चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था (Chandragupta Maurya’s Administration)

ऐतिहासिक स्रोत

चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन की जानकारी के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका के अवशिष्ट अंश तथा अशोक के अभिलेख महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं, जो एक दूसरे के पूरक हैं। परंपरागत धारणा के आधार पर अर्थशास्त्र को चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री चाणक्य (कौटिल्य) द्वारा रचित मानकर ई.पू. चौथी शताब्दी का बताया जाता है। मौर्ययुगीन इतिहास-लेखन में अर्थशास्त्र सूचना का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। रुद्रदामन् के जूनागढ़ शिलालेख से भी मौर्यों के प्रांतीय प्रशासन के संबंध में बहुमूल्य सूचनाएँ मिलती हैं। इसके साथ ही सोहगौरा (गोरखपुर) तथा महास्थान (बोगरा, बंगलादेश) के लेखों से भी मौर्यकालीन प्रशासन पर कुछ प्रकाश पड़ता है।

चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में भारत ने पहली बार राजनीतिक एकता का साक्षात्कार किया। मौर्यकाल में राजा की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई। परंपरागत राजशास्त्र सिद्धांत के अनुसार राजा धर्म का रक्षक है, धर्म का प्रतिपादक नहीं। राजशासन की वैधता इस बात पर निर्भर थी कि वह धर्म के अनुकूल हो, किंतु कौटिल्य ने इस दिशा में एक नया प्रतिमान प्रस्तुत किया कि ‘राजशासन धर्म, व्यवहार और चरित्र (लोकाचार) से ऊपर है।’ चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासन का विवरण इस प्रकार है-

शासन-व्यवस्था

चंद्रगुप्त मौर्य महान् विजेता और साम्राज्य-निर्माता ही नहीं, अपितु योग्य प्रशासक भी था। उसने अपने मंत्री कौटिल्य की सहायता से एक ऐसी शासन-व्यवस्था का निर्माण किया, जो उस समय की परिस्थितियों के लिए पूर्णतया अनुकूल थी और कालांतर में भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का आधार बनी। विद्वानों का विचार है कि संभवतः मौर्य शासन व्यवस्था पर तत्कालीन यूनानी तथा हखामनी शासन प्रणाली का भी कुछ प्रभाव पड़ा था। यद्यपि यह शासन-व्यवस्था एक सीमा तक मगध के पूर्वगामी शासकों द्वारा विकसित शासन-तंत्र पर आधारित थी, किंतु इसका अधिक श्रेय चंद्रगुप्त और कौटिल्य की सृजनात्मक क्षमता को ही दिया जाना चाहिए।

केंद्रीय प्रशासन

सम्राट

चंद्रगुप्त की शासन-व्यवस्था का स्वरूप राजतंत्रात्मक था। कौटिल्य के अनुसार राज्य सात प्रकृतियों की समाविष्टि है जिसमें राजा की स्थिति कूटस्थनीय होती थी। राजा शासन के विभिन्न अंगों का प्रधान था। वह सैनिक, न्यायिक, वैधानिक एवं कार्यकारी मामलों का सर्वोच्च पदाधिकारी होता था। वह सेना का सबसे बड़ा अधिकारी, न्याय का प्रधान न्यायाधीश, कानूनों का प्रवर्तक एवं धर्म-प्रवर्तक माना जाता था। साम्राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति वह स्वयं करता था और वही प्रशासन का प्रमुख स्रोत था। शासन के कार्यों में वह सदैव व्यस्त रहता था।

अर्थशास्त्र में राजा की दैनिक-चर्या का आदर्श काल-विभाजन दिया गया है। मेगस्थनीज के अनुसार राजा दिन में नहीं सोता, वरन् दिनभर न्याय और शासन के अन्य कार्यों के लिए दरबार में ही रहता है, मालिश कराते समय भी इन कार्यों में व्यवधान नहीं होता, केश-प्रसाधन के समय वह दूतों से मिलता है।

कौटिल्य का भी स्पष्ट मत है कि राजा को प्रजा की शिकायतों को सुनने के लिए सदैव सुलभ रहना चाहिए तथा प्रजा से अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए। राजा को चेतावनी देते हुए उसने स्पष्ट कहा है कि जिस राजा का दर्शन प्रजा के लिए दुर्लभ है, उसके अधिकारी प्रजा के कामों को अव्यवथित कर देते हैं जिससे राजा या तो प्रजा का कोपभाजन बनता है या शत्रुओं का शिकार होता है- “दुर्दशो हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यते। तेन प्रकृतिकोपमरिवशं वा गच्छेत्।”

स्मृतियों की परंपरा के विरुद्ध अर्थशास्त्र में राजाज्ञा को धर्म, व्यवहार और चरित्र से अधिक महत्त्व दिया गया है।

पाटलिपुत्र चंद्रगुप्त की राजधानी थी, जिसके विषय में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने विस्तृत विवरण दिया है। सम्राट मुख्यतः राजधानी में विशाल राजप्रासाद में निवास करता था। उसकी राज्यसभा ऐश्वर्य और शान-ओ-शौकत से परिपूर्ण होती थी।

