चोल राजवंश का राजनीतिक इतिहास (Political History of Chola Dynasty, 850-1279 AD)

सुदूर दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश में प्राचीनकाल में जिन राजवंशों का उत्कर्ष हुआ, उनमें चोलों का विशिष्ट स्थान है। इनका प्राचीन राज्य चोल देश या चोडमंडलम् पेन्नार और बेल्लारु नदियों के बीच स्थित था। किंतु इस राज्य की भौगोलिक सीमा इस राजवंश के शासकों की शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार समय-समय पर बदलती रही। प्रारंभ में चोलों ने उरगपुर (तमिलनाडु में त्रिचनापल्ली के निकट उरैयूर) में अपनी राजधानी स्थापित की, किंतु आगे चलकर क्रमशः कावेरीपट्टनम्, तंजुवुर (तंजोर) तथा गंगैकोंडचोलपुरम् भी इनकी राजधानियाँ बनीं। चोल वंश या चोल साम्राज्य का राजकीय चिन्ह बाघ था, जो उनके ध्वज पर भी अंकित मिलता है। इसके साथ ही, चोल शासकों ने तमिल और संस्कृत को राजकीय भाषा के रूप में अपनाया। इन शासकों के अभिलेख संस्कृत, तमिल और तेलुगू भाषाओं में मिलते हैं।

संगमकालीन चोल राजवंश का एक महत्वपूर्ण शासक करिकाल था, जिसने चोलों की अपनी प्रतिष्ठा को बनाकर रखा था। इसके बाद चोल वंश की शक्ति क्षीण हो गई और वे शक्तिशाली पल्लवों, चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के अधीन सामंत बनकर रह गये। 9वीं सदी के उत्तरार्द्ध से विजयालय के नेतृत्व में चोलों की शक्ति का पुनरुत्थान हुआ और देखते ही देखते चोल सुदूर दक्षिण की एक महान् शक्ति बन गये और तेरहवीं सदी के मध्य तक शासन करते रहे। प्रतिभाशाली चोल नरेशों के सफल नेतृत्व में चोल साम्राज्य अपने स्वर्णिम काल में तुंगभद्रा नदी के दक्षिण के सभी भू-भागों और अरब सागर के बहुत से द्वीपों पर फैला हुआ था।

चोल राजवंश का राजनीतिक इतिहास (Political History of Chola Dynasty, 850-1279 AD)
चोल राजवंश का साम्राज्य-विस्तार और प्रभाव-क्षेत्र

चोल राजवंश के ऐतिहासिक साधन

चोल राजवंश के इतिहास-निर्माण में पुरातात्विक और साहित्यिक दोनों ही स्रोतों से सहायता मिलती है। किंतु चोलों के पुरातन इतिहास-निर्माण के एकमात्र साधन साहित्यिक ही हैं, जिनमें संगम साहित्य सबसे महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि संगम साहित्य की तिथि विवादग्रस्त है, किंतु इनमें से कुछ रचनाएँ ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों की मानी जाती हैं। ‘शिलप्पदिकारम्’ तथा ‘मणिमेकलै’ जैसी कुछ संगमयुगीन कृतियाँ परवर्ती काल की हैं, किंतु इनसे पुरातन इतिहास एवं सभ्यता की जानकारी मिलती है। संगम साहित्य में उल्लिखित अनेक तथ्यों की पुष्टि पेरीप्लस तथा टॉलमी जैसे लेखकों के विवरणों से भी होती है।

परवर्ती महान् चोल शासकों अर्थात् विजयालय और उसके उत्तराधिकारियों के इतिहास-निर्माण के लिए दशवीं-ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में प्रवर्तित शैव संतों के चरित विशेष उपयोगी हैं, जिसका श्रेय नंबि आंडार को दिया जा सकता है। नंबि आंडार ने ही सबसे पहले शैव संतों का चरित उपनिबद्ध किया, जिसके आधार पर शेक्किलार ने ‘तिरुतोंडर पुराणम्’ नामक बृहत्काव्य की रचना की, जिसे ‘पेरियपुराणम्’ भी कहा जाता है। शैव आगमों की तरह वैष्णवागम भी उपयोगी हैं, जिन्हें ‘चार सहस्र स्तुतियाँ’ के रूप में अंतिम रूप दिया गया। इस परंपरा में ‘दिव्यमूरिचरित’ एवं ‘गुरुपरम्परै’ महत्वपूर्ण हैं। इनमें वैष्णव आलवारों की क्रमबद्ध सूची के साथ-साथ तत्कालीन प्रचलित लोक परंपराओं एवं विश्वासों का भी वर्णन मिलता है।

धार्मिक साहित्य के साथ-साथ इस युग में अनेक लौकिक साहित्य की भी रचना की गई। इस दृष्टि से बुद्धमित्ररचित ‘वीरशोलियम’, जगगोंडार रचित ‘कलिंगत्तुप्परणि’, ओट्टकूतन लिखित ‘तक्कयागप्परणि’ तथा तीन उलाएं एवं ‘कुलोत्तुंगन पिल्लैत्तमिल’ विशेष उल्लेखनीय हैं। बौद्ध बुद्धमित्र ने वीर राजेंद्र के शासनकाल में तमिल व्याकरण वीरशोलियम् की रचना की थी। वीरशोलियम् के पहले एक जैन लेखक अमितसागर ने ‘याप्परुंगलम्’ तथा ‘याप्परुंगलम् कारिकै’ की रचना की थी। कलिंगत्तुप्परणि में जयगोंडार ने कुलोत्तुंग प्रथम के सेनापति करुणाकर तोंडैमान की कलिंग विजय का वर्णन किया है। यद्यपि इसमें काल्पनिकता और अलौकिकता का बाहुल्य है, फिर भी, इससे चोलों की वंशावली और कुलोत्तुंग की कलिंग-विजय के संबंध में पर्याप्त सूचना मिलती है। पारणि परंपरा, जो साहित्य की वीरगाथात्मक विधा है, की दूसरी कृति तक्कयागप्परणि, जिसकी रचना ओट्टकूटन ने की थी, ऐतिहासिक कम पौराणिक अधिक है। शेक्किलार द्धारा रचित पेरियपुराणम् में चोल शासक कुलोतुंग द्वितीय की शासनावधि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

परणि के समान उला भी एक साहित्यिक विधा है। इसमें राजा की कल्पना एक ऐसे शासक के रूप में की जाती है, जो राज्य की सभी चिंताओं से मुक्त सुखमय जीवन जीता है। इसमें राजा की राजसभा के प्रमुख व्यक्तियों के विषय में विशद सूचना मिलती है, जिसके कारण उला का यह भाग इतिहास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है। उलाओं में विक्रमचोल, कुलोत्तुंग द्वितीय और राजराज द्वितीय से संबंधित उलाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ‘कुलोत्तुंग पिल्लैत्तमिल’ कुलोत्तुंग द्वितीय पर आधारित एक बाल कविता है। इतिवृत्तों तथा स्थल पुराणों की संख्या तो बहुत अधिक है। इनमें ‘नवचोलचरित’, ‘बृहदीश्वर महात्म्य’ अथवा ‘चोल वंशचरित’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। नवचोलचरित की रचना कन्नड़ में की गई थी, किंतु बाद में इसका तेलगु में रूपांतर किया गया। संस्कृत बृहदीश्वर का तमिल में अनुवाद भी मिलता है। एक अन्य कृति ‘कोंगुदेश राजाक्कल’ है, किंतु इसमें काल्पनिकता का पुट अधिक है। जैन विद्वान् तिरुत्कदेवर द्वारा रचित ‘जीवन चिंतामणि’ ग्रंथ से भी चोल साम्राज्य की जानकारी मिलती है।

