कुषाण राजवंश और कनिष्क (Kushan and Kanishka)

शकों की तरह कुषाण भी मध्य एशिया से भागकर भारत आये थे। माना जाता है कि यू-ची एक हिंद-यूरोपीय जाति के लोग थे जो तुषारी लोगों से संबंधित थे।

यू-ची मध्य एशिया के अन्य इलाकों- बैक्ट्रिया और भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी क्षेत्रों में फैले।

यू-ची कबीले के लोगों ने ही भारतीय प्रायद्वीप में कुषाण राजवंश की स्थापना की।

कुषाण नामकरण का आधार किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं था, वरन् यह यू-ची नामक जाति की सबसे शक्तिशाली शाखा (कुई-शुआंग) का नाम था।

राजनीतिक शांति, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक समन्वय की दृष्टि से कुषाणकाल को ही भारतीय इतिहास को‘स्वर्णयुग’ माना जाना चाहिए।

चीनी ग्रंथों- पान-कू के सि-एन-हान-शू (प्रथम हान वंश का इतिहास) और फान-ए के हाऊ-हान-शू (परवर्ती हान वंश का इतिहास) से यू-ची जाति का हूण, शक और पार्थियनों से संघर्ष का ज्ञान होता है।

हाऊ-हान-शू से पता चलता है कि यू-ची कबीला कुई-शुआंग सबसे शक्तिशाली था।

कुजुल कैडफिसेस ने अन्य यू-ची कबीलों को विजित कर शक्तिशाली कुषाण राज्य का निर्माण किया था।

गोंडोफर्नीज के तख्त-ए-बाही लेख तथा कुषाण शासकों द्वारा चलवाए गये सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्कों से कुषाणों के बारे में जानकारी मिलती है।

विम कैडफिसस पहला कुषाण शासक था जिसने सोने के सिक्के प्रचलित करवाए।

कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों के संबंध में तिब्बती बौद्ध ग्रंथों, संस्कृत बौद्ध ग्रंथों के चीनी अनुवाद एवं चीनी यात्रियों- ह्वेनसांग और फाह्यान के विवरण उपयोगी हैं।

तिब्बती स्रोतों से पता चलता है कि कनिष्क खोतान नरेश विजयकीर्ति का समकालीन था।

संस्कृत बौद्ध ग्रंथों- श्रीधर्मपिटकनिदानसूत्र, संयुक्तरत्न पिटक तथा कल्पनामंडिटीका के चीनी अनुवाद से कनिष्क की पूर्वी तथा उत्तरी भारत की विजयों की सूचना मिलती है।

कनिष्क और उसके वंशजों के अनेक लेख कोशांबी, सारनाथ, मथुरा, सुई-बिहार, जेदा मनिक्याल, आरा (पेशावर) आदि स्थानों से पाये गये हैं।

अफगानिस्तान के बगलान से 1993 ई. में प्राप्त राबाटक शिलालेख से कनिष्क के पूर्वजों के बारे में ऐतिहासिक जानकारी मिलती है

राबाटक लेख में कनिष्क ने अपने परदादा कोजोला कादफीस, दादा सद्दाशकन, पिता विम कादफीस और स्वयं अपना उल्लेख किया है।

जान मार्शल द्वारा 1915 ई. में तक्षशिला (पाकिस्तान) और हाकिन तथा घिर्शमान द्वारा बेग्राम (अफगानिस्तान) में कराई गई खुदाइयों से कुषाणकालीन सिक्के और अवशेष प्राप्त हुए हैं।

मूल-अभिजन और विस्थापन

कुषाण यू-ची जाति की एक शाखा थे जो आरंभ में तिब्बत के उत्तर-पश्चिम में तकला मकान की मरुभूमि के सीमांत क्षेत्र-कानसू तथा निंग-सिया में निवास करते थे।

हूण नामक बर्बर जाति उत्तरी चीन में निवास करती थी जो प्रायः चीन के सभ्य प्रदेशों में घुसकर लूटमार करती-रहती थी।

चीन के सम्राट शी-हुआंग-टी (246-210 ई.पू.) ने उत्तरी चीन में विशाल दीवार बनवाया तो हूण पश्चिम की ओर बढ़ने पर विवश हो गये।

हूणों ने यू-ची जाति को पराजित कर अपना निवास स्थान को छोड़ने पर बाध्य किया।

यू-ची जाति ने पश्चिम व दक्षिण की ओर बढ़कर इली नदी घाटी में निवास करनेवाली ‘वु-सुन’ जाति को पराजित किया और उनके राजा की हत्या कर दी।