मेगस्थनीज और कौटिल्य दोनों से ही ज्ञात होता है कि सम्राट की व्यक्तिगत सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता था। राजा के शरीर की रक्षा अस्त्रधारी स्त्रियाँ करती थीं। मेगस्थनीज का कथन है कि राजा को निरंतर प्राण भय लगा रहता है, जिससे हर रात वह अपना शयनकक्ष बदलता है। राजा केवल युद्धयात्रा, यज्ञानुष्ठान, न्याय और आखेट के लिए ही अपने प्रासाद से बाहर आता था। आखेट के समय राजा का मार्ग रस्सियों से घिरा होता था, जिनको लांघने पर प्राणदंड मिलता था।

इस प्रकार राजनीतिक और सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों पर सम्राट का पूर्ण नियंत्रण रहता था। कौटिल्य ने इसीलिए राज्य के सप्तांगों में सम्राट (स्वामी) को ही प्रथम स्थान दिया है। उसके शेष अंग- अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, बल तथा मित्र सम्राट के द्वारा ही संचालित होते हैं तथा अपने अस्तित्व के लिए सम्राट पर ही निर्भर करते हैं।

अमात्य, मंत्री और मंत्रिपरिषद्

सम्राट अपने शासकीय कार्यों को अमात्यों, मंत्रियों और अधिकारियों की सहायता से करता था। मेगस्थनीज ने दो प्रकार के अधिकारियों का उल्लेख किया है- मंत्री और सचिव। इनकी संख्या अधिक नहीं थी।

अमात्य या सचिव एक सामान्य संज्ञा थी जिससे राज्य के सभी प्रमुख पदाधिकारियों का बोध होता था। यूनानी लेखकों ने इन्हें सभासद या निर्धारक कहा है। यद्यपि इनकी संख्या कम होती थी, किंतु ये बड़े महत्त्वपूर्ण थे और राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त होते थे।

अमात्यों में से, जो सभी प्रकार के आकर्षणों से मुक्त होते थे, मंत्री नियुक्त किये जाते थे। ये मंत्री ‘मंत्रिणः’ नामक छोटी उपसमिति के सदस्य होते थे जिसमें कुल तीन या चार सदस्य होते थे। संभवतः इसमें युवराज, प्रधानमंत्री, सेनापति तथा सन्निधाता सम्म्मिलित होते थे। आत्ययिक विषयों पर मंत्रिणः से परामर्श किया जाता था।

राजा प्रायः मंत्रिणः और मंत्रिपरिषद् के परामर्श से ही कार्य करता था। अर्थशास्त्र के अनुसार राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् भी होती थी जिसके सदस्यों की संख्या निश्चित रूप से बड़ी होती रही होगी। अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद् को वैधानिक आवश्यकता बताते हुए कहा गया है कि ‘राजत्व केवल सबकी सहायता से ही संभव है, मात्र एक पहिया नहीं चल सकता है। इसलिए राजा को सचिवों की नियुक्ति करनी चाहिए और उनसे मंत्रणा लेनी चाहिए’-

सहाय साध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते।

कुर्वीत सचिवान्तमान्तेषां च श्रृणुयान्मतम्।।

कौटिल्य के अनुसार राजा को बहुमत मानना चाहिए और आवश्यक प्रश्नों पर अनुपस्थित मंत्रियों का विचार जानने का उपाय करना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार बड़ी मंत्रिपरिषद् रखना राजा के हित में होता है और इससे उसकी मंत्र-शक्ति बढ़ती है। सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर मंत्रिपरिषद् में विचार-विमर्श किया जाता था और प्रायः बहुमत से निर्णय लिया जाता था, किंतु कभी-कभी राजा राज्यहित में बहुमत की उपेक्षा भी कर सकता था। मंत्रिपरिषद् की मंत्रणा को गुप्त रखने का विशेष ध्यान रखा जाता था। मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को 1200 पण वेतन मिलता था। मंत्रिणः के सदस्यों को 4800 पण वेतन मिलता था, इसलिए लगता है कि मंत्रिणः के सदस्य मंत्रिपरिषद् से श्रेष्ठ होते थे।

अठारह तीर्थ (प्रधान पदाधिकारी)

प्रशासनिक सुविधा के लिए मौर्य केंद्रीय प्रशासन अनेक विभागों में विभक्त था। अर्थशास्त्र में इन विभागों के अधिकारियों को ‘तीर्थ’ कहा गया है। अर्थशास्त्र में अठारह तीर्थों (प्रधान पदाधिकारियों) का उल्लेख मिलता है-

  1. मंत्रि और पुरोहित, 2. समाहर्ता, 3. सन्निधाता, 4. सेनापति, 5. युवराज, 6. प्रदेष्टा, 7. नायक, 8. कर्मांतिक, 9. व्यावहारिक, 10. मंत्रिपरिषदाध्यक्ष, 11. दंडपाल, 12. अंतपाल, 13. दुर्गपाल, 14. नागरक, 15. प्रशास्ता, 16. दौवारिक, 17. आंतर्वैशिक और 18. आटविक।

इनमें मंत्री तथा पुरोहित प्रधानमंत्री तथा प्रमुख धर्माधिकारी होते थे। चंद्रगुप्त के समय में दोनों विभाग चाणक्य के ही पास था।