दक्षिण के इन ग्रंथों के साथ-साथ कात्यायन ने भी चोलों का उल्लेख किया है, जो संभवतः चोलों का प्राचीनतम् उल्लेख है। सिंहली इतिवृत महावंश से भी चोल राजाओं और श्रीलंका के पारस्परिक संबंधों का ज्ञान होता है। इससे परांतक की पांड्य-विजय तथा राजेंद्र चोल प्रथम की लंका-विजय से संबंधित सूचनाएँ मिलती हैं। रामायण तथा महाभारत में भी चोल राज्य और दक्षिण भारत की नदियों का उल्लेख मिलता है। महाभारत में केरल और चोल राज्य की मुक्ता का उल्लेख मिलता है। महाभाष्य में काँचीपुर का वर्णन किया गया है। पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ से चोल शासकों और साम्राज्य के संबंध में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी मिलती है। कात्यायन द्वारा रचित ‘वार्तिक’ भी चोल साम्राज्य के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

भारतीय साहित्यिक ग्रंथों के साथ-साथ क्लासिकी लेखकों और विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी चोलों के इतिहास-निर्माण में सहायता मिलती है। ‘पेरीप्लस ऑफ द इरीथ्रियन सी’ के अज्ञात लेखक और भूगोलवेत्ता टॉलमी ने भी अपने विवरणों में चोल राज्य का उल्लेख किया है। पेरिप्लस से पश्चिमी समुद्रतट से पाश्चात्य देशों के साथ होने वाले व्यापार पर प्रकाश पड़ता है। चीनी साक्ष्यों से पता चलता है कि चोलों और चीनी शासकों के बीच राजनयिक संबंध थे। एक चीनी अनुश्रुति के अनुसार राजराज प्रथम और कुलोत्तुंग चोल प्रथम के समय में चोल राज्य से चीन के लिए राजदूत भेजे गये थे। चीनी यात्री चाउ-जु-कुआ से चोलों की शासन व्यवस्था पर कुछ प्रकाश पड़ता है।

किंतु चोलों के इतिहास-निर्माण में साहित्यिक साक्ष्यों से अधिक उपयोगी पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं, जो अभिलेखों, मुद्राओं और स्मारकों के रूप में मिलते हैं। संगमकालीन चोलों के इतिहास की जानकारी के लिए अभिलेख अधिक उपयोगी नहीं हैं, किंतु विजयालय के बाद से चोल शासकों के अभिलेखों की संख्या बढ़ने लगती है, जो प्रायः ताम्रशासनों के रूप में मिले हैं और जिनमें एक अलंकृत काव्य-शैली में एक प्रस्तावना के रूप में उस समय की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया गया है। राजराज प्रथम के समय में पत्थर पर घटनाओं को उपनिबद्ध करने की नई प्रथा प्रचलित हुई, जिसका अनुपालन बाद में भी होता रहा। इनसे शासकों की उत्तरकालीन घटनाओं, सामान्य इतिहास और कालक्रम की अच्छी जानकारी मिलती है।

चोल राजवंश के अभिलेखों में विजयालय कुल के आदित्य प्रथम के तिरुकल्लकुकरम्, तक्कोलम् तथा तिलोत्तम् लेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसके उत्तराधिकारी परांतक प्रथम के विषय में तोंडैमान तिरुवोर्रैयूर, किलयुत्तगुर तथा उत्तरमल्लूर आदि अभिलेख बहुत उपयोगी हैं। राजराज प्रथम के विषय में इसके तथा इसके उत्तराधिकारियों के लेखों से सूचनाएँ मिलती हैं। इस दृष्टि से तंजोर अभिलेख, मेलपाडि लेख, वृहत् लीडेन दानपत्र, तिरुवलंगाडु दानपत्र तथा वीरराजेंद्र के कन्याकुमारी लेख व राजेंद्र तृतीय के तिरुवेंदिपुरम् अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। तिरुवेंदिपुरम् अभिलेख में चोलवंश के उत्कर्ष एवं अपकर्ष और राजराज तृतीय को उसके सामंत होयसल शासकों द्वारा दी गई सहायता का वर्णन मिलता है। राजाधिराज प्रथम के मणिमंगलम् अभिलेख से श्रीलंका की विजय पर प्रकाश पड़ता है।

चोलों के इतिहास-निर्माण में इनके अपने लेखों के साथ-साथ समकालीन राजवंशों के लेख भी उपयोगी हैं। इस दृष्टि से चोलों के सामंतों, बाणों, कदंबों, बैडुम्बों नोमम्बों, राष्ट्रकूटों, पांड्यों तथा पूर्वी चालुक्यों के कुछ लेखों से चोल लेखों में वर्णित घटनाओं का समर्थन होता है।

अभिलेखों के साथ-साथ सिक्के भी चोलों के इतिहास-निर्माण में सहायक हैं, यद्यपि अभिलेखों की तुलना में इनका महत्त्व कम है। चोल शासकों ने सोने, चाँदी तथा ताँबे के सिक्के चलाये थे, किंतु इनमें से चाँदी तथा ताँबे के सिक्के ही मिले हैं। इन सिक्कों से उनकी राजनीतिक गतिविधियों एवं उपलब्धियों के साथ-साथ इनकी आर्थिक प्रगति का भी ज्ञान होता है। चोलों के एक विशेष प्रकार के सिक्कों पर दो द्वीप-स्तंभों के बीच एक व्याघ्र बना है और ऊपर एक छत्र प्रदर्शित है। अनुमानतः यह चोलों द्वारा कल्याणी के चालुक्यों की विजय के अवसर पर प्रवर्तित किया गया था। कुछ सिक्कों पर शासक के साथ अधीन सामंतों और उनके प्रतीकों का भी अंकन मिलता है। ग्यारहवीं शती ईस्वी के कुछ चोल सिक्कों पर ‘वृष’ अंकित है, जिससे चोल राजनीति में होयसलों का प्रभुत्व प्रमाणित होता है। चोलों के कुछ सिक्के उनके द्वीपांतर शासन के प्रमाण है। यहाँ से प्राप्त कुछ सिक्कों पर हाथी अंकित है तथा तमिल में ‘मार’ लिखा है। इस पर शंख-चक्र प्रतीक भी अंकित है। कुछ विद्वानों के अनुसार इन सिक्कों का प्रचलन उस समय किया गया था, जब पांड्यों ने चोलों पर अधिकार कर लिया था। मारवर्मन् के संबंध में ज्ञात है कि उसने दोनों को पराजित कर उरैयूर तथा तंजोर को भस्मीभूत कर पुनः चोलों का राज्य उन्हें वापस कर दिया था।

