की आधुनिक परिभाषाओं के अनुसार यूरोप में एक जर्मन राष्ट्र है जिसके पास अपनी भाषा, अपना अतीत और अपनी परंपरा है। लेकिन इस पूरे प्रदेश पर कभी एक व्यक्ति का शासन नहीं रहा। पहले पवित्र रोमन सम्राट शार्लमन को फ्रांसीसी और जर्मन दोनों ही अपना कहते हैं। पवित्र रामन साम्राज्य का स्वरूप जर्मन से अधिक जर्मनेतर था।

पुनर्जागरण के बाद जब यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना का उदय हुआ, तो प्रोटेस्टेंट आदोलन, राष्ट्रवाद और पूँजीवाद के विकास के साथ-साथ जर्मनी में भी राष्ट्रीयता की जड़ें फैलने लगी थीं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सदियों से जर्मनी छोटे-बड़े राज्यों में बँटा हुआ था और इन राज्यों के शासकों ने अपनी प्रच्छन्न प्रभुता स्थापित कर ली थी। इन सबको एक सूत्र में बाँधने वाले पवित्र रोमन साम्राज्य में जर्मनेतर हितों की प्रधानता थी और रोमन सम्राट किसी भी तरह की स्वायत्तता या स्वतंत्रता की माँगों का विरोध करता था। लेकिन तीसवर्षीय युद्ध के बाद जब वेस्टफेलिया की संधि हुई तो एक नये जर्मनी का जन्म होने लगा था। जर्मनी में आस्ट्रिया के समानांतर नेतृत्व उभरने लगा था और साहित्य में जर्मन अस्मिता मुखरित होने लगी थी।

यद्यपि फ्रांस की क्रांति द्वारा उत्पन्न नवीन विचारों से जर्मनी प्रभावित हुआ था, किंतु एकीकरण की दिशा में सबसे व्यावहारिक कदम तब उठा जब नेपोलियन ने संपूर्ण मध्य यूरोप को रौंदकर पवित्र रोमन साम्राज्य को भंग कर दिया, राइन नदी के आसपास के 39 राज्यों का ‘राइन संघ’ बनाया और वेस्टफेलिया के नये राज्य का निर्माण किया। इस प्रकार नेपोलियन की विजयों के बाद ही जर्मनी में राज्यों के एक सूत्र में पिरोये जाने का क्रम शुरू हुआ। लिप्सन के अनुसार, ‘यह इतिहास के मजाकों में से एक है कि आधुनिक जर्मनी का जन्मदाता नेपोलियन था।’

नेपोलयन की पराजय के बाद 1815 में वियेना कांग्रेस ने नेपोलियन की व्यवस्था भंग कर दी, लेकिन तब तक राष्ट्रीयता की भावना जड़ पकड़ चुकी थी और जर्मन क्षेत्रों में नजदीक आने की तड़प बढ़ने लगी थी। मेटरनिख के नेतृत्व में वियेना में 38 जर्मन राज्यों को एक शिथिल संघ में संगठित किया गया, जिसका अध्यक्ष आस्ट्रिया था। संघीय सभा का अधिवेशन फ्रैंकफर्ट में बुलाने का प्रावधान हुआ, किंतु इसके सदस्य जनता द्वारा निर्वाचित न होकर राजाओं द्वारा मनोनीत होते थे। यहाँ साधारण प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पास हो सकते थे। संवैधानिक या मौलिक परिवर्तनों के लिए सर्वसम्मति जरूरी थी। जर्मनी के छोटे-छोटे राज्यों के शासक नवीन विचारों के विरोधी थे और राष्ट्रीय एकता की बात को नापसंद करते थे, क्योंकि एकीकरण के बाद उनको अपना प्रभाव समाप्त होने का डर था। यही नहीं, आस्ट्रिया का प्रतिक्रियावादी प्रधानमंत्री मेटरनिख राष्ट्रीयता की भावना का दमन करने के लिए पूरी तरह सन्नद्ध था। इस प्रकार जर्मन देशभक्तों की एकीकरण की आकांक्षा मूर्तरूप नहीं ले सकती थी।