समाहर्ता, राजस्व विभाग का प्रधान अधिकारी होता था। सन्निधाता, राजकीय कोषाधिकरण का प्रमुख अधिकारी था। सेनापति, युद्ध विभाग का मंत्री होता था, युवराज राजा का उत्तराधिकारी होता था जो अपने पिता के शासनकाल में प्रशासनिक कार्यों में उसकी सहायता करता था। प्रदेष्टा, फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश, नायक सेना का संचालक, कर्मांतिक देश के उद्योग-धंधों का प्रधान निरीक्षक, व्यावहारिक दीवानी न्यायालय का न्यायाधीश, मंत्रि-परिषदाध्यक्ष मंत्रि-परिषद् का अध्यक्ष, दंडपाल सेना की सामग्रियों की व्यवस्था करनेवाला प्रधान अधिकारी, अंतपाल सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक, दुर्गपाल देश के भीतर दुर्गों का प्रबंधक, नागरक नगर का प्रमुख अधिकारी, प्रशास्ता राजकीय कागजातों को सुरक्षित रखनेवाला तथा राजकीय आज्ञाओं को लिपिबद्ध करनेवाला प्रधान अधिकारी, दौवारिक राजमहलों की देखरेख करनेवाला प्रधान अधिकारी, अंतर्वैशिक सम्राट की अंगरक्षक सेना का प्रधान अधिकारी तथा आटविक वन विभाग का प्रधान अधिकारी होता था। ये सभी अधकारी उच्च श्रेणी के प्रधान अधिकारी थे।

मजिस्ट्रेट

मौर्य राज्य ने व्यापार तथा उद्योग को अनेक -अध्यक्षों के माध्यम से नियमित किया था। संभवतः इन्हीं अध्यक्षों को यूनानी ग्रंथों में ‘मजिस्ट्रेट’ कहा गया है। अर्थशास्त्र में विभागीय अध्यक्षों तथा उनके कार्यों की एक लंबी सूची मिलती है। इनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं- सीताध्यक्ष (कृषि-अधीक्षक), पण्याध्यक्ष (वाणिज्य-अध्यक्ष), पौतवाध्यक्ष (माप-तौल का अधीक्षक), सुराध्यक्ष, सूनाध्यक्ष, गणिकाध्यक्ष, आकाराध्यक्ष, कोष्ठागाराध्यक्ष, कुप्याध्यक्ष, आयुधागाराध्यक्ष, शुल्काध्यक्ष (पथकर-अधीक्षक), सूत्राध्यक्ष (बुनाई-अधीक्षक), लोहाध्यक्ष, लक्षणाध्यक्ष, सुवर्णाध्यक्ष, गोअध्यक्ष, वीवीताध्यक्ष, मुद्राध्यक्ष, नवाध्यक्ष, पत्तनाध्यक्ष, संस्थाध्यक्ष, देवताध्यक्ष आदि।

मौर्यों के केंद्रीय प्रशासन में अध्यक्षों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता था तथा उन्हें 1000 पण वार्षिक वेतन मिलता था। मजिस्ट्रेटों के कार्यों के संबंध में मेगस्थनीज ने लिखा है कि इनमें से कुछ बाजार, कुछ नगर, कुछ सेना के अधिकारी थे। कुछ नदियों की देखभाल करते थे तथा जल-संग्रहों का निरीक्षण करते थे ताकि सभी को उचित मात्रा में जल उपलब्ध हो सके। वे आखेटकों के भी अधिकारी थे और आवश्यकतानुसार उन्हें दंडित और पुरस्कृत करते थे। यही मजिस्ट्रेट कर-संगह करते थे और भूमि-संबंधी व्यवसायों का निरीक्षण करते थे। वे सार्वजनिक मार्गों का निरीक्षण कर प्रत्येक दस स्टेडिया पर स्तंभ स्थापित करते थे। जो नगरों के अधिकारी थे, वे पाँच-पाँच सदस्यो की छः परिषदों में विभक्त थे।

प्रांतीय प्रशासन

अनुमान किया जाता है कि चंद्रगुप्त का विशाल साम्राज्य प्रांतों में विभाजित रहा होगा। उसके पौत्र अशोक के अभिलेखों से पाँच प्रांतों के संबंध में सूचनाएँ मिलती हैं-

  1. उदीच्य (उत्तरापथ) : इसमें पश्चिमोत्तर प्रदेश सम्मिलित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी।
  2. अवंतिरट्ठ : इस प्रदेश की राजधानी अवंति थी।
  3. दक्षिणापथ : इसमें दक्षिण भारत के प्रदेश सम्मिलित थे जिसकी राजधानी सुवर्णगिरि थी। के.एस. आयंगर इस स्थान की पहचान रायचूर जिले के ‘कनकगिरि’ से करते हैं।
  4. प्राच्य या प्रासी : इससे तात्पर्य पूर्वी भारत से है। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी।

इन प्रांतों में से उत्तरापथ, अवंतिरट्ठ तथा प्राच्य निश्चित रूप से चंद्रगुप्त के साम्राज्य में विद्यमान थे। दक्षिणापथ भी संभवतः उसके साम्राज्य का ही अंग था।

इन प्रांतों के राज्यपाल प्रायः राजकुल से संबंधित कुमार होते थे, किंतु कभी-कभी अन्य योग्य व्यक्तियों को भी इस पद पर नियुक्त कर दिया जाता था। अर्थशास्त्र के अनुसार राज्यपाल का वेतन 12,000 पण वार्षिक होता था। वे अनेक अमात्यों एवं अध्यक्षों की सहायता से प्रांतों का प्रशासन चलाते थे। उनके पास अपनी मंत्रिपरिषद् भी होती थी।

इतिहासकारों के अनुसार सौराष्ट्र की स्थिति अर्द्ध-स्वतंत्र राज्य की थी और चंद्रगुप्त के समय पुष्यगुप्त तथा अशोक के समय तुषास्प की स्थिति अर्द्ध-स्वशासन प्राप्त सामंत की थी, तथापि उसके कार्य-कलाप सम्राट के ही अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते थे।