चोल इतिहास के निर्माण में स्मारकों और मूर्तियों से भी सहायता मिलती है। मंदिरों की कुर्सियों, स्तंभों तथा दीवारों में अनेक लेख उत्कीर्ण किये गये थे। तंजोर का राजराजेश्वर मंदिर इसका ज्वलंत उदाहरण है। पुराने मंदिर के जीर्णोद्वार के समय पुराने लेखों की प्रतिलिपियाँ उतार ली जाती थीं और उन्हें पुनः नये मंदिर में उत्कीर्ण कर दिया जाता था। कभी-कभी ईंटों की दीवारों पर भी लेख उत्कीर्ण करवाये जाते थे। मंदिरों के निर्माण से वास्तुकला की प्रगति का ज्ञान होता है। चोलकाल काँस्य मूर्तियों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है, जो मूर्तिकला के क्षेत्र में उनकी दक्षता के साथ-साथ धातुविज्ञान की प्रगति का भी परिचायक है।

चोलों का अभिजन तथा कुलनाम

प्राचीन भारत के अन्य अनेक राजवंशों की भाँति चोलों की उत्पत्ति का भी स्पष्ट ज्ञान नहीं है। परिमेललगर जैसे विद्वान् ‘चोल’ को पांड्य तथा चेर के समान एक वंश का नाम मानते हैं। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि जेरन, पंडियन तथा शोलन नामक तीन भाइयों से चेर, पांड्य तथा चोल राजवंशों की उत्पत्ति हुई थी। किंतु इस मत की ऐतिहासिकता संदिग्ध है।

कर्नल जेरिनि ने ‘चोल’ शब्द को संस्कृत ‘काल’ (काला) तथा ‘कोल’ से संबंधित किया है। ‘कोल’ शब्द का प्रयोग प्राचीन काल में दक्षिण भारत में विद्यमान कृष्णवर्ण की एक प्राक्-आर्य जाति के लिए किया जाता था। इसी प्रकार ‘चोल’ शब्द को संस्कृत ‘चोर’ तथा तमिल ‘चोलम्’ (बाजरा) से संबंधित किया जाता है। किंतु ये सभी व्युत्पत्तियाँ अस्वाभाविक और काल्पनिक प्रतीत होती हैं। डॉ. राजबली पांडेय के अनुसार चोल का सबसे निकटवर्ती शब्द चूल (श्रेष्ठ) है। द्रविड़ प्रदेश के प्राचीन राजाओं में चोल शिरोमणि थे, इसीलिए ये चोल कहे गये। उत्तर भारत से ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों को दक्षिण में बुलाने और संस्कृत साहित्य को विशेष प्रश्रय देने से लगता है कि चोल भी उत्तर भारत से द्रविड़ प्रदेश में गये और वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित किये। साहित्य एवं लेखों में इन्हें सूर्यवंशी कहा गया है। इससे प्रतीत होता हैं कि ये क्षत्रिय थे। चोलों को किल्लि, वलवन और शेंबियन कहा गया है। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार किल्लि शब्द किल् से बना है, जिसका अर्थ खोदना या विदारण करना है। वलवन का अर्थ उर्वरता है और कावेरी की भूमि अपनी उर्वरता के लिए प्रसिद्ध थी। शेंबियन का अर्थ है-शिबि की संतान। अनुश्रुतियों में राजा शिबि द्वारा बाज से कपोत के प्राण-रक्षा की कहानी मिलती है। प्राचीन चोल पुराण कथाओं में भी शिबि की इस कहानी का उल्लेख मिलता है। चोलों का कुलचिन्ह बाघ था। तेलगु प्रदेश के कुछ स्थानीय राजाओं के, जो अपने को करिकाल की संतान मानते हैं, कुलचिन्ह के रूप में सिंह का प्रयोग किया गया है।

चोलों का प्राचीनतम् उल्लेख

संगम साहित्य में सुदूर दक्षिण में तीन प्रमुख राज्यों- चोल, चेर और पांड्य के उद्भव और विकास का विवरण मिलता है। उत्तर-पूरब में चोल, दक्षिण-पश्चिम में चेर और दक्षिण-पूरब में पांड्यों का राज्य स्थित था। चोल राजवंश की प्रथम जानकारी कात्यायन के वार्तिक से मिलती है, जहाँ इन्हें पांड्यों के साथ रखा गया है। चोलों का प्रथम ऐतिहासिक उल्लेख मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों में मिलता है, जहाँ इनकी गणना सीमावर्ती राज्य के रूप में पांड्यों और केरलों के साथ की गई है। लेखों में इनका उल्लेख बहुवचन में है, जिससे लगता है कि अशोक के समय कई चोल राज्य अस्तित्व में थे।

संगम युग के कतिपय कवियों ने एक कहानी में मौर्यों (मोरियों) के दक्षिण पर आक्रमण की चर्चा मिलती है। मामूलनार के अनुसार मोहर राजा के विरोध करने पर भी मौर्य अपनी सेना के साथ दक्षिण आये थे। पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी के अज्ञात लेखक और भूगोलवेत्ता टॉलसी भी प्रसंगतः चोलों का उल्लेख करते हैं। पेरिप्लस का अज्ञात लेखक लिखता है कि कोलची के अलग एक दूसरा जिला है, जिसे तटीय प्रदेश कहा जाता है। यह एक खाड़ी पर स्थित है। इसके भीतरी प्रदेश को आर्गरु कहते हैं। इससे लगता है कि चोल देश दो भागों में बँटा हुआ था। एक तटीय भाग था और दूसरा इससे अलग भीतरी भाग। भूगोलवेत्ता टॉलमी ने चोलों की राजधानी उरैयूर (ओर्थुरा रीगिया सोनर्ति) का उल्लेख किया है और इस देश के बंदरगाहों की चर्चा की है। स्रोतों से पता चलता है कि आरंभ में चोलों की राजधानी उत्तरी ‘मलनुर’ थी। कालांतर में वह उरैयूर और तंजावूर हो गई। चोलों का राजकीय चिन्ह बाघ था।

देखें- संगमयुगीन चोल शासक

महान चोल वंश का इतिहास

संगमयुग में कलभ्रों ने पांड्यों और चोलों को आक्रांत कर उनकी शक्ति नष्ट-भ्रष्ट कर दी थी। पांड्यों तथा पल्लवों ने तो किसी प्रकार कलभ्रों को अपदस्थ कर अपनी सत्ता पुनः स्थापित कर ली, किंतु चोल कई शताब्दियों तक अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। नवीं शती ईस्वी के दूसरे चरण के पहले चोल पल्लवों और पांड्यों के अधीनता में कभी एक की, तो कभी दूसरे की, समय एवं परिस्थिति के अनुसार सेवा कर तथा वैवाहिक संबंधों के माध्यम से अपने वंश के अस्तित्व बनाये रखे। नवीं शती ईस्वी के उत्तरार्द्ध में विजयालय के आगमन से चोलों की शक्ति का पुनरुत्थान हुआ। विजयालय ने उरैयूर (जो संगमकाल में चोलों की राजधानी थी) को केंद्र बनाकर अपनी शक्ति का विस्तार प्रारंभ किया और एक ऐसे चोल साम्राज्य की स्थापना की, जो देखते ही देखते दक्षिण भारत की एक महान् शक्ति बन गया और लगभग दो सौ वर्षों तक दक्षिण भारत की एक प्रमुख शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित रहा।

विजयालय (लगभग 848-871 ई.)