इटली में जहाँ एक ओर मेटरनिख ने 1819 के कार्ल्सबॉड के अध्यादेशों के द्वारा विद्यार्थियों और शिक्षकों पर कठोर नियंत्रण लागू करके चेतना का विस्तार रोकने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर कुछ आर्थिक तत्व जर्मन राज्यों को करीब भी ला रहे थे। 1832 में जर्मनी के 18 राज्यों ने प्रशा के नेतृत्व में सीमा करों का एक संगठन ‘जोलवरीन’ का निर्माण किया और सभी जर्मन राज्यों में एक ही प्रकार के सीमा शुल्क लागू किया। इस व्यवस्था के कारण जर्मनी में न केवल व्यापार-वाणिज्य का विकास हुआ, बल्कि इससे जर्मन राज्यों में एकता की भावना का भी सूत्रपात हुआ। कहा जाता है कि जोलवरीन ने ही प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के राजनीतिक एकीकरण का भावी मार्ग तैयार किया था।

1830 और 1848 की क्रांतियाँ (Revolutions of 1830 and 1848)  

जर्मनी की जनता में राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत करने के लिए देश के अंदर अनेक गुप्त समितियों की स्थापना की गइ्र थी जो देश में नवीन विचारों का प्रसार कर रही थीं। यही कारण है कि 1830 की फ्रांसीसी क्रांति से उत्साहित होकर जर्मनी की जनता ने भी विद्रोह किया था। किंतु कार्ल्सबाद के अध्यादेशों की पुनरावृत्ति द्वारा इन विद्रोहों का दमन कर दिया गया।

1848 की क्रांति अधिक व्यापक थी जिसके कारण प्रतिक्रियावादी मेटरनिख का पतन हो गया। इस समय जर्मन उदारवादी एक तरफ संवैधानिक सुधार चाहते थे, वहीं दूसरी तरफ उनका लक्ष्य जर्मनी का एकीकरण भी था। फ्रैंकफर्ट की संसद के माध्यम से अखिल जर्मन साम्राज्य एवं उदारवादी शासन स्थापित करने का प्रयास किया गया। संसद ने निर्णय लिया कि नवीन संघ से आस्ट्रिया को निष्कासित कर प्रशा के शासक की अध्यक्षता में दो सदनोंवाली संसद का निर्माण किया जाए। जर्मनी के एकीकरण की संभावना साकार होने लगी थी, लेकिन 1849 में प्रशा के शासक फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ ने सम्राट पद ग्रहण करने से इनकार कर दिया। इसके कई कारण थे। निमंत्रण शासकों ने नहीं, जनप्रतिनिधियों ने दिया था। ऐसी स्थिति में वह केवल संवैधानिक सम्राट के पद को ग्रहण करना अपना अपमान समझता था। इसके अतिरिक्त, यह कार्य बिना आस्ट्रिया के सम्राट को नाराज किये और बिना युद्ध के संभव नहीं था। प्रशा ने शासकों का एक संघ बनाकर भी राज्यों को निकट लाने का प्रयास किया, किंतु तब भी आस्ट्रिया और प्रशा प्रतिद्वंद्वी बन जाते थे। इसलिए एकीकरण का पहला दौर आकांक्षाओं और प्रयासों का दौर बनकर रह गया।

इस चरण में यह स्पष्ट हो गया कि एकीकरण का स्वतः कोई समाधान नहीं निकल सकता। इसे ऊपर से थोपना पड़ेगा और इसके लिए प्रशा को ही, चाहे जब संभव हो, नेतृत्व करना पडेगा। यह भी स्पष्ट हो गया कि स्वतःस्फूर्त संवैधानिक और उदारवादी तरीके कारगर नहीं होंगे। इसी तरह यह भी स्पष्ट हो गया कि शासकों का संघ, जैसा प्रशा ने बनाना चाहा था, सफल नहीं होगा क्योंकि आस्ट्रिया उसका विरोध करेगा। इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में ऐसा लगता था कि जर्मनी के एकीकरण का प्रश्न दबा दिया गया है और सदियों से स्थापित आस्ट्रिया का प्रभुत्व और प्राथमिकता बनी रहेगी। जर्मन देशभक्त निराश हो चले थे कि तभी एक ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ और इसका श्रेय प्रशा के विलियम और बिस्मार्क को है।