प्रदेष्टा और प्रादेशिक

प्रत्येक प्रांत कई मंडलों में विभक्त होता था जो आधुनिक कमिश्नरियों की भाँति थे। अर्थशास्त्र में उल्लिखित ‘प्रदेष्टा’ नामक अधिकारी मंडल का प्रधान होता था जिसे अशोक के लेखों में ‘प्रादेशिक’ कहा गया है। वह अपने मंडल के विभिन्न विभागों के अधिकारियों के कार्यों का निरीक्षण करता था तथा समाहत्र्ता के प्रति उत्तरदायी होता था।

आहार या विषय

मंडल का विभाजन जिलों में किया गया था, जिन्हें ‘आहार’ या ‘विषय’ कहा जाता था और जो संभवतः विषयपति के अधीन होते थे। मेगस्थनीज ने जिले के अधिकारियों को ‘एग्रोनोमाई’ कहा है।

जिले से नीचे ‘स्थानिक’ होता था जिसमें आठ सौ ग्राम होते थे। स्थानिक के अंतर्गत दो ‘द्रोणमुख’ होते थे और प्रत्येक में चार सौ ग्राम (गाँव) होते थे। द्रोणमुख के नीचे ‘खार्वटिक’ होता था जिसके अंतर्गत बीस ‘संग्रहण’ होते थे। प्रत्येक खर्वटिक में दो सौ ग्राम तथा प्रत्येक संग्रहण में दस ग्राम थे। इन संस्थाओं के प्रधान न्यायिक, कार्यकारी तथा राजस्व संबंधी सभी प्रकार के अधिकारों का उपभोग करते थे तथा ‘युक्त’ नामक पदाधिकारियों की सहायता से अपना कार्य करते थे।

संग्रहण का प्रधान अधिकारी ‘गोप’ कहलाता था। भूमि तथा सिंचाई, कृषि, वन, काष्ठ-उद्योग, धातुशालाओं, खानों तथा सड़कों आदि का प्रबंध करने के लिए अलग-अलग पदाधिकारी होते थे।

ग्राम-शासन

शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम (गाँव) थे जिनका शासन ‘ग्रामिक’ (ग्रामणी) ग्राम-वृद्धों की सहायता से करता था। ग्राम-वृद्ध परिषद् में ग्राम के प्रमुख व्यक्ति सम्मिलित होते थे। ग्रामिक ग्रामवासियों द्वारा निर्वाचित होता था। ग्राम की भूमि का प्रबंध और सिंचाई की व्यवस्था करना ग्रामणी का प्रधान कर्तव्य था। ग्राम-वृद्धों की परिषद् न्याय का भी कार्य करती थी। ग्रामणी गाँव से भूमिकर एकत्रित करके राजकीय कोषागार में जमा करता था। ग्रामिक के ऊपर क्रमशः गोप और स्थानिक होते थे।

चंद्रगुप्त मौर्यकालीन ग्राम शासन के संबंध में सौहगौरा (गोरखपुर, उ.प्र.) तथा महास्थान (बोगरा, बंग्लादेश) के लेखों से भी कुछ सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। लेखों से पता चलता है कि जनता की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े कोष्ठागार बनवाये गये थे। अर्थशास्त्र में भी कोष्ठागार-निर्माण की चर्चा है। इससे लगता है कि कर की वसूली अनाज के रूप में की जाती थी और उन्हें कोष्ठागारों में संचित किया जाता था। इस अनाज का उपयोग अकाल या सूखा जैसी प्राकृतिक-आपदा के समय किया जाता था।

नगर प्रशासन

मौर्यकालीन नगरों का प्रशासन नगरपालिकाओं के माध्यम से चलाया जाता था। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का वर्णन किया है जो संभवतः किसी न किसी रूप में अन्य नगरों में भी प्रचलित रही होगी। अर्थशास्त्र के अनुसार नगर का शासक ‘नागरक’ कहलाता था और उसके अधीन ‘स्थानिक’ और ‘गोप’ होते थे। नगर-शासन के लिए एक सभा होती थी और नागरक उसका प्रमुख होता था। मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र नगर के नगर-परिषद् में पाँच-पाँच सदस्यों की छः समितियाँ होती थीं।

  1. पहली समिति विभिन्न प्रकार के औद्योगिक कलाओं का निरीक्षण करती और कारीगरों तथा कलाकारों के हितों की देखभाल करती थी।
  2. दूसरी समिति विदेशी यात्रियों के भोजन, निवास तथा चिकित्सा का प्रबंध करती थी। यदि वे देश से बाहर जाते थे तो उनकी अगुआई करती थी तथा उनकी मृत्यु हो जाने पर अंतयेष्ठि का प्रबंध करती थी। राज्य की सुरक्षा के लिए विदेशियों के आचरण तथा उनकी गतिविधियों के ऊपर दृष्टि रखना भी इस समिति का कार्य था।
  3. तीसरी समिति जनगणना का हिसाब रखती थी।
  4. चौथी समिति का कार्य नगर के व्यापार-वाणिज्य की देखभाल करना था। यह समिति वस्तुओं की बिक्री और उसकी माप-तौल पर नियंत्रण रखती थी। कोई भी व्यक्ति वस्तुओं की बिक्री तब तक नहीं कर सकता था, जब तक कि वह निर्धारित शुल्क न चुका दे।
  5. पाँचवीं उद्योग समिति थी जो बाजारों में बिकनेवाली वस्तुओं में मिलावट की रोकथाम करती थी और मिलावटखोर व्यापारियों को दंड दिलवाती थी। नई तथा पुरानी दोनों प्रकार की वस्तुओं की बिक्री के लिए अलग-अलग प्रबंध था।
  6. छठवीं समिति क्रय-विक्रय की वस्तुओं पर कर वसूल करती थी जो बिक्री के मूल्य का दसवाँ भाग होता था। कर की चोरी करनेवालों को मृत्यदंड दिया जाता था।