9वीं सदी के मध्य में विजयालय ने चोल शक्ति की पुनर्स्थापना की। विजयालय पल्लव शासकों के अधीन एक शक्तिशाली शासक था। इसने मुत्तरैयरों, जो पांड्यों के अधीन शासन कर रहे थे, से तंजोर छीन लिया और इसे चोलों की राजधानी बनाया। इस प्रकार चोलों की प्राथमिक राजधानी ‘उरगपुर’ से हटकर ‘तंजोर’ (थंजावुर अथवा तंजावर) में स्थापित हो गई। तिरुवालंगाडु ताम्रपट्टों में कहा गया है कि विजयालय ने विलासपूर्वक तंजोर को इस प्रकार पकड़ लिया, मानो यह नगर उसकी विवाहिता रानी हो और यहाँ इसने निशुंभसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।

आर संथियनथय्यर के अनुसार पल्लव तथा पांड्यों की पारस्परिक शत्रुता तथा युद्धों के कारण विजयालय ने मुत्तरैयरों से तंजोर अपहृत कर लिया और ऐसा उसने अपने पल्लव अधिपति के आदेश पर किया होगा। संभवतः उसे कावेरी प्रदेश में व्याप्त राजनीतिक उथल-पुथल का लाभ भी मिला था। काँची तथा शचींद्रम जैसे दूर स्थानों से प्राप्त परकेशरि नामक शासक के लेख संभवतः विजयालय के ही हैं।

वास्तव में पांड्यों तथा पल्लवों की पतनावस्था का लाभ उठाकर विजयालय ने अपनी शक्ति का पर्याप्त विस्तार कर लिया और उत्तरी तथा दक्षिणी बेल्लार नदियों के बीच के प्रदेश के अतिरिक्त कावेरी नदी की घाटी तक तथा कोलेरुन तक अपने प्रभुत्त्व को बढ़ा लिया।

विजयालय की तिथि का समकालीन लेखों से कोई ज्ञान नहीं होता है। किंतु इसके उत्तराधिकारियों की तिथि के आधार पर इसकी तिथि का निर्धारण किया जा सकता है। कीलहार्न इसके पौत्र परांतक प्रथम के राज्यारोहण की तिथि 907 ई. मानते हैं। आदित्य प्रथम के चौबीसवें वर्ष के तक्कोलम् के एक लेख में एक सूर्यग्रहण का उल्लेख है, जो 894-95 ई. में पड़ा था। इस आधार पर आदित्य का राज्यारोहण 870-871 ई. के लगभग और विजयालय का शासनांत 870-71 ई. के लगभग माना जा सकता है। सामान्यतः इसका शासनकाल बीस वर्ष माना जाता है, इसलिए इसके शासन का आरंभ 850-51 ई. के लगभग माना जा सकता है।

आदित्य प्रथम (871-907 ई.)

विजयालय के बाद उसका पुत्र आदित्य प्रथम लगभग 870-71 ई. में चोल राज्य का उत्तराधिकारी हुआ। आदित्य ने पल्लव शासक अपराजित को पांड्यों के विरुद्ध सहायता दी। बाद में 893 ई. के लगभग उसने अपराजित को परास्त करके मार डाला और संपूर्ण तोंडैमंडल पर अपना अधिकार करके चोल वंश के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। कालांतर में इसने पल्लवों के शेष राज्य पर भी अधिकार लिया और पश्चिमी गंगों को भी अपने अधीनता मानने के लिए बाध्य किया। इस प्रकार आदित्य प्रथम का साम्राज्य कालहस्ति तथा तिरुक्कलुक्कुनम् से लेकर पुडककोट्टै तथा कोयंबटूर तक फैल गया, जिसमें तोंडैमंडलम् तथा तालकाड प्रदेश सम्मिलित थे।

आदित्य प्रथम परम शैव था। इसे कई शिवमंदिरों के निर्माण का श्रेय दिया गया है। अन्विल ताम्रपत्रों के अनुसार इसने कावेरी नदी के दोनों तटों पर कई मंदिरों का निर्माण करवाया था, जिससे सह्य पर्वत से लेकर समुद्रपर्यंत का प्रदेश अत्यंत रमणीय हो गया था।

आदित्य प्रथम का एक विवाह एक पल्लव राजकुमारी से हुआ था। इसकी अग्रमहिषी इलंगोनपिच्चि राष्ट्रकूट कृष्ण द्वितीय की पुत्री थी। इसके परांतक तथा कर्णदेव नामक दो पुत्रों के संबंध में जानकारी मिलती है। इसकी मृत्यु 907 ई. में कालहस्ति के समीप तोडैंमानाडु में हुई थी, जहाँ इसके पुत्र परांतक प्रथम ने अपने पिता की स्मृति में कोदंडरामेश्वर तथा आदित्येश्वर नामक मंदिरों का निर्माण करवाया था।

परांतक प्रथम (907-956 ई.)

आदित्य प्रथम की मृत्यु के बाद 907 ई. में उसका पुत्र परांतक प्रथम चोल राजसिंहासन का उत्तराधिकारी हुआ। दक्षिण भारत में चोल शक्ति की स्थापना का वास्तविक श्रेय इसी को प्राप्त है। इसने शासन के प्रारंभ में ही राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण द्वितीय के आक्रमण का सामना किया और अजेय कृष्णराज को पराजित कर ‘वीरचोल’ को उपाधि धारण की। अपने शासनकाल के तीसरे वर्ष में परांतक ने श्रीलंका और पांड्यों को पराजित करके ‘मदुरैकोंड’ और ‘संग्रामराघव’ की उपाधि धारण की थी।

करंदै ताम्रलेखों से पता चलता है कि परांतक प्रथम ने कृषि की सुविधा के लिए नहरों का निर्माण करवाया था। उसने संभवतः 956 ई. तक शासन किया था। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

गंडरादित्य ((956-57 ई.)

परांतक प्रथम की मृत्यु (लगभग 956 ई.) से लेकर राजराज चोल प्रथम के राज्यारोहण (985 ई.) तक का चोल इतिहास अस्पष्ट और अस्त-व्यस्त है। इस अवधि में चोलों के वंशानुक्रम, तिथि एवं घटनाक्रम का स्पष्ट ज्ञान नहीं है।

इतिहासकारों के अनुसार परांतक प्रथम की मृत्यु के बाद उसके दूसरे पुत्र गंडरादित्य ने 956 ई. के आसपास शासन ग्रहण किया। इसने संभवतः बहुत कम समय (957 ई.) तक शासन किया और इसकी किसी विशेष उपलब्धि की सूचना नहीं मिलती है। तोंडैमंडलम् प्रदेश पर राष्ट्रकूटों का अधिकार बना रहा और इसे बार-बार कृष्ण तृतीय के आक्रमणों का सामना करना पड़ रहा था।

गंडरादित्य के शासनकाल के दूसरे वर्ष के एक लेख में इसके एक सामंत ने दावा किया है कि उसने वीरचोलपुरम् में अपने शत्रुओं को पराजित किया था। लेख में शत्रु का नाम नहीं है, किंतु अनुमान है कि यह सरदार नरसिंहवर्मा था, जिसने अपने शासन के सत्रहवें वर्ष में (955 ई.) कृष्ण तृतीय की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

गंडरादित्य की महारानी शेंबियन एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी, जिससे उत्तमचोल पैदा हुआ था। गंडरादित्य की आकस्मिक मृत्यु के बाद भी यह 1001 ई. तक जीवित रही। इसने कई पाषाण मंदिरों का निर्माण करवाया तथा उसके निमित्त दान दिया। गंडरादित्य साहित्य प्रेमी था और कहा जाता है कि चिदंबरम् मंदिर के श्लोक की रचना इसने स्वयं की थी। गंडरादित्य का शासन 957 ई. के लगभग समाप्त हुआ।

अरिंजय (957 ई.)