विलियम प्रथम : 1861 में फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ की मृत्यु के बाद उसका भाई विलियम प्रथम प्रशा की गद्दी पर बैठा। विलियम का शासनकाल प्रशा और जर्मनी के लिए ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। विलियम एक कुशल शासक था। उसने नेपोलियन के विरुद्ध युद्ध किया था और वह विशेष रूप से प्रशा की सेना का पुनर्संगठन करना चाहता था। उसने फानरून को अपना युद्धमंत्री नियुक्त किया और प्रशा की सेना को एक आदर्श सेना बनाने का आदेश दिया। किंतु सेना के व्यापक विस्तार के लिए धन की आवश्यकता थी और पार्लियामेंट को ही अतिरिक्त धन देने का अधिकार था। पार्लियामेंट ने बड़ी मुश्किल से एक वर्ष के लिए धन स्वीकृत किया, लेकिन जब दूसरे वर्ष धन की स्वीकृति नहीं मिली, तो राजा और पार्लियामेंट के बीच ठन गई। विलियम संकट में पड़ गया क्योंकि वह अन्य निरंकुश शासकों की तरह विरोध होने पर पार्लियामेंट भंग नहीं करता चाहता था। इसी समय उसने प्रशा के कुशल और प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क को बर्लिन बुलाया। बिस्मार्क और विलियम दोनों ने एक-दूसरे का साथ देने का निर्णय किया। फलतः 1862 में विलियम ने बिस्मार्क को प्रशा का चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त कर दिया। दोनों का सहयोग जर्मन एकीकरण के लिए निर्णायक साबित हुआ।

बिस्मार्क : ऑटो एडवर्ड लियोपोल्ड बिस्मार्क का जन्म 1815 में प्रशा (ब्रेडनबर्ग) के एक प्रतिष्ठित सामंत परिवार में हुआ था। उसकी शिक्षा-दीक्षा बर्लिन में हुई थी। वह जर्मनी की महान भूमिका के स्वप्न देखता था। उसकी प्रजातंत्र में कोई आस्था नहीं थी और कुछ अर्थों में वह मैकियावेली की नीति का समर्थक था। एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद उसकी पूर्ति के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था। 1847 में वह प्रशा की प्रतिनिधि-सभा का सदस्य चुना गया। वह जर्मन महासंघ में प्रशा का प्रतिनिधि था और जर्मन एकीकरण के प्रयत्नों से परिचित था। वह फ्रांस और रूस में जर्मनी का राजदूत रह चुका था और इस पद पर रहते हुए उसे न केवल यूरोप की राजनीतिक स्थिति को समझने का अवसर मिला, बल्कि वह रूस के जार और फ्रांस के नेपोलियन जैसे लोगों के चरित्र से परिचित भी हो चुका था।

बिस्मार्क जानता था कि जर्मनी का एकीकरण प्रशा के नेतृत्व में ही होगा और इसके लिए आस्ट्रिया से संघर्ष होना अनिवार्य है। इस संघर्ष के लिए प्रशा को सैनिक दृष्टि से सुदृढ़ करना होगा। इसलिए वह भी फानरून के सैन्य-सुधारों का समर्थक था। बिस्मार्क का स्पष्ट मत था कि ‘बड़े संवाल भाषणों से नहीं सुलझते’ उसके लिए एक ‘लौह नीति’ जरूरी है।

चांसलर बनते ही बिस्मार्क ने विलियम की प्रतिनिधि सभा भंग न करने की नीति स्वीकार कर ली। लेकिन वह सभा की अवहेलना करके हर साल कर वसूल कर सेना के विस्तार में धन लगाता रहा और प्रशा को आर्थिक एवं सैनिक दृष्टि से सुदृढ़ कर भावी संघर्षों के लिए तैयार करता रहा। फानरून की योजनाएँ क्रियान्वित होती रहीं और फान मोल्टके के नेतृत्व में सेना का विस्तार होता गया।