एस्टिनोमोई

मेगस्थनीज ने नगर के पदाधिकारियों को ‘एस्टिनोमोई’ कहा है। पाटलिपुत्र के समान दूसरे नगरों में भी नगर-समितियों के माध्यम से शासन होता रहा होगा।

गुप्तचर विभाग और महामात्यापसर्प

चंद्रगुप्त के सुदृढ़ प्रशासनिक तंत्र में गुप्तचरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। गुप्तचर विभाग ‘महामात्यापसर्प’ नामक अमात्य के अधीन होता था। अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को ‘गूढ़ पुरुष’ कहा गया है तथा उनकी नियुक्ति और उनके कार्यों को विशेष महत्त्व दिया गया है।

यूनानी लेखकों ने इन्हें ‘निरीक्षक’ तथा ‘ओवरसियर्स’ कहा है। स्ट्रैबो के अनुसार इन दोनों पदों पर योग्य एवं विश्वसनीय व्यक्तियों की ही नियुक्ति होती थी। इस विभाग में वही व्यक्ति नियुक्त किये जाते थे जिनके चरित्र की शुद्धता और निष्ठा की सभी प्रकार से परीक्षा कर ली जाती थी। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि शत्रु, मित्र, मध्यम् तथा उदासीन सब प्रकार के राजाओं एवं अठारह तीर्थों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए गुप्तचरों की नियुक्ति की जानी चाहिए-

एवं शत्रौ च मित्रो च मध्यमे चावपेच्चरान्।

उदासीने च तेषां च तीर्थेष्वष्टादशस्वपि।।

मेगस्थनीज के अनुसार राजा की सेवा में गुप्तचरों की एक बड़ी सेना होती थी जो सभी पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों पर कड़ी दृष्टि रखती थी और राजा को प्रत्येक बात की सूचना देतीे रहती थी।

संस्था और संचरा

अर्थशास्त्र में दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है- संस्था और संचरा। एक ही स्थान पर रहने वाले गुप्तचर ‘संस्था’ कहलाते थे जो कापटिकक्षात्र, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक ;व्यापारीद्ध, तापस के वेश में कार्य करते थे। संचरा, ऐसे गुप्तचर थे जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते रहते थे और सूचना एकत्रित कर राजा तक पहुँचाते थे। पुरुषों के अलावा चतुर स्त्रियाँ भी गुप्तचर के कार्य में लगाई जाती थीं। अर्थशास्त्र से पता चलता है कि वेश्याएँ भी गुप्तचरों के पदों पर नियुक्त की जाती थीं। गलत सूचना देनेवाले गुप्तचर को दंडित किया जाता था और उसे उसके पद से मुक्त कर दिया जाता था।

रक्षिन

गुप्तचरों के अलावा साम्राज्य में शांति-व्यवस्था बनाये रखने और अपराधों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए पुलिस की भी व्यवस्था थी जिन्हेें अर्थशास्त्र में ‘रक्षिन्’ कहा गया है।

न्याय-व्यवस्था

राजतंत्रात्मक व्यवस्था में सम्राट ही सर्वोच्च न्यायाधीश होता था और उसका न्यायालय अंतिम था। इसके अलावा संपूर्ण साम्राज्य में न्याय के लिए अनेक न्यायालय थे। सबसे नीचे स्तर पर ग्राम-न्यायालय थे, जहाँ ग्रामणी तथा ग्राम-वृद्ध कतिपय मामलों में अपना निर्णय देते थे और अपराधियों से जुर्माना वसूल करते थे। ग्राम-न्यायालय से ऊपर संग्रहण, द्रोणमुख, स्थानीय और जनपद स्तर के न्यायालय होते थे। इन सबसे ऊपर पाटलिपुत्र का केंद्रीय न्यायालय था। यूनानी लेखकों ने ऐसे न्यायाधीशों का भी उल्लेख किया है जो भारत में रहनेवाले विदेशियों के मामलों पर विचार करते थे।

धर्मस्थीय और कंटक-शोधन

अर्थशास्त्र में दो प्रकार की न्यायसभाओं, उनकी कार्यविधि तथा अधिकार-क्षेत्र का विवरण मिलता है- धर्मस्थीय और कंटक-शोधन, किंतु इन न्यायालयों का अंतर बहुत स्पष्ट नहीं है। धर्मस्थीय न्यायालयों का निर्णय धर्मशास्त्र में निपुण तीन धर्मस्थ या व्यावहारिक तथा तीन अमात्य करते थे। इन्हें एक प्रकार से ‘दीवानी अदालत’ कहा जा सकता है। कुछ विद्वानों के अनुसार धर्मस्थ न्यायालय वे न्यायालय थे, जो व्यक्तियों के पारस्परिक-विवाद के संबंध में निर्णय देते थे।

