गुप्त काल का मूल्यांकन (Evaluation of Gupta Period)

स्वर्णयुग की अवधारणा (Concept of Golden Age)

गुप्त काल भारतीय इतिहास के ऐसा युग माना जाता है जिसमें सभ्यता और संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई।

कहा जाता है कि गुप्त काल में भारतीय संस्कृति अपने उत्कर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी।

बार्नेट के अनुसार ‘प्राचीन भारत के इतिहास में गुप्तकाल का वही महत्त्व है जो यूनान के इतिहास में पेरीक्लीज युग का है।’

स्मिथ ने गुप्त काल (Gupta Period) की तुलना ब्रिटिश इतिहास के एजिलाबेथन काल एवं स्टुअर्ट काल से की है।

गुप्त काल में राजनीतिक एकता (Political unity in Gupta Period)

अपने उत्कर्ष काल में गुप्त साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तक तथा पूरब में बंगाल से लेकर पश्चिम में सुराष्ट्र तक फैला था।

दक्षिणापथ के अनेक शासक गुप्त शासकों की राजनीतिक अधीनता स्वीकार करते थे।

गुप्त शासकों ने अपने पराक्रम और वीरता के बल पर प्रायः संपूूर्ण भारत को एकता के सूत्र में आबद्ध किया था।

गुप्त काल (Gupta Period) के महान् सम्राटों ने अपनी विजयों द्वारा भारत में एकछत्र शासन की स्थापना की। गुप्त नरेशों ने एक आदर्श शासन-व्यवस्था का निर्माण किया था।

स्कंदगुप्त ने प्रजा हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सुदर्शन झील के बाँध के पुनर्निर्माण करवाया था।

गुप्त काल में भारत आने वाले फाह्यान जैसे चीनी यात्री को कहीं चोरों और डकैतों का समाना नहीं करना पड़ा था।

गुप्त प्रशासन (Gupta Administration)

फाह्यान ने मुक्तकंठ से गुप्त प्रशासन (Gupta Administration) की प्रशंसा की है।

गुप्त दंड व्यवस्था में किसी को मृत्यदंड नहीं दिया जाता था।
गुप्त दंड व्यवस्था में बार-बार राजद्रोह करनेवाले का अंग-भंग किया जाता था।

जूनागढ़ लेख से पता चलता है कि उस समय कोई भी दरिद्र, दुःखी और पीडि़त नहीं था।

शांति और सुशासन का वर्णन करते हुए कालीदास ने लिखा है कि गुप्त काल में उपवनों में मद पीकर सोई हुई पुर-सुंदरियों के वस्त्रा को वायु तक नहीं छू सकता था, तो उनके आभूषणों को चुराने का साहस कौन कर सकता था?

गुप्त काल में कृषि (Agriculture in Gupta Period)

गुप्त काल आर्थिक समृद्धि का भी काल माना जाता है।

कृषि जनता की आजीविका का प्रमुख स्रोत था क्योंकि कई गुप्त सम्राटों ने कृषि के विकास को प्रोत्साहन दिया।

गुप्त काल में राज्य की ओर से सिंचाई के लिए कुंओं, रहट और झीलों का निर्माण करवाया गया था।

कालीदास के विवरण से पता चलता है कि गुप्त काल में धान तथा ईख की खेती प्रचुरता से होती थी।

गुप्त काल में व्यापार-वाणिज्य (Trade and Commerce in Gupta Period)

गुप्त काल कृषि के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधे और व्यापार-वाणिज्य भी उन्नत दशा में थे।

गुप्त काल में श्रेणियों और निगमों के माध्यम से व्यापारिक गतिविधियाँ सुचारुरूप से संचालित होती रहती थीं।

गुप्त काल में पाटलिपुत्र, वैशाली, उज्जयिनी, दशपुर, भड़ौच आदि इस काल के व्यापारिक नगर थे। गुप्त काल में भारत का व्यापार अरब, फारस, मिस्र, रोम, चीन तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीप समूहों से होता था।

गुप्त काल में व्यापार थल और जल दोनों मार्गों से होता था।
गुप्त काल में जलीय व्यापार के लिए बड़े-बड़े जहाजों का निर्माण किया गया था।

जावा के स्मारक बोरोबुदुर स्तूप के ऊपर जहाजों के कई चित्र अंकित हैं।

आनंद कुमारस्वामी के अनुसार ‘गुप्त काल भारतीय पोत निर्माण कला का महानतम् युग था।

गुप्त काल में भारतीयों ने पेगु, कंबोडिया, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो में अपने उपनिवेश स्थापित किये और चीन अरब और फारस के साथ उनका व्यापारिक संबंध था।