बिस्मार्क शतरंज का मंझा खिलाड़ी था और अपनी चालें पहले ही सोच लेता था। उसने आरंभ में ही जर्मनी के एकीकरण के लिए तीन युद्धों की योजना बना ली थी। पहला, डेनमार्क के विरुद्ध शक्ति-परीक्षण के लिए, दूसरा आस्ट्रिया के विरुद्ध एकीकरण के विरोधियों को जर्मनी से निष्कासित करने के लिए और तीसरा फ्रांस के विरुद्ध जर्मन शक्ति के प्रदर्शन और मान्यता के लिए ।

डेनमार्क से युद्ध, फरवरी 1864 (War with Denmark, February 1864)

सर्वप्रथम बिस्मार्क ने अपनी शक्ति का परीक्षण डेनमार्क के विरूद्ध किया। श्लेसविंग और हालस्टीन नामक दो रियासतें डेनमार्क के शासन के अधीन तो थीं, लेकिन डेनमार्क का हिस्सा नहीं थीं। हालस्टीन जर्मन संघ का सदस्य था और वहाँ की जनता भी जर्मन थी, जबकि श्लेसविग में आधे जर्मन और आधे डेन लोग थे। 1852 में लंदन सम्मेलन में यूरोप के शासकों ने इन रियासतों पर डेनमार्क की सत्ता इसी शर्त पर मानी थी कि इनका कभी पूरी तरह विलय नहीं होगा।

उन्नीसवीं सदी में जब अन्य देशों की तरह डेनमार्क में भी राष्ट्रीयता की लहर फैली तो 1863 ई. में डेनमार्क के शासक क्रिश्चियन दशम् ने एक नया संविधान बनाकर हालस्टीन को पूरी तरह डेनमार्क में मिला लिया और श्लेसविंग को स्वायत्तता दे दी। क्रिश्चियन दशम् का यह कार्य 1852 के लंदन समझौते का उल्लंघन था, इसीलिए जर्मन राज्यों ने इसका विरोध किया।

बिस्मार्क श्लेसविग और हालस्टीन के प्रदेशों पर अधिकार करना चाहता था, लेकिन उसने यह कार्य अकेले न करके आस्ट्रिया के सहयोग से पूरा करने की योजना बनाई। उसने कूटनीतिक तरीके से जर्मन डायट की डेनमार्क के विरुद्ध सेना भेजने की बात नहीं मानी और आस्ट्रिया के सामने लंदन संधि की रक्षा का प्रस्ताव रखा। आस्ट्रिया को प्रशा का सहयोग करना उचित लगा क्योंकि यदि प्रशा इस मामले में अकेले हस्तक्षेप करता तो जर्मनी में आस्ट्रिया का प्रभाव कम हो जाता।

प्रशा और आस्ट्रिया दोनों ने सम्मिलित रूप से 1864 में डेनमार्क पर आक्रमण कर दिया। डेनमार्क बुरी तरह पराजित हुआ और वियेना में एक संधि हुई। डेनमार्क को श्लेसविग और हालस्टीन के साथ-साथ लायनबुर्ग से भी हाथ होना पड़ा। बिस्मार्क को प्रशा की सेना की योग्यता और आस्ट्रिया की कमजोरियों का ज्ञान हो गया। वह आश्वसत हुआ कि उसकी योजना सही दिशा की ओर बढ़ रही है।

गेस्टीन समझौता: प्रशा और आस्ट्रिया ने श्लेसविग और हालस्टीन के प्रदेश डेनमार्क से तो ले लिये, लेकिन इस लूट के माल के बँटवारे को लेकर प्रशा और आस्ट्रिया में मतभेद हो गया। अंततः प्रशा और आस्ट्रिया के बीच 14 अगस्त 1865 को गेस्टीन में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार श्लेसविंग का प्रबंध प्रशा को सौंपा गया और हालस्टाइन का आस्ट्रिया को। प्रशा ने लायनबर्ग का प्रदेश आस्ट्रिया से खरीद लिया। गेस्टीन समझौता बिस्मार्क की कूटनीतिक विजय थी, जिसमें दरार को ढँक दिया गया था। बिस्मार्क की योजना का दूसरा चरण यहीं से शुरू होता था।

आस्ट्रिया से युद्ध, 1866 (War with Austria, 1866)