कंटक-शोधन न्यायालय के तीन प्रदेष्ट्रि तथा तीन अमात्य न्यायाधीश होते थे और राज्य तथा व्यक्ति के बीच विवाद इनके न्याय के विषय थे। इन्हें एक तरह से ‘फौजदारी अदालत’ कहा जा सकता है।

संभवतः धर्मस्थीय अदालतों में अधिकांश वाद-विषय विवाह, स्त्राीधन, तलाक, दाय, घर, खेत, सेतु-बंधु, जलाशय-संबंधी, ऋण-संबंधी विवाद, भृत्य, कर्मकर और स्वामी के बीच विवाद, क्रय-विक्रय संबंधी झगड़े से संबंधित होते थे, किंतु चोरी, डाके और लूट के मामले भी धर्मस्थीय अदालत के सामने प्रस्तुत किये जाते थे, जिसे ‘साहस’ कहा गया है।

इसी प्रकार कुवचन बोलना, मान-हानि और मारपीट के मामले भी धर्मस्थीय अदालत में रखे जाते थे। इन्हें ‘वाक्-पारुष्य’ तथा ‘दंड-पारुष्य’ कहा गया है। समाज-विरोधी तत्त्वों को दंड देने का कार्य मुख्यतः कंटक-शोधन न्यायालयों का था।

नीलकंठ शास्त्री के अनुसार कंटक-शोधन न्यायालय संगठित शासन-तंत्र के विविध विषयों से संबद्ध निर्णयों को कार्यान्वित करने के लिए स्थापित किये गये थे। वस्तुतः कंटक-शोधन न्यायालय आधुनिक फास्ट ट्रैक अदालतों की तरह थे, जहाँ अभियोगों पर तुरंत विचार किया जाता था। विदेशियों से संबंधित मामलों के लिए विशेष न्यायालयों का गठन किया जाता था।

अर्थशास्त्र से पता चलता है कि जो अमात्य ‘धर्मोपधाशुद्ध’ अर्थात् धार्मिक प्रलोभनों द्वारा शुद्ध चरित्रवाले सिद्ध होते थे, उन्हें ही न्यायाधीश बनाया जाता था। न्यायाधीशों को धर्म, व्यवहार, चरित्र तथा राजशासन का अध्ययन करके ही दंड का निर्णय करना पड़ता था। इन चारों में राजशासन ;राजाज्ञाद्ध को ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। न्यायालयों के कर्मचारियों के लिए भी दंड की व्यवस्था थी। गलत बयान लिखने, निर्दोष व्यक्ति को कारावास देने, अपराधी को छोड़ देने के अपराध में न्यायाधीशों एवं न्यायालय के कर्मचारियों को दंडित किया जाता था।

दंड-विधान कठोर था। सामान्य अपराधों में अर्थदंड दिया जाता था। अर्थशास्त्र में तीन प्रकार के अर्थदंड का उल्लेख है- पूर्व साहस दंड 48 से 96 पण होता था, मध्यम साहस दंड 200 से 500 पण तक तथा तीसरा उत्तम साहस दंड 500 से 1000 पण तक होता था। इसके अतिरिक्त जानबूझकर शिल्पियों का अंग-भंग करने और बिक्रीकर न देने पर प्राणदंड का विधान था। विश्वासघात और व्यभिचार के लिए अंगच्छेद का दंड दिया जाता था। ब्राह्मण विद्रोहियों को जल में डुबोकर मृत्यु-दंड दिया जाता था। प्रमाण न मिलनेवाले अपराधों में जल, अग्नि तथा विष द्वारा दिव्य-परीक्षा ली जाती थी। मेगस्थनीज के विवरण से पता चलता है कि दंडों की कठोरता के कारण अपराध प्रायः नहीं होते थे।

भूमि एवं राजस्व-व्यवस्था

चंद्रगुप्त की सुदृढ़ राजस्व-व्यवस्था उसके कुशल प्रशासनिक-तंत्र का प्रमुख आधार थी। साम्राज्य की समस्त आर्थिक गतिविधियों पर केंद्रीय सरकार का कठोर नियंत्रण था। इस समय कृषि के विकास पर पर्याप्त जोर दिया गया और अधिकाधिक भूमि को कृषि-योग्य बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। भूमि पर राज्य और कृषक दोनों का अधिकार होता था। मेगस्थनीज ने राजा को भूमि का स्वामी कहा है।

सीताध्यक्ष

राजकीय भूमि की व्यवस्था करनेवाला प्रधान अधिकारी ‘सीताध्यक्ष’ था जो दासों, कर्मकारों और बंदियों की सहायता से कृषि-कार्य करवाता था। परती जमीन को खेती के तहत लाने के लिए किसानों को कर में छूट दी जाती थी और पशु, बीज तथा धन से उनकी सहायता की जाती थी। राज्य को आशा थी कि उसने जो कुछ दिया है, वह उसे वापस मिल जायेगा।

भू-राजस्व

राजकीय आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था। राजकीय भूमि से प्राप्त होनेवाली आय को ‘सीता’ और शेष भूमि से प्राप्त भू-राजस्व को ‘भाग’ कहते थे। अर्थशास्त्र तथा यूनानी प्रमाणों से पता चलता है कि मौर्य शासन में लोगों को कृषि पर एक चौथाई तक कर देना पड़ता था, किंतु अधिकांश संस्कृत ग्रंथों में इसकी दर कुल उत्पादन का 1/6 निर्धारित की गई है। इसलिए राजा को षड्भागी कहा जाता था। ऐसी भूमि संभवतः राजकीय भूमि होती थी। अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि यदि कोई कृषक अपने हल, बैल, उपकरण, बीज आदि लगाकर राजकीय भूमि पर खेती करता था, तो उसे उपज का आधा भाग प्राप्त होता था। अशोक के रुमिन्देई़ शिलालेख से पता चलता है कि कर की राशि कुल उत्पादन का 1/8 कर दी गई थी एवं बलि को माफ कर दिया गया था।