गंडरादित्य के अल्पकालीन शासन के बाद उसका भाई अरिंजय (957 ई.) चोल राजसिंहासन पर बैठा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार ‘अरिकुलकेशरि’ इसकी उपाधि थी, किंतु इस संबंध में निश्चितता के साथ कुछ कहना संभव नहीं है।

अरिंजय का शासनकाल भी अत्यल्प रहा। इसकी दो रानियाँ वोमन कुंददैयार और कोदईपिदात्तियार इसकी मृत्यु के बाद भी जीवित थीं।

संभवतः अरिंजय ने राष्ट्रकूट कृष्ण तृतीय से चोलों के प्रदेशों को छीनने का प्रयास किया था, किंतु सफलता नहीं मिली और इसी प्रयास में उसकी मृत्यु हो गई। लेखों के अनुसार अरिंजय की मृत्यु मेलपाणि के आसपास (संभवतः आर्रुर में) हुई थी क्योंकि राजराज के एक अभिलेख में कहा गया है कि उसने वहाँ मरने वाले राजा की स्मृति में एक मंदिर का निर्माण करवाया था। इससे लगता है कि आर्रुर मेलपाडि के आसपास ही रहा होगा।

परांतक चोल द्वितीय या सुंदरचोल (957-973 ई.)

अरिंजय की मृत्यु (957 ई.) के बाद अन्विल ताम्रपत्र में उल्लिखित इसकी रानी वैदुम्ब राजकुमारी कल्याणी से उत्पन्न पुत्र सुंदर चोल परांतक द्वितीय के नाम से चोल सिंहासन का उत्तराधिकारी हुआ, जिसे ‘मदुरैकोंड राजकेशरि’ की उपाधि दी गई है। परांतक द्वितीय ने पांड्य शासक को पराजित किया था। इसकी मृत्यु काँचीपुरम् में हुई थी और मृत्यु के बाद इसे ‘पोनमलिगैतुंजिनतेव’ उपाधि दी गई थी। इसकी एक रानी वानवन महादेवी इसकी मृत्यु के बाद सती हो गई थी।

परांतक द्वितीय ने परम शैव होते हुए भी नेगपत्तिनम् में एक बौद्ध मठ के लिए एक गाँव दान दिया था। जीवन के अंतिम दिनों में इसके पुत्र आदित्य द्वितीय करिकाल की हत्या हो गई थी और इसी दुःख में परांतक द्वितीय की 973 ई. में मृत्यु हो गई। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

उत्तमचोल (973-985 ई.)

उत्तमचोल परांतक द्वितीय का चचेरा भाई और शेंबियन महादेवी तथा गंडरादित्य का पुत्र था। इसने 973 ई. से 985 ई. तक शासन किया था।

गंडरादित्य की मृत्यु के समय उत्तमचोल संभवतः अल्पायु था, इसलिए गंडरादित्य के बाद चोल सिंहासन पर उसके छोटे भाई अरिंजय को बैठाया गया था। अरिंजय के अल्पकालीन शासन के बाद उसका पुत्र परांतक द्वितीय (सुंदर चोल) चोल राजगद्दी पर बैठा।

संभवतः परांतक द्वितीय के शासनकाल के अंतिम दिनों में (969 ई.) उत्तमचोल ने उसके बड़े पुत्र आदित्य द्वितीय करिकाल की हत्या करवा दी। आदित्य करिकाल की मृत्यु के बाद परांतक द्वितीय ने विवश होकर उत्तमचोल को ही युवराज घोषित किया और अंत में परांतक द्वितीय के मुत्यु के बाद उत्तमचोल ने चोल राजगद्दी पर अधिकार कर लिया।

तिरुवलंगाडु लेखों के अनुसार आदित्य द्वितीय की मृत्यु के बाद जनता उसके भाई अरुमोलिवर्मन् (परांतक द्वितीय का दूसरा पुत्र) को चोल राजगद्दी पर बैठाना चाहती थी, किंतु राजकुमार अरुमोलिवर्मन ने अवसर की प्रतिकूलता और संभवतः गृहयुद्ध के आशंका से उत्तमचोल से समझौता कर लिया।

इस प्रकार उत्तमचोल ने 973 ई. में चोल शासन की बागडोर संभाली, किंतु इसके शासनकाल की किसी विशेष उपलब्धि का ज्ञान नहीं है। आदित्य परकेशरि और पार्थिवेंद्रवर्मा के शिलालेखों के प्राप्ति-स्थलों, जो उत्तर मेरुर, काँचीपुरम्, तक्कोलम् तथा तिरुवन्नमालै में मिले हैं, से ज्ञात होता है कि इस समय दक्षिणी अर्काट, उत्तरी अर्काट और चिंग्लेपुत्त जिलों पर चोल सत्ता पुनः स्थापित हो गई थी। इन क्षेत्रों से प्राप्त लेखों में प्रायः धार्मिक कृत्यों एवं बिक्री तथा सिंचाई योजनाओं का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में चोल प्रशासन अच्छी तरह से प्रतिष्ठित हो गया था।

उत्तम चोल को संभवतः कल्याणी के चालुक्य शासक तैलप द्वितीय से संघर्ष करना पड़ा था। तैलप द्वितीय के सोगल लेख (980 ई.) तथा निलगुड लेख (982 ई.) में उसे ‘चोलों के लिए आतंक’ कहा गया है। इस चोल की पहचान उत्तमचोल से की जाती है। किंतु इस संघर्ष में तैलप द्वितीय को सफलता मिली और कल्याणी के चालुक्य राज्य का दक्षिण में विस्तार हुआ।

उत्तमचोल के कई सिक्के पांड्य देश और ईलम (सिंहल) से पाये गये हैं, जिससे लगता है कि चोल सेना ने पांड्यों और उनके सहयोगी सिंहलों को पराजित किया था। उत्तमचोल की स्वर्ण मुद्राओं से पता चलता है कि उसने चोल साम्राज्य की सुरक्षा तथा सुव्यवस्था में अधिक समय एवं शक्ति लगाया था, जिसके कारण चोल राज्य में आर्थिक समृद्ध थी। उसने सेना में सैनिकों के स्तर पर ही नहीं, गुणवत्ता और संगठन के स्तर पर भी सुधार किया था। उत्तमचोल एक सहिष्णु शासक था। एक उत्साही शिवभक्त होने के बावजूद उसने कई मंदिरों को धन, मवेशी, भेड़ आदि दान दिया था।

चोल शिलालेखों में उत्तमचोल के कई अधिकारियों के नाम मिलते हैं। उसका एक महत्वपूर्ण सेनापति पलुवेट्टारियार मारवन कंडानार था, जिसने सुंदर चोल के अधीन भी काम किया था। उसके पुत्र कुमारन मारवन ने भी उत्तमचोल की सेवा की थी। उत्तमचोल का एक अधिकारी एक अरंवेलन पुलुवूरनक्कन पेरुंदरम् था, जिसे उत्तमचोल ने ‘विक्रमशोल शारायर’ की उपाधि दी थी। इसने विजयमंगलम् के प्राचीन मंदिर का निर्माण करवाया था। इसका पुत्र मधुरांतक गंडरादित्य भी एक उच्च अधिकारी था।

अभिलेखों में उत्तमचोल की कई रानियों के भी नाम मिलते हैं। इसकी अग्रमहिषी ओरट्टणन सोरब्बैयार थी, जिसे त्रिभुवन महादेवियार के नाम से भी संबोधित किया गया है। अन्य रानियों में कडुवेत्तिगल नंदीपोत्तैरैय्यर (संभवतः पल्लव राजकुमारी) और सिद्धवदवन सुत्तियार थीं। उसकी माँ शेंबियन महादेवी ने अनेक मंदिरों के पुनर्निर्माण के साथ-साथ संभवतः कुर्रलम के चोलेश्वर मंदिर का निर्माण भी करवाया था। उत्तमचोल ने 985 ई. तक शासन किया था।

राजराज चोल प्रथम (985-1014 ई.)