बिस्मार्क जानता था कि जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रशा का आस्ट्रिया से युद्ध होना इतिहास की माँग है। उसने 1865 में अपनी कूटनीतिक चालों से आस्ट्रिया को यूरोप में मित्रविहीन करने की तैयारी आरंभ कर दी। बिस्मार्क जानता था कि इंग्लैंड इस युद्ध में हस्तक्षेप नहीं करेगा क्योंकि वह एकाकीपन की नीति पर चल रहा था। रूस तो बिस्मार्क का पुराना मित्र ही था और पोलैंड में हुए विद्रोह को दबाने में उसने रूस की मदद भी की थी, इसलिए वह आश्वस्त था कि रूस उसके विरुद्ध नहीं आयेगा। फ्रांस ही एक मात्र ऐसा देश था, जो आस्ट्रिया की मदद कर सकता था। बिस्मार्क ने नेपोलियन तृतीय से वियारिज में चुपके से भेंट की। मैक्सिको में उलझे होने के कारण और शायद कुछ सीमांत प्रदेशों की लालच में नेपोलियन ने आस्ट्रिया-प्रशा के भावी युद्ध में तटस्थ रहना स्वीकार कर लिया था। इटली का पीडमांट अब भी वेनेशिया पर आस्ट्रिया के प्रभुत्व के कारण क्षुब्ध था। बिस्मार्क ने आस्ट्रिया के विरुद्ध पीडमांट से 1866 में एक गुप्त समझौता कर लिया और युद्ध के बाद इटली में वेनेशिया के विलय का निश्चय हुआ। अब बिस्मार्क आस्ट्रिया से युद्ध के लिए बहाना ढूँढने लगा।

बिस्मार्क ने देखा कि हालस्टीन की जनता खुश नहीं है और आगस्टेनबर्ग में मिलने के लिए आंदोलित है। उसने आस्ट्रिया के सामने यह बात रखी। उसे दो टूक जवाब मिला कि यह आस्ट्रिया का मामला है और उसको परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। आस्ट्रिया ने दोनों प्रांतों का प्रश्न जर्मन डायट के उठा दिया। बिस्मार्क ने इसे गेस्टीन समझौते का उल्लंघन बताया और हालस्टीन में प्रशा की सेना भेज दी। इस प्रकार दोनों ही रियासतों पर प्रशा का अधिकार हो गया। क्षुव्ध आस्ट्रिया को प्रशा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करनी पड़ी।

सेडोवा का युद्ध: प्रशा की तैयारी सुनियोजित थी और उसकी सेना युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार थी। आस्ट्रिया का तोपखाना बेहतर था, लेकिन प्रशा के पास ऐसी राइफलें थीं जो एक बार में कई फायर कर सकती थीं। अंततः 1866 में सेडोवा के निर्णायक युद्ध में आस्ट्रिया बुरी तरह पराजित हुआ। इटली ने वादे के अनुसार वेनेशिया पर हमला किया था और वहाँ उसकी पराजय हुई थी, परंतु आस्ट्रिया की सेना को विभाजित रखकर इटली ने उसकी पराजय को आसान बना दिया था। शीघ्र ही अधिकांश जर्मनी पर प्रशा का कब्जा हो गया। सेडोवा में बिस्मार्क की विजय और आस्ट्रिया की पराजय से नेपोलियन की आँखें खुली रह गईं। अंततः नेपोलियन की मध्यस्थता से प्राग की संधि से युद्ध समाप्त हो गया।

प्राग की संधि: प्राग की संधि में बिस्मार्क ने एक बार फिर अपना कौशल दिखाया। वादे के मुताबिक वेनेशिया इटली को दे दिया गया, लेकिन स्वयं प्रशा ने एक इंच भूमि भी नहीं ली। पराजित आस्ट्रिया को बस एक छोटी-सी रकम हजाने के रूप में देनी पड़ी। आस्ट्रिया के नेतृत्व वाला जर्मन संघ भंग कर दिया गया। श्लेसविग और हालस्टीन के क्षेत्र प्रशा को मिल गये।