गुप्त काल में धर्म (Religions in Gupta Period)

गुप्त काल में वैष्णव धर्म की सर्वाधिक उन्नति हुई क्योंकि गुप्त काल के अधिकांश नरेश ‘परमभागवत’ थे और वैष्णधर्मानुयायी थे।गुप्त काल में बौद्ध, जैन जैसे अन्य धर्मों का भी विकास हुआ।

गुप्त में बिना किसी भेदभाव के उच्च प्रशासनिक पदों पर विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को नियुक्त किया जाता था।

चंद्रगुप्त द्वितीय का सचिव वीरसेन शैव था, जबकि आम्रकार्दव नामक बौद्ध सेना में उच्च पदाधिकारी था।

सांची लेख से पता चलता है कि वीरसेन ने काकनादबाट नामक महाविहार को एक ग्राम और 25 दीनार दान में दिया था।

कुमारगुप्त के समय में बौद्ध बुद्धमित्र ने बुद्ध की मूर्ति की स्थापना करवाई थी।

स्कंदगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने पांच जैन तीर्थंकरों की पाषाण-मूर्तियों का निर्माण करवाया था।
गुप्त काल में जैन धर्म भी उन्नत दशा में था।

मथुरा से गुप्त काल की अनेक जैन मूर्तियाँ प्रकाश में आई हैं।

गुप्त काल में हिंदू मंदिरों के पास बौद्धों के मठ थे और बुद्ध प्रतिमाओं के समीप जैनों की मूर्तियाँ थीं।

गुप्त काल में साहित्य का विकास (Development of literature in Gupta Period)

गुप्त काल में संस्कृत राजभाषा के पद पर आसीन हुई और विशाल संस्कृत साहित्य का सृजन हुआ।

संभवतः महान् कवि और नाटककार कालीदास गुप्त काल की विभूति थे।

गुप्त काल में अमरसिंह ने अमरकोश की रचना की।

भारतीय षड्दर्शनों का विकास भी गुप्त काल में हुआ और प्रसिद्ध दार्शनिक वसुबंधु इसी काल की देन हैं।

गुप्त काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त जैसे गणितज्ञ, ज्योतिषाचार्य और खगोलशास्त्री उत्पन्न हुए।

गुप्त काल में आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर परिक्रमा करती है तथा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।

गुप्त काल में कलात्मक विकास (Artistic development in Gupta Period)

कला के विविध पक्षों, जैसे वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला आदि का विकास गुप्त काल में हुआ।

देवगढ़ का दशावतार मंदिर, भूमरा एवं नचना-कुठारा का शिव-पार्वती मंदिर, सारनाथ, मथुरा की बुद्ध एवं विष्णु की मूर्तियाँ, अजंता की चित्रकारियां भारतीय कला के अद्वितीय प्रतिमान हैं।

अजंता की गुफाओं के चित्र इतने सजीव, करुणोत्पादक एवं हृदय को द्रवीभूत करनेवाले हैं कि देशी, विदेशी सभी कला-मर्मज्ञों ने इनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

गुप्त काल में बृहत्तर भारत का उदय (Rise of Greater India in Gupta Period)

गुप्त काल में मध्य तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के विभिन्न भागों में भारतीय संस्कृति का प्रसार मुख्यतया हुआ।

फूनान, कंबुज, मलाया, चम्पा, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, स्याम, बर्मा आदि गुप्त काल के हिंदू राज्य थे।

गुप्त काल में मध्य एशिया के खोतान और कुचा हिंदू संस्कृति के प्रमुख केंद्र थे।

गुप्त काल में अनेक धर्म-प्रचारक चीन भी गये।

इसके अतिरिक्त गुप्त काल में तिब्बत, कोरिया, जापान तथा पूरब में फिलीपीन द्वीप समूह तक भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ।

इस प्रकार गुप्त काल में सांस्कृतिक विस्तार के कारण ‘बृहत्तर भारत’ का उदय हुआ।

स्वर्णयुग की अवधारणा पर प्रश्नचिन्ह (Question mark on Concept of Golden Age)

अनेक इतिहासकार गुप्तकालीन स्वर्णयुग की संकल्पना (Concept of Golden Age) को निराधार सिद्ध करते हैं क्योंकि यह युग सामंतवाद की उन्नति, नगरों के पतन, व्यापार एवं वाणिज्य के पतन तथा आर्थिक अवनति का युग था।