उत्तमचोल के बाद परांतक द्वितीय का दूसरा पुत्र अरमोलिवर्मन् (अरुलमोझिवर्मन्) ‘राजराज’ की उपाधि धारण कर चोल राजगद्दी पर आसीन हुआ। राजराज ने पश्चिमी गंगों, वेंगी के पूर्वी चालुक्यों, मदुरा के पांड्यों, कलिंग के गंगों और केरल के चेरों को पराजित किया और सुदूर दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार किया।

राजराज ने दक्षिण भारत में सर्वप्रथम एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया और उसकी सहायता से कुर्ग, संपूर्ण मालाबार तट और श्रीलंका के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया। इसने पूर्वी द्वीपसमूहों पर आक्रमण किया और श्रीविजय साम्राज्य के राजा तुंगवर्मन् से मित्रता की।

राजराज के शासनकाल में शासन-तंत्र, सैन्य-संगठन, कला एवं स्थापत्य, साहित्य एवं धर्म के क्षेत्रों में भी असाधारण प्रगति हुई। उसने अपने पुत्र को युवराज के रूप में शासन में सम्मिलित करने की परंपरा आरंभ किया और स्थानीय स्वशासन की नींव डाली।

शैव धर्मावलम्बी राजराज प्रथम ने ‘शिवपाद शेखर’ की उपाधि भी धारण की थी और राजराजेश्वर के शिवमंदिर का निर्माण करवाया था, जो तमिल वास्तुकला का एक अद्वितीय उदाहरण है। राजराज प्रथम ने 1014 ई. तक शासन किया। इसके बाद इसका पुत्र राजेंद्र चोल गद्दी पर आसीन हुआ। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ई.)

राजराज चोल की मृत्यु के बाद राजेंद्र चोल औपचारिक रूप से 1014 ई. में चोल सिंहासन पर बैठा। उसने राजेंद्र चोल को 1012 ई. में ही युवराज नियुक्त किया था।

राजेंद्र ने अपने पिता द्वारा शुरू किये गये कार्य को आगे बढ़ाया और चोलों की शक्ति को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। उसने दक्षिण के पांड्यों, चेरों, सिंहलियों को पराजित किया और पश्चिमी चालुक्यों के राज्य पर आक्रमण करके लूटपाट किया। राजेंद्र ने कलिंग, उड़ीसा और बस्तर के मार्ग से पश्चिमी बंगाल पर आक्रमण किया और शक्तिशाली पाल शासक महीपाल को हराया। यही नहीं, इसने समुद्री व्यापार की रक्षा के लिए मलाया, जावा, सुमात्रा के् शैलेंद्र साम्राज्य पर आक्रमण किया और अरब सागर में भी उसने अपनी नौ-सेना की प्रतिष्ठा को स्थापित किया।

राजेंद्र चोल ने गंगैकोंडचोलपुरम् को अपनी राजधानी को बनाया और ‘गंगैकोंडचोल’ की उपाधि धारण की। इसने संभवतः 1044 ई. तक शासन किया था। इसकी रानी वीरमादेवी इसकी मृत्यु के बाद सती हुई थी। इसकी पुत्री अमंगादेवी का विवाह पूर्वी चालुक्य शासक राजराज के साथ हुआ था, जिससे प्रथम चोल-चालुक्य शासक कुलोत्तुंग पैदा हुआ था। इसने अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज बनाया और उसे अपना संभाव्य उत्तराधिकारी घोषित किया था। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजराज चोल प्रथम तथा इसके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम के पश्चात् इसके तीन पुत्रों- राजाधिराज, राजेंद्र चोल द्वितीय तथा वीरराजेंद्र ने क्रमशः शासन किया और चोल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बनाये रखा। इस समय चोलों को अनेक संकटपूर्ण संघर्षों का सामना करना पड़ा, विशेषकर अपने पारंपरिक शत्रु चालुक्यों से, जिसमें चोल राजाधिराज तो युद्धक्षेत्र में ही मारा गया।

राजमहेंद्र को, जो मात्र युवराज ही रहा और इसी में रूप मर गया, शासन करने का कभी अवसर ही नहीं मिला था, किंतु उसने भी अपने लेखों में शासनवर्ष का उल्लेख किया है। राजाधिराज अपने पिता के शासनकाल में लगभग पच्चीस वर्ष तक युवराज के रूप में शासन करता रहा। उसके शासनवर्ष का अंतिम वर्ष छत्तीसवाँ वर्ष है, जो 1033-34 ई. में पड़ता है, किंतु उसने वास्तविक रूप में 1044 ई. में राजगद्दी प्राप्त की थी।

इसी प्रकार राजेंद्र द्वितीय का अभिषेक 1052 ई. में हुआ था। इसका अंतिम शासनवर्ष बारहवाँ वर्ष है। इस प्रकार इसने 1064 ई. तक राज्य किया, जबकि वीरराजेंद्र का अभिषेक 1062-63 ई. में हुआ था। अभिलेखिक साक्ष्यों के आधार पर नीलकंठ शास्त्री ने राजेंद्र के बाद उत्तराधिकारियों का निम्न क्रम निर्धारित किया है-

  1. राजाधिराज राजकेशरी (1018 से 1054 ई.),
  2. राजेंद्र द्वितीय (1052-1064 ई.),
  3. राजमहेंद्र (युवराज रूप में दिवंगत) (1060-1063 ई.),
  4. वीरराजेंद्र राजकेशरी (1063-1069 ई.) और
  5. अधिराजेंद्र परकेशरी (1068-1070 ई.)।

राजाधिराज (1018-1054 ई.)

राजाधिराज ने 1018 ई. में शासन आरंभ किया, किंतु चोल गद्दी पर राजेंद्र की मृत्यु के बाद 1044 ई. में बैठा था। इस तरह उसने पच्चीस-छब्बीस वर्ष तक अपने पिता के साथ युवराज के रूप में शासन किया था।

राज्यारोहण के बाद राजाधिराज ने अपनी अतुलनीय सेना की मदद से श्रीलंका के राजा विक्रमबाहु का ताज उतार लिया और चालुक्यों के साथ संघर्ष किया, जिसमें अंतिम संघर्ष में उसकी मृत्यु हो गई थी। राजाधिराज के कई पुत्र थे, किंतु उसने युवराज का पद अपने पुत्रों को न देकर अपने भाई राजेंद्र को दिया था, जिसने चालुक्य अभियान में इसका साथ दिया था। 1054-55 ई. में चालुक्यों के साथ संघर्ष में राजाधिराज की मृत्यु के बाद राजेंद्र चोल द्वितीय ने शासन किया। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजेंद्र चोल द्वितीय (1052-1064 ई.)