इसके अलावा कृषकों की अपनी भूमि भी होती थी, जो अपनी उपज का एक भाग राजा को कर के रूप में देते थे। यह भूमिकर ‘भाग’ कहा जाता था। नियमित आय के अलावा किसानों को ‘पिंडकर’ देना पड़ता था, जो ग्रामसमूहों पर लगाया जानेवाला एकमुश्त कर था।

अर्थशास्त्र में भाग के साथ-साथ ‘बलि’ तथा ‘कर’ का भी उल्लेख मिलता है। ‘बलि’ संभवतः धार्मिक कर था और ‘कर’ संभवतः फल-फूल के बगीचों की उपज का एक अंश था, जो राज्य को दिया जाता था।

रुमिन्देई अभिलेख में ‘बलि’ का उल्लेख मिलता है। राज्य की सेना जब गाँवों से होकर गुजरती थी, तो ग्रामवासियों को उनकी रसद का प्रबंध करना पड़ता था। संभवतः यही अनिवार्य देयता ‘सेनाभक्त’ कहलाती थी।

हिरण्य’ संभवतः नगद भुगतान को कहते थे। अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि कर की मात्रा सिंचाई की सुविधा पर भी निर्भर करती थी जो उपज के पाँचवें भाग की एक तिहाई होती थी। कहा गया है कि अपने कुएं से सिंचाई करनेवाला किसान फसल का पाँचवाँ हिस्सा, स्वयं कंधे पर रखकर घड़े द्वारा सिंचाई करनेवाला चतुर्थांश और नहर आदि के जल से सिंचाई करनेवाला तृतीयांश दे।

भूमिकर और सिंचाई कर को मिलाकर किसान को उपज का करीब 1/2 भाग देना पड़ता था। नगरों में जल एवं भवनकर लगाये जाते थे।

राजकीय आय के अन्य प्रमुख साधनों में सीमा-शुल्क, चुंगी, तटकर, विक्रयकर, व्यापारिक मार्गों, सड़कों तथा घाटों पर लगनेवाले कर, अनुज्ञा शुल्क आदि थे। दुर्गवाले नगरों में बिक्री की जानेवाली सभी वस्तुओं को (अन्न एवं पशु आदि को छोड़कर) द्वार के पास अवस्थित चुंगीघर में ले जाकर उन पर राजकीय मुद्रा अंकित की जाती थी और विक्रय के बाद मूल्यानुसार उन पर कर लिया जाता था। वस्तुओं के मूल्य के अनुसार कर बदलता रहता था। यह संभवतः 10 से 15 प्रतिशत तक होता था।

शराब पर चुंगी, आय का एक अन्य साधन था। इसके लिए अधिकार-पत्र (लाइसेंस) रखना होता था। विदेशी शराब के विक्रय के लिए विशेष अधिकार-पत्र रखना पड़ता था।

इसके अलावा तौल और माप के साधनों पर कर, द्यूतकर, वेश्याओं, उद्योगों और शिल्पों पर भी कर लगाया जाता था। वन से भी राज्य को पर्याप्त आय होती थी। लक्षणाध्यक्ष सिक्के जारी करता था और जब लोग सिक्के बनवाते थे, तो उन्हें राज्य को धन देना पड़ता था।

इसी प्रकार विविध प्रकार के दंड तथा संपत्ति की जब्ती से भी राज्य को आय होती थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अनेक ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें राज्य संपत्ति जब्त कर लेता था। संकट-काल में राज्य अनेक अनुचित उपायों से भी धन संचय करता था, जैसे- प्रणय कर, अद्भुत-प्रदर्शन और मेलों को संगठित करके। प्रणय का शब्दिक अर्थ है- प्रेमवश दिया जानेवाला उपहार, किंतु इसका अर्थ भ्रामक है। संभवतः प्रणय केवल एक बार वसूल किया जा सकता था और भूमि के स्वरूप के अनुसार यह उपज का एक-तिहाई अथवा एक-चौथाई भाग हो सकता था।

पतंजलि के अनुसार मौर्यकाल में धन के लिए देवताओं की प्रतिमाएँ बनाकर बेची जाती थीं।

समाहर्ता नामक पदाधिकारी करों को एकत्र करने एवं आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने के लिए उत्तरदायी था। प्रांतों में स्थानिक तथा गोप नामक पदाधिकारी करों को एकत्र करते थे। इस प्रकार पहली बार मौर्यकाल में करों की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई और यह प्रयास किया गया कि जनता से जितना अधिक से अधिक अतिरिक्त उत्पाद वसूल किया जा सके, उतना वसूल लिया जाये।

व्यय के मद

राजकीय आय का व्यय विभिन्न मदों पर किया जाता था। उसका एक भाग सम्राट और उसके परिवार के भरण-पोषण में, दूसरा भाग विविध पदाधिकारियों के वेतनादि देने में, तीसरा भाग सैनिक कार्यों में और चैथा भाग कल्याणकारी कार्यों, जैसे- सड़क, नहर, झील, जलाशय एवं अस्पताल के निर्माण में तथा पाँचवाँ भाग धार्मिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं को दान देने में व्यय किया जाता था।