गुप्त काल को स्वर्णयुग केवल उच्च वर्गों के संदर्भ में माना जा सकता है जिनका जीवन-स्तर पर्याप्त ऊँचाई पर पहुँचा हुआ था और वह भी मुख्यतः उत्तर भारत में।

बीसवीं सदी के आरंभ मे लिखनेवाले इतिहासकारों के लिए ‘स्वर्णयुग’ एक यूटोपिया था जिसका अस्तित्व सुदूर अतीत में ही हो सकता था।

प्रारंभिक भारत के इतिहास पर काम करनेवाले इतिहासकारों ने जिसे ‘स्वर्णयुग’ (Golden Age) कहा है, उसमें हिंदू संस्कृति दृढ़तापूर्वक स्थापित हुई थी।

गुप्तकाल को हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) का काल मानना भी कठिन है।

गुप्त काल की मूर्तिकला के सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ और चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजंता बौद्धकला के उदाहरण बताये जाते हैं।

अजंता की कला के निर्माण में गुप्तों का कोई योगदान दूर-दूर तक नहीं था।

गुप्त काल के आर्यभट्ट तथा वराह मिहिर के ज्योतिष-सिद्धांत आंशिक रुप में ही भारतीय हैं।

वराह मिहिर के पांच सिद्धांतों में से एक रोमन था और दूसरा पोलिश, जो सिकंदरिया के ज्योतिषी पाल द्वारा प्रतिपादित किया गया था।

हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) का एकमात्र साक्ष्य कालीदास की रचनाएँ, कुछ पुराणों की रचना तथा वे सिक्के व शिलालेख हैं जिनसे गुप्त राजाओं द्वारा वैष्णव व शैव धर्म को प्रोत्साहन देने के प्रमाण मिलते हैं।

किंतु कालीदास की रचनाएँ किसी बौद्धिक पुनर्जागरण का प्रतीक न होकर उस साहित्यिक शैली का विकसित रुप हैं जो गुप्त काल के पूर्व उदित हो रही थीं।

पुराण भी गुप्तकाल में पूर्ण रुप से विद्यमान थे, गुप्त काल में केवल उनका संकलन किया गया।

वैष्णव और शैव धर्म के सिद्धांत भी पूर्वकाल से चले आ रहे विकास के परिणाम थे, किसी धार्मिक पुनर्जागरण के नहीं।

गुप्त काल में जिस हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) का प्रचार किया जाता है, वह वस्तुतः कोई पुनर्जागरण नहीं था, बल्कि वह बहुत अंशों में हिंदुत्व का द्योतक था।

प्राचीन भारत के लोग स्वयं को ‘हिंदू’ नहीं कहते थे और इस शब्द का प्रयोग गुप्तों के बहुत बाद अरबों ने भारतीयों के लिए किया था।

गुप्त काल का तथाकथित हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) न तो पुनर्जागरण (Renaissance) ही था और न ही हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) ।
गुप्त शासकों ने राष्ट्रीयता की पुनरुत्पत्ति (Repetition of Nationality) भी नहीं की।

शकों और हूणों से युद्ध करने के कारण, रामगुप्त को छोड़कर अन्य गुप्त सम्राटों को राष्ट्रीयता की पुनर्स्थापना का श्रेय दिया जाता है, किंतु किसी भी दरबारी नाटक या काव्य में किसी गुप्त राजा का प्रत्यक्ष वर्णन नहीं है।

कालिदास का मालकविकाकग्निमित्रम् शुंगों से संबंधित है, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य से।

केवल गुप्त कालीन पुराणों में गुप्त शासकों का उल्लेख है जहाँ उन्हें निम्नकोटि के राजाओं में शामिल किया गया है।

गुप्त राजाओं की अपनी प्रशस्तियों, विशेषकर समुद्रगुप्त की प्रशस्ति और शिलालेखों में गुप्त शासकों की प्रशंसा की गई है।

देवगढ़, भूमरा, नचना कुठारा के जिन बड़े-बड़े मंदिरों को गुप्तकालीन अवशेष माना जाता है, उनका भी गुप्त काल का होना संदिग्ध है।

यदि गुप्त शासकों ने बड़े-बड़े देवालयों का निर्माण करावाया था तो राजपरिवार के रहने के लिए वैभवशाली महल अवश्य रहे होगे, किंतु अभी तक किसी गुप्त कालीन महल के अवशेष नहीं मिले हैं।