बिस्मार्क ने आस्ट्रिया के साथ एक पराजित देश जैसा व्यवहार नहीं किया और आशातीत ढ़ंग से सम्मान दिया। दरअसल आस्ट्रिया को जर्मनी से निष्कासित करके बिस्मार्क का मुख्य उद्देश्य पूरा हो चुका था और एक साथ एक से अधिक दुश्मन पैदा करना बिस्मार्क की नीति के विरूद्ध था। अभी बिस्मार्क को फ्रांस से अंतिम हिसाब करना बाकी था जिसके लिए आस्ट्रिया को तटस्थ रखने की जरूरत थी।

उत्तरी जर्मन संघ (North German Union)

सेडोवा की विजय के बाद प्रशा यूरोप का एक शक्तिशाली राज्य हो गया। बिस्मार्क ने जर्मन-राज्यों को नये सिरे से संगठित करने का प्रयास किया, किंतु वह दक्षिणी जर्मन राज्यों के विरोध के कारण ऐसा नहीं कर सका। बिस्मार्क ने चार दक्षिणी जर्मन राज्यों-बवेरिया, बटुमबर्ग, बादेन और हेंस को छोड़कर राइन नदी के उत्तर के सभी 21 जर्मन राज्यों का एक उत्तरी जर्मन संघ गठित किया। प्रशा नवीन जर्मन संघ का अध्यक्ष था और बिस्मार्क इस संघ का प्रथम चांसलर नियुक्त हुआ।

फ्रांस से युद्ध, 1870 (War with France, 1870)

बिस्मार्क कहा करता था कि फ्रांस से युद्ध तो इतिहास की तर्कसंगत परिणति है। इससे स्पष्ट होता है कि बिस्मार्क शुरू से ही फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की तैयारी में लगा था। प्रशा के उत्थान और आस्ट्रिया की पराजय से फ्रांस में नेपोलियन के प्रति असंतोष बढता जा रहा था। नेपोलियन को अफसोस हुआ कि यदि उसने आस्ट्रिया की मदद की होती, तो फ्रांस की सीमा पर प्रशा जैसे शक्तिशाली राष्ट्र का उदय नहीं होता। अब उसने प्रशा पर दबाव डालना शुरू किया कि उसे उसकी तटस्थता के बदले जर्मन क्षेत्र का कुछ हिस्सा मिलना चाहिए। बिस्मार्क ने उसे कोई साफ उत्तर नहीं दिया। वह कभी पैलेटिनेट की माँग करता, कभी बेल्जियम की तो कभी लुक्सेमबुर्ग की। बिस्मार्क बड़ी चालाकी से उसकी माँगें अन्य देशों के सामने रखकर कूटनीतिक लाभ उठाता रहा। उसने नेपोलियन की पैलेटिनेट की माँग को बवेरिया के शासक को दिखाया क्योंकि पैलेटिनेट उसी के राज्य में पड़ता था। जब दक्षिणी जर्मनी के राज्यों को इसकी जानकारी हुई तो वे क्षुब्ध होकर प्रशा के निकट आने लगे। बेल्जियम की तटस्थता और सुरक्षा के लिए इंग्लैंड प्रतिबद्ध था। जब उसे पता चला कि नेपोलियन की आँख बेल्जियम पर लगी है, तो वह सशंकित हो उठा। रूस की तटस्थता के लिए बिस्मार्क ने जार को बताया कि यदि फ्रांस और प्रशा में युद्ध छिड़ गया तो रूस आसानी से पेरिस संधि की अवहेलना कर सकेगा क्योंकि 1856 की पेरिस की संधि के बाद रूस के कालासागर में नौसेना रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इटली को प्रशा से सहयोग करने का फल मिल चुका था। यद्यपि नेपोलियन ने इटली की मदद की थी, लेकिन उसने विश्वासघात भी किया था, और अभी भी उसकी सेना रोम में थी जो इटली के एकीकरण में बाधक थी। इसलिए इटली की ओर से कोई खतरा नहीं था। आस्ट्रिया तो नाराज था ही। इस प्रकार बिस्मार्क ने फ्रांस को हर ओर से एकाकी और मित्रविहीन बना दिया। अब बस एक उचित बहाना चाहिए था ताकि फ्रांस को जर्मनी पर आक्रामक और प्रशा को रक्षक साबित किया जा सके।