राजेंद्र द्वितीय चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ई.) का दूसरा पुत्र और राजाधिराज (1044-1054 ई.) का छोटा भाई था। अभिलेखों के अनुसार राजाधिराज ने इसका राज्याभिषेक 28 मई 1052 ई. को कर दिया था। किंतु कोप्पम के युद्ध में राजाधिराज की मृत्यु के बाद युद्धभूमि में ही 1054 ई. में इसने अपना राज्याभिषेक किया था।

राजेंद्र चोल द्वितीय अपने संपूर्ण राजत्वकाल में अपने पुत्र एवं भाई वीरराजेंद्र के साथ चालुक्यों के साथ शक्ति-संतुलन में लगा रहा, जिसमें इसे सफलता भी मिली। इसने 1064 ई. तक शासन किया। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

वीरराजेंद्र चोल ( (1063-1070 ई.)

राजेंद्र चोल द्वितीय ने अपने जीवनकाल में अपने पुत्र राजमहेंद्र को 1059 ई. में युवराज नियुक्त कर दिया था, जिसने मुडक्कारु के युद्ध में भाग लिया था और ‘राजकेशरि राजमहेंद्र’ की उपाधि धारण की थी। किंतु शीघ्र ही इसकी मृत्यु हो गई और राजेंद्र चोल द्वितीय ने 1063 ई. में वीरराजेंद्र चोल को युवराज बना दिया गया।

वीरराजेंद्र 1064 में राजेंद्र द्वितीय के बाद चोल राजसत्ता का उत्तराधिकारी हुआ। उसने पश्चिमी चालुक्यों को पराजित किया और वेंगी पर अपना नियंत्रण बनाये रखने का प्रयास किया। यही नहीं, उसने श्रीलंका और कडारम तक की विजय भी की। उसने तिरमुक्ककूडल में एक विद्या केंद्र (पाठशाला) स्थापित किया था और चिदंबरम् के नटराज के मुकुट के लिए एक बहुमूल्य मणि भेंट किया था। वीरराजेंद्र ने संभवतः 1070 ई. तक शासन किया। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

अधिराजेंद्र (1070 ई.)

वीरराजेंद्र चोल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अधिराजेंद्र परकेशरि 1070 ई. में चोल गद्दी पर बैठा, जिसे 1068 ई. में युवराज नियुक्त किया गया था। अधिराजेंद्र एक दुर्बल शासक था, जो चोल साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण रखने में असमर्थ था। ‘विक्रमांकदेवचरित’ से ज्ञात होता है कि वीरराजेंद्र की मृत्यु के बाद विक्रमादित्य षष्ठ काँची गया और वहाँ फैले विद्रोह को दबाकर अधिराजेंद्र को गद्दी पर प्रतिष्ठित किया था। किंतु उसके वापस जाते ही वेंगी के शासक राजग (राजेंद्र द्वितीय) ने उसे मार डाला और राजगद्दी हस्तगत कर ली। इस प्रकार अधिराजेंद्र ने मात्र कुछ महीनों तक ही शासन किया और किसी विद्रोह के दौरान इसका अंत हो गया। उसकी मृत्यु के साथ ही विजयालय द्वारा स्थापित चोल वंश समाप्त हो गया और चोल-चालुक्य वंश की सत्ता स्थापित हुई।

चोल-चालुक्यवंशीय इतिहास

कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1122 ई.)

कुलोत्तुग चोल प्रथम के सिंहासनारोहण से चोल इतिहास में एक नये युग का सूत्रपात हुआ। कलिंगत्तुप्परणि में कहा गया है कि वीरराजेंद्र ने कुलोत्तुंग को अपना युवराज तथा उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। किंतु यह तथ्य विक्रमांकदेवचरित तथा विक्रमशोलन-उला के विवरणों के सर्वथा विपरीत है और वीरराजेंद्र द्वारा कुलोत्तुंग को उत्तराधिकारी घोषित किये जाने का कोई प्रमाण नहीं है। जो भी हो, चोल देश में उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर कुलोत्तुंग प्रथम ने चोल राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया। इसके बाद का चोल इतिहास चोल-चालुक्यवंशीय इतिहास के नाम से जाना जाता है। अनुमान है कि कुलोत्तुंग प्रथम के वीरराजेंद्र प्रथम के साथ अच्छे संबंध थे और उसने बैजवाड़ा के युद्ध में वीरराजेंद्र की मदद की थी। संभवतः वीरराजेंद्र की सहायता से ही वह चोल राजगद्दी पर बेठने में सफल हुआ था।

इस प्रकार कुलोत्तुंग चोल प्रथम ने 1070 ई. में चोल राजगद्दी पर अधिकार कर लिया और विघटनकारी शक्तियों का दमन करना आरंभ किया। 1075 ई. के आसपास उसने कलचुरि नरेश यक्षकर्णदेव को पराजित कर वेंगी पर अधिकार कर लिया। उसने सिंहल नरेश के साथ मैत्री-संबंध स्थापित किया और इस संबंध को सुदृढ़ करने के लिए अपनी कन्या सुत्तमल्लियार का विवाह सिंहली राजकुमार वीरप्पेरुमाल के साथ कर दिया। कुलोत्तुंग ने कलिंग के विरुद्ध भी अभियान किये। उसने उत्तरी भारत के गहड़वालों से राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संबंध स्थापित किया और विदेशों से भी व्यापारिक संपर्क बनाये रखा था।

कुलोत्तुंग चोल प्रथम ने देश की आर्थिक प्रगति की ओर विशेष ध्यान दिया, व्यापार के विकास में बाधक चुंगियों तथा तटकरों को समाप्त कर दिया, जिसके कारण चोल लेखों में उसे ‘शुगम्तविर्त (करों को हटाने वाला) कहा गया है। ज्ञात होता है कि उसने 1122 ई. तक शासन किया था। इसके बाद विक्रमचोल गद्दी पर आसीन हुआ। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

विक्रमचोल (1122-1135 ई.)

कुलोत्तुंग की मृत्यु के बाद 1122 ई. में विक्रमचोल राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित हुआ, जिसे 1118 ई. में युवराज नियुक्त किया गया था। उसे कोलनु के शासक तेलंग भीम पर विजय प्राप्त करने और कलिंग को जलाने का श्रेय दिया गया है। यह कार्य उसने वेंगी के उपशासक के रूप में किया होगा क्योंकि 1118 ई. में कुलोत्तुंग ने उसे वेंगी से बुला लिया था और वहाँ का शासन वेलनाडु के शासक गोंक प्रथम के पुत्र राजेंद्र चोल को दे दिया था। विक्रमचोल वैष्णव धर्मानुयायी था। उसने लगभग 1135 ई. तक शासन किया। उसके बाद उसका पुत्र कुलोतुंग द्वितीय चोल गद्दी पर बैठा। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

कुलोत्तुंग द्वितीय (1135-1152 ई.)