जिस अजंता, एलोरा की चित्रकारी के आधार पर गुप्त कालीन चित्रकला के विकास का ढिढ़ोरा पीटा जाता है, वह क्षेत्र तो कभी गुप्त शासकों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में था ही नहीं।

संभवतः 19वीं शताब्दी में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के प्राचीन युग की उज्ज्वलता को सिद्ध करने के लिए गुप्तकाल को महिमामंडित किया था।

इस प्रकार गुप्त शासकों ने राष्ट्रीयता की पुनरुत्पत्ति (Repetition of Nationality) नहीं की, बल्कि राष्ट्रीयता ने गुप्तों की पुनरुत्पत्ति की।

गुप्त काल में सामंतवाद, दास प्रथा, बंधुआ मजदूरी, बेगारी की प्रथा, अस्पृश्यता, बाल-विवाह, सती प्रथा, सामाजिक तनावों आदि का विकास हुआ और कृषक आर्थिक रूप से बंधक बने।

गुप्त काल में स्त्रियाँ संपत्ति का एक हिस्सा बन गईं और पूर्णतः पुरुषों के अधीन हो गईं।

गुप्त काल में जातिभेद और वर्णव्यवस्था में जटिलता आई।
फाह्यान ने लिखा है कि जनता समृद्ध थी, किंतु इसके विपरीत जीवन के संबंध में संभवतः कुछ ऐसा था जो उच्च वर्ग के लोगों को भी रूचिकर नहीं था।

गुप्त काल में ही वृद्ध लोगों द्वारा प्रयाग में गंगा और यमुना के संगम पर तथाकथित पवित्र वटवृक्ष से कूदकर आत्महत्या की प्रथा प्रारंभ हुई।

गुप्त काल के कला और साहित्य इस काल के उच्च वर्गों के सुखी जीवन का परिचय देते हैं, जबकि निम्न वर्गों की दशा दयनीय थी।

फाह्यान ने चांडालों की दुर्दशा के संबंध में लिखा है।

गुप्त काल में अस्पृश्य वर्ग की अवनति हुई, सामाजिक तनाव बने रहे, वर्ग-विभाजित समाज को बनाये रखने के लिए धर्म को शस्त्र बनाया गया।

गुप्त काल आर्थिक समृद्धि का नही, आर्थिक विपन्नता का युग था।

गुप्त काल में नगर उजड़ कर गाँव बन गये, उद्योग-धंधे एवं व्यापार चैपट हो गये।

यद्यपि गुप्त काल की सबसे अधिक स्वर्णमुद्राएं प्राप्त हुई हैं, किंतु उनमें सोने की मात्रा कम हो गई है।

गुप्त काल में मगध का महान् नगर पटना, जो चंद्रगुप्त मौर्य (Chandra Gupta Maurya) की राजधानी था, एक ग्राम बन कर रह गया था।

गुप्त काल की एक और राजधानी उज्जैन कभी विश्व का वैसा महान् नगर नहीं बन सकी जैसी मौर्यकाल में पाटलिपुत्र थी।

इतिहासकार कोसम्बी के अनुसार ‘स्वामिभक्ति ने कृषक-दासों और आश्रितों को सामंतीय प्रमुखों के साथ एक श्रृंखला के रूप में निबद्ध कर दिया।’

अनेक आद्य-प्रथाओं को ब्राह्मणीकरण (Brahmanization) के माध्यम से जिस प्रकार कथाकथित हिंदू धर्म में समाविष्ट करने का प्रयास किया गया, जिससे गुप्तकाल की हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) की परिकल्पना को ठेस पहुँचती है।

कला का संरक्षण अधिकांशतः सामंतों के हाथों में था- जनसाधारण की कलाकृतियों के दृष्टांत, जैसे मृण्डमूर्तियाँ, मिट्टी के बर्तन आदि या तो कम दृष्टिगोचर होते हैं या फिर इस तरह रूपांतरित होकर सामने आते हैं कि वे जनसाधारण के नहीं, अपितु समाज के विशिष्ट वर्ग के लिए बनाये गये लगते हैं।

गुप्त काल में जिस हिंदू पुनर्जागरण (Hindu Renaissance) का बहुत प्रचार किया जाता है, वह वस्तुतः कोई पुनर्जागरण नहीं था, बल्कि वह बहुत अंशों में हिंदुत्व का द्योतक था।

इस प्रकार गुप्त काल में ‘स्वर्णयुग की अवधारणा’ (Concept of Golden Age) यथार्थ पर आधारित प्रतीत नहीं होती है।

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