पराजित वु-सुन उत्तर की ओर जाकर हुंग-नु (हूण) राज्य में शरण लिये।

इली नदी घाटी से यू-ची पश्चिम की ओर बढ़े और दो शाखाओं में बंट गये- एक छोटी शाखा, जो दक्षिण की ओर जाकर तिब्बत की सीमा में बस गई; और दूसरी मुख्य शाखा, जो दक्षिण-पश्चिम में बढ़ते हुए सीर नदी की घाटी में पहुँची और शक जाति को पराजितकर सीर नदी की घाटी पर अधिकार कर लिया।

यूचियों द्वारा भगाये जाने पर शकों ने बैक्ट्रिया और पार्थिया पर आक्रमण किये और उनकी एक शाखा भारत में भी प्रविष्ट हुई।

यू-ची लोग सीर नदी की घाटी अधिक समय तक शांति से नहीं रह सके। वु-सुन जाति ने हूणों की सहायता से यू-ची लोगों को सीर नदी की घाटी छोड़नेपर विवश कर दिया।

यूचियों ने सुदूर पश्चिम की ओर बढ़ते हुए बैक्ट्रिया और उसके समीपवर्ती प्रदेशों पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया।

पान-कू के विवरण के अनुसार यू-ची लोग खानाबदोश जीवन छोड़कर अपना साम्राज्य स्थापित किये, जो पांच प्रदेशों में विभाजित थे-

  1. हिऊ-मी संभवतः पामीर के पठार तथा हिंदुकुश के बीच स्थित वाकहान प्रदेश था।
  2. शु-आँग-मी वाकहान तथा हिंदुकुश के दक्षिण में स्थित चितराल प्रदेश था।
  3. कुई-शुआंग चितराल तथा पंजशिर के बीच बसा हुआ था।
  4. ही-तुन (हित-हुन) पंचशिर में स्थित परवान था।
  5. काओ-फू का आशय काबुल प्रदेश से है।

पहली सदी ई.पू. में हिंदुकुश से लेकर काबुल तक के प्रदेशों में यू-ची अपने पांच राज्य स्थापित कर चुके थे।

फान-ए के परवर्ती हानवंश के इतिहास से पता चलता है कि यू-ची लोगों के पांच राज्यों में कुई-शुआंग राज्य में 25 ई.पू. के लगभग क्यू-त्सियु-क्यो नामक वीर सरदार (याबगू) हुआ ।

क्यू-त्सियु-क्यो की कुजुल (कुसलक) से की जाती है जो कैडफिसस प्रथम की उपाधि थी।

कुछ इतिहासकार यूचियों के इस शक्तिशाली नरेश का नाम कुषाण बताते हैं जिसके कारण यह वंश शासक कुषाण कहा गया।

कुषाण यू-ची जाति की उस शाखा का नाम था, जिसने अन्य चारों यू-ची राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था और उस कुषाण शाखा का उन्नायक कुजुल कैडफिसेस था।

यू-ची शासक इस कुषाण शाखा में उत्पन्न होने के कारण ही कुषाण कहलाये।

कुजुल कैडफिसस ने पांच विभिन्न कबायली समुदायों को अपने कुई-शुआंग अथवा कुषाण समुदाय की अध्यक्षता में संगठित किया।

कुजुल कैडफिसस

कुजुल कैडफिसस कुषाण वंश का पहला शासक था।

कुजुल कैडफिसस ने काबुल-कंधार के यवनों (हिंद-यवनों) पर आक्रमणकर काबुल तथा किपिन पर अधिकार किया।

कुजुल कैडफिसस ने भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बसे हुए पह्लवों को भी पराजित किया।

कुजुल कुषाण के सिक्के काबुल व भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग से प्राप्त हुए हैं।

कुजुल कैडफिसस के प्रारंभिक सिक्कों के मुख भाग पर अंतिम यूनानी राजा हर्मियस की आकृति है और पृष्ठ भाग पर उसकी अपनी आकृति प्राप्त होती है।

कुजुल कुषाण प्रारंभ में यूनानी राजा हर्मियस के अधीन था और कालांतर में स्वतंत्र हो गया था।

हेरमय या हरमाओस यवन राजा था, जो काबुल के प्रदेश पर शासन करता था और यू-ची आक्रांता काबुल के प्रदेश से यवन सत्ता का अंत न करके केवल उनसे अपनी अधीनता स्वीकृत कराकर ही संतुष्ट हो गये थे।

काबुल क्षेत्र से ऐसे भी सिक्के मिले हैं, जिन पर केवल कुजुल का नाम है, यवनराज हेरमय का नहीं।

कुजुल कैडफिसस के बाद के सिक्कों पर उसकी उपाधि ‘महाराजस महतस् कुषण-कुयुल कफस’ उत्कीर्ण है।

राजा कुजुल कुषाण बाद के जो सिक्के मिले हैं, उनमें उसका नाम ‘महरजस रजतिरजस खुषणस यवुगस’ और ‘महरयस रयरयस देवपुत्रास कयुल कर कफस’ आदि मिलता है।

कुजुल कैडफिसस के नाम के साथ देवपुत्र विशेषण से स्पष्ट है कि भारत में आकर उसने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया था।