कुलोत्तुंग चोल द्वितीय, कुलोत्तुंग (प्रथम) का पौत्र और विक्रमचोल का पुत्र था। इसके पिता विक्रमचोल ने इसको 1133 ई. में ही युवराज नियुक्त कर दिया था। 1135 ई. में विक्रमचोल की मृत्यु के बाद युवराज कुलोत्तुंग द्वितीय चोल राजगद्दी पर बैठा।

कुलोत्तुंग द्वितीय का शासनकाल राजनीतिक दृष्टि से तो नहीं, किंतु साहित्यिक एवं कलात्मक दृष्टि से प्रगति एवं विकास का काल था। उसे पेरियपुराण के लेखक शेक्किलार, कुलोत्तुंग शोलन-उला के लेखक ओट्टकुट्टन एवं कंबल जैसे लेखकों को संरक्षण देने का श्रेय दिया गया है। उसने संभवतः 1152 ई. तक शासन किया था। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजराज द्वितीय (1146-1173 ई.)

कुलोत्तुंग द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र राजराज द्वितीय 1150 ई. में चोल गद्दी पर आसीन हुआ। पूर्ववर्ती शासकों की भांति कुलोत्तुंग द्वितीय ने इसे 1146 ई. में ही युवराज नियुक्त कर दिया था।

राजराज द्वितीय के शासनकाल के आरंभ में सामान्यतः शांति बनी रही। किंतु 1169 ई. में उसे पांड्यों के गृहयुद्ध में उलझना पड़ गया। इसके लेख तेलगु प्रदेश में द्राक्षाराम तक के समस्त वेंगी राज्य से मिले हैं, जो इस प्रदेश पर इसके अधिकार के सूचक हैं। गंगैकोंडचोलपुरम् अभी भी चोलों का प्रमुख नगर था। उसके शासनकाल में एक दूसरे नगर आयिरत्तलि को भी महत्ता मिली। उसका शासन का अंत 1173 ई. के लगभग माना जाता है। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजाधिराज द्वितीय (1173-1178 ई.)

राजराज चोल द्वितीय के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए उसने अपने जीवनकाल में ही विक्रमचोल के दौहित्र राजाधिराज द्वितीय को 1163 ई. युवराज और अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। राजाधिराज द्वितीय के पाँचवें वर्ष के एक लेख से पता चलता है कि राजाधिराज द्वितीय ने कुलशेखर की सहायता के लिए मदुरा में चोल सेना भेजी थी और श्रीलंका के दंडनायकों को मरवा करके उनके सिरों को मदुरा के दरवाजों पर टंगवा दिया था।

राजराज चोल द्वितीय के शासनकाल में स्थानीय सामंतों और सरदारों की बढ़ती स्वतंत्रता राजाधिराज के शासनकाल में और अधिक स्पष्ट हो गई। इसके शासन के अंतिम वर्षों में वेंगी चोल प्रभाव से मुक्त हो गया। पहले वेलनाडु के सरदारों ने, फिर नेलोर के तेलगु-चोड ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। इस प्रकार केंद्रीय शक्ति की दुर्बलता और सामंतों की बढ़ती शक्ति से चोल साम्राज्य के सम्मान को गहरा आघात पहुँचा। राजाधिराज द्वितीय ने लगभग 1179 ई. तक शासन किया। इसके बाद कुलोत्तुंग तृतीय उसका उत्तराधिकारी हुआ।

कुलोत्तुंग तृतीय (1178-1218 ई.)

राजाधिराज चोल द्वितीय ने अपने शासनकाल के अंतिम दिनों में कुलोत्तुंग चोल तृतीय को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। राजाधिराज द्वितीय की भाँति इसे भी पांड्यों की राजनीति में भाग लेना पड़ा। आरंभ में उसने पांड्यों को पराजित कर ‘चोल-पांड्यम्’ उपाधि धारण की थी। किंतु अंतिम दिनों में उसे होयसलों की सहायता के बावजूद सुंदरपांड्य की अधीनता माननी पड़ी थी। कुलोत्तुंग के शासनकाल में निर्मित कंपहरेश्वर मंदिर कलात्मक दृष्टि से भव्य है, जिसकी दीवारों पर रामायण की घटनाएँ तक्षित हैं। कुलोत्तुंग चोल तृतीय के शासन के बाद 1218 ई. में राजराज तृतीय ने शासन ग्रहण किया। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजराज तृतीय (1216-1256 ई.)

कुलोत्तुंग की मृत्यु के बाद राजराज चोल तृतीय ने 1218 ई. चोल गद्दी ग्रहण की, यद्यपि कुलोत्तुंग ने उसे 1216 ई. में ही युवराज नियुक्त कर दिया था। राजराज तृतीय के शासनकाल में पांड्य, होयसल, काकतीय, तेलगु-चोड, यादव तथा काडव अत्यधिक शक्तिशाली हो गये थे और राजराज तृतीय इन शक्तियों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं था। प्रशासनिक दुर्बलता के कारण काडव, शेतमंगलम् तथा कोपेरुजिंग के विद्रोही सामंतों का उदय हुआ।

राजराज चोल तृतीय ने पांड्य शासक जटावर्मन् सुंदरपांड्य से हुई संधि को तोड़कर चोल साम्राज्य के पतन का मार्ग प्रशस्त किया। केंद्रीय शक्ति की निर्बलता, आंतरिक विद्रोह, शासकीय आज्ञाओं की अवहेलना और सामंतों के पारस्परिक गठबंधन से चोल शक्ति जर्जरित हो गई। इसी विषम परिस्थिति में राजराज तृतीय की 1256 ई. में मृत्यु हो गई। इसके बाद चोल राज्य का उत्तराधिकारी राजेंद्र चोल तृतीय हुआ। विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

राजेंद्र चोल तृतीय (1246-1279 ई.)

राजराज चोल तृतीय के बाद 1256 ई. में राजेंद्र चोल तृतीय (1246-1279 ई.) चोल राजसिंहासन पर बैठा, जो चोल राजवंश का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। राजराज तृतीय ने इसे दस वर्ष पहले 1246 ई. में युवराज नियुक्त किया था। युवराज काल में संभवतः उसने पांड्य राज्य को जीत लिया, और होयसलों तथा काकतीयों को पराजित कर कुछ समय के लिए अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था।

1250 ई. में काकतीय शासक गणपति ने आक्रमण कर काँची पर अधिकार कर लिया। सुंदरपांड्य ने भी होयसल नरेश की सहायता पाकर चोल राज्य पर आक्रमण किया। फलतः विवश होकर राजेंद्र तृतीय को पांड्यों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी और लगभग 1279 ई. तक वह पांडयों के अधीन सामंत के रूप में शासन करता रहा। 1277 ई. के बाद राजेंद्र तृतीय का कोई तिथियुक्त लेख नहीं मिलता। एक लेख में शेमापिल्लै नामक एक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः राजेंद्र तृतीय का पुत्र रहा होगा। उसे पांडयों का सामंत भी बताया गया है। इससे यह लगता है कि संपूर्ण चोल साम्राज्य पांडयों के अधीन हो गया था। इसके बाद चोल शासित प्रदेश पर शक्तिशाली पांड्यों की प्रभुसत्ता स्थापित हो गई और चोल साम्राज्य अतीत का विषय बन गया। राजेंद्र चोल तृतीय के संबंध में विस्तृत अध्ययन के लिए देखें-

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