राज्य की आय का एक बड़ा भाग वेतन देने पर खर्च होता था। सबसे अधिक वेतन 48,000 पण मंत्रियों का था और सबसे कम वेतन 60 पण था। आचार्य, पुरोहित और क्षत्रियों को वह देय भूमि दान में दी जाती थी, जो कर-मुक्त होती थी। खान, जंगल, राजकीय भूमि पर कृषि आदि के विकास के लिए राज्य की ओर से धन व्यय किया जाता था। सेना पर काफी धन व्यय किया जाता था।

अर्थशास्त्र के अनुसार प्रशिक्षित पदाति का वेतन 5,00 पण, रथिक का 200 पण और आरोहिक (हाथी और घोड़े पर चढ़कर युद्ध करनेवाले) का वेतन 5,00 से 1,000 पण वार्षिक रखा गया था।

उच्च सेनाधिकारियों का वेतन 58,000 पण से लेकर 12,000 पण वार्षिक तक था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राजकीय आय का बहुत बड़ा भाग सेना पर खर्च किया जाता था।

कर्मचारियों के नगद भुगतान एवं टकसाल-अधीक्षक के कर्तव्यों से लगता है कि मुद्रा-अर्थव्यवस्था की दिशा में काफी प्रगति हो चुकी थी। चाँदी के आहत सिक्कों के मिले अनेक भंडार इसी ओर संकेत करते हैं।

यद्यपि मौर्य साम्राज्य में सैनिकों पर अत्यधिक खर्च किया जाता था, तथापि इस शासन-व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य की कई विशेषताएँ पाई जाती हैं, जैसे- राजमार्गों के निर्माण, सिंचाई का प्रबंध, पेयजल की व्यवस्था, सड़कों के किनारे छायादार वृक्षों का लगाना, मनुष्य और पशुओं के लिए चिकित्सालय, मृत सैनिकों तथा राज-कर्मचारियों के परिवारों के भरण-पोषण, दीनों-अनाथों का भरण-पोषण आदि। इन सब कार्यों पर भी राज्य का व्यय होता था। अशोक के समय इन परोपकारी कार्यों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई।

सैन्य-संगठन

मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त के सैन्य-संगठन का भी वर्णन किया है। चंद्रगुप्त की विशाल सेना में छः लाख पैदल, तीस हजार अश्वारोही, नौ हजार हाथी तथा संभवतः आठ सौ रथ थे। मेगस्थनीज के अनुसार समाज में कृषकों के बाद सबसे अधिक संख्या सैनिकों की ही थी। सेना का प्रबंध युद्ध-परिषद् करती थी, जिसमें पाँच-पाँच सदस्यों की छः समितियाँ थीं। इनमें से पाँच समितियाँ क्रमशः नौ, पदाति, अश्व, रथ, और गज सेना की व्यवस्था करती थीं। छठी समिति सेना के यातायात और आवश्यक युद्ध-सामग्री का प्रबंध करती थी। सैनिकों को वेतन के अतिरिक्त राज्य से अस्त्र-शस्त्र और दूसरी सामग्री मिलती थी। सैनिकों को इतना वेतन मिलता था कि वे अपने परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर सकें।

स्पष्ट है कि चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था लोकोपकारी थी। निरंकुश होते हुए भी सम्राट धर्म, लोकाचार तथा न्याय के अनुसार शासन करता था। चंद्रगुप्त के शासन का आदर्श अर्थशास्त्र के अनुसार ‘प्रजा के सुख और कल्याण में ही राजा का सुख और कल्याण है। अपना प्रिय करने में राजा का हित नहीं होता, अपितु जो प्रजा के लिए हो, उसे करने में राजा का हित होता है’-

प्रजा सुखे सुखम् राज्ञः प्रजानाम् च हित हितम्।

नात्मपियं हितम् राज्ञः प्रजानाम् तु प्रियम् हितम्।।

चंद्रगुप्त मौर्य की शासन-व्यवस्था की प्रमुख विशेषता सुसंगठित नौकरशाही थी जो शासन की सुविधा के लिए राज्य में विभिन्न प्रकार के आँकड़ों को एकत्र करती थी। केंद्र का शासन के विभिन्न विभागों और राज्य के विभिन्न प्रदेशों पर कड़ा नियंत्रण था। आर्थिक और सामाजिक जीवन की विभिन्न दिशाओं में राज्य के इतने गहन और कठोर नियंत्रण प्राचीन भारतीय इतिहास के किसी अन्य काल में नहीं थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार ‘चंद्रगुप्त ने सुरक्षा की वेदी पर नागरिक स्वतंत्रता की बलि चढ़ा दी तथा साम्राज्य को एक पुलिस राज्य में परिवर्तित कर दिया।’ कुछ विद्वान् इस व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में हेलेनिस्टिक राज्यों के माध्यम से हखामनी ईरान का प्रभाव देखते हैं, किंतु इस व्यवस्था के निर्माण में कौटिल्य और चंद्रगुप्त की मौलिकता को भी महत्त्व दिया जाना चाहिए। लगता है कि यह व्यवस्था नितांत नई नहीं थी। संभवतः पूर्ववर्ती मगध के शासकों, विशेषकर, नंदवंशीय शासकों ने ही इस व्यवस्था की नींव डाली थी।