कुजुल कैडफिसस के कुछ सिक्कों पर उसके नाम के साथ ‘ध्रमथिद’ विशेषण भी प्रयुक्त किया गया है।

कुजुल कुषाण ने केवल ताँबे के सिक्के चलवाये।

कुजुल कुषाण की मृत्यु अस्सी साल की आयु में हुई थी।

विम कैडफिसस

कुजुल कैडफिसस के बाद उसका पुत्र विम कैडफिसस उसका उत्तराधिकारी हुआ।

भारत विजय का श्रेय विम कैडफिसस को ही प्राप्त है।

विम ने सिंधु नदी पार करके तक्षशिला और पंजाब पर अधिकार किया और मथुरा की दिशा में और आगे की ओर बढ़ा था।

विम कैडफिसस के विस्तृत राज्य का प्रमुख केंद्र मथुरा था।

विम तक्षम के सिक्कों एवं महाराज राजाधिराज जनाधिप जैसी उपाधियों से लगता है कि उसका अधिकार सिंधु नदी के पूर्व पंजाब एवं संयुक्त प्रांत तक था।

लद्दाख में खलत्से नामक स्थान पर 187 तिथि (32 ई.) के लेख में उविम कवथिस नामक राजा का विवरण है।

मांट (मथुरा) नामक स्थान के इटोकरी टीले से एक सिंहासनासीन विशाल मूर्ति मिली है, जिसके नीचे ‘महाराज राजाधिराज देवपुत्र कुषाणपुत्र षाहि वेम तक्षम’ लेख मिला है।

मथुरा में राजा विम की मूर्ति मिलने से स्पष्ट है कि यह प्रदेश उसके राज्य में सम्मिलित था।

रोमन शासकों का अनुकरण करते हुए कुषाण राजाओं ने मृत शासकों की स्मृति में मंदिर तथा मूर्तियाँ (देवकुल) बनवाने की प्रथा का आरंभ किया था।

मांट (मथुरा) शिलालेख से पता चलता है कि विम तक्षम ने अपने शासन के समय में एक मंदिर (देवकुल अर्थात् राजाओं का प्रतिमा कक्ष), उद्यान, पुष्करिणी तथा कूप का भी निर्माण किया गया था।

कुषाणों में मृत राजा की मूर्ति बनवाकर देवकुल में रखने की प्रथा थी।

मृत राजा का एक देवकुल मांट के टीले में तथा दूसरा मथुरा नगर के उत्तर में गोकर्णेश्वर मंदिर के पास विद्यमान था।

बक्सर (बिहार) से विम की कुछ मुद्राएं मिली है।

कैडफिसस के समय में भारतवर्ष, चीन एवं रोम साम्राज्य के बीच व्यापार आदि में पर्याप्त उन्नति तथा वृद्धि हुई।

सिल्क, मसाले तथा हीरे-जवाहरात के मूल्य के रूप में रोमन साम्राज्य का स्वर्ण भारत वर्ष में प्रचुर मात्रा में आने लगा था।

स्वर्ण की अधिकता से प्रभावित होकर विम कैडफिसस ने सोने के सिक्के प्रचलित करवाये।

विम कैडफिसस के द्वारा जारी सोने के सिक्कों पर भारतीय प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, जबकि उसके पिता द्वारा जारी किये गये सिक्कों पर रोमन दीनार की छाप थी।

विम ने सोने के अलावा ताँबे के सिक्कों का भी प्रचलन करवाया।

विम कैडफिसस के बहुत से सिक्के अफगानिस्तान, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब से उपलब्ध हुए हैं।

विम कैडफिसस के कुछ सिक्के भीटा, कोशांबी, बक्सर तथा बसाढ़ से भी मिले हैं।

विम कैडफिसस के सिक्कों पर यूनानी और खरोष्ठी दोनो लिपियों में लेख मिलते हैं।

विम के कुछ सिक्कों पर शिव, नंदी और त्रिशूल की आकृतियाँ मिलती हैं और खरोष्ठी लिपि में ‘महराजस राजधिराजस सर्वलोगइश्वरस महिश्वरस विम कडफिसेस त्रतरस’ उत्कीर्ण मिलता हैं।

विम कैडफिसस की ‘महिश्वरस’ उपाधि उसके शैव धर्मानुयायी होने का प्रमाण है।

विम कैडफिसस के कुछ सिक्के ऐसे भी हैं जिन पर उसका नाम महराजस राजाधिराज जैसे विशेषणों के साथ केवल ‘वि’ अंकित है। यह ‘वि’ स्पष्टतः विम का ही सूचक है।

विक्रमादित्य द्वितीय के नाम से प्रसिद्ध कुंतल सातकर्णि ने यू-ची आक्रांताओं को पराजितकर ‘शकारि’ की उपाधि धारण की थी