स्पेन के उत्तराधिकार का प्रश्न : बिस्मार्क तो फ्रांस से निपटने के लिए तैयार बैठा था। इसी बीच स्पेन के उत्तराधिकार को लेकर प्रशा और फ्रांस एक-दूसरे के सामने आ गये। स्पेन की जनता ने 1863 में रानी ईसाबेला द्वितीय को देश से निकालकर लियोपोल्ड को नया शासक बनाना चाहा। लियोपोल्ड प्रशा के सम्राट का रिश्तेदार था, इसलिए नेपोलियन तृतीय ने लियोपोल्ड का विरोध किया। यद्यपि नेपोलियन के विरोध के कारण लियोपोल्ड ने ऐन वक्त पर स्वयं अपनी उम्मीदवारी का परित्याग कर दिया, किंतु फ्रांस ने प्रशा से आश्वासन चाहा कि भविष्य में भी प्रशा अपने किसी प्रतिनिधि या राजकुमार को स्पेन का शासक नियुक्त करने का प्रयास नहीं करेगा।

एम्स का तार: स्पेन के उत्तराधिकार की समस्या को लेकर फ्रांस का राजदूत बेनेदेती और प्रशा के शासक एम्स नगर में मिले। प्रशा के सम्राट ने फ्रांसीसी राजदूत के साथ अपनी बातचीत का ब्यौरा तार द्वारा बिस्मार्क को भेज दिया। बिस्मार्क जानता था कि दोनों देशों में संबंध तनावपूर्ण हैं और थोड़ा-सा उकसाने पर आग भड़क सकती है। उसने बड़ी चालाकी से एम्स के तार की भाषा में संशोधन करके इस तरह प्रकाशित किया कि फ्रांस और प्रशा दोनों देशों की जनता उत्तेजित होकर युद्ध की माँग करने लगी।

सेडान का युद्ध : नेपोलियन किसी भी तरह युद्ध के लिए तैयार नहीं था। लेकिन बिस्मार्क के भड़काने पर मजबूरन उसे प्रशा के विरूद्ध युद्ध की घोषणा करनी पड़ी। फ्रांस सामान्य स्थिति में प्रशा का मुकाबला कर सकता था, लेकिन यहाँ तो सब कुछ विपरीत था। फ्रांस मित्रविहीन था तो प्रशा को जर्मन राज्यों का सहयोग प्राप्त था। फ्रांस की सेना की हालत यह थी कि जहाँ तोप थी वहाँ गोले नहीं और जहाँ सेनापति थे वहाँ सेना नहीं। फलतः फ्रांस की हर तरफ पराजय होने लगी। अंत में 15 जुलाई 1870 ई. को सेडान के मैदान में नेपोलियन की ऐतिहासिक हार हुई और उसे 85 हजार सैनिकों के साथ जनरल मोल्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा। जर्मन सेनाएँ फ्रांस के अंदर तक घुस गईं और 20 जनवरी 1871 को पेरिस के पतन के पश्चात् युद्ध समाप्त हो गया।

अंततः 10 मई 1871 को फ्रैंकफर्ट में एक संधि हुई जिसके अनुसार फ्रांस को एल्सास और लारेन के प्रदेश, बेलफोर्ट के किले को छोड़कर, जर्मनी को देने पड़े। फ्रांस ने पांच अरब फ्रांक हर्जाने के रूप में देने का वादा किया और हरजाने की अदायगी तक जर्मन सेना फ्रांस में मौजूद रहती।

जर्मन-साम्राज्य की घोषणा (Declaration of the German Empire)

सेडान के युद्ध के बाद नेपोलियन प्रथम के दमन से क्षुब्ध प्रशा ने फ्रांस से पुराना बदला लेते हुए फ्रांस के प्रसिद्ध वर्साय के शीशमहल में 18 जनवरी 1871 को जर्मन साम्राज्य की घोषणा की और जर्मनी के सम्राट के रूप में विलियम प्रथम का राज्याभिषेक किया गया।

इस प्रकार सदियों से बँटे हुए जर्मनी का बिस्मार्क ने अपनी ‘लौह एवं रक्त की नीति’ के बल पर एकीकरण संपन्न कर दिया। इसी चतुरता के कारण विलियम प्रथम ने बिस्मार्क को ‘बाजीगर’ कहा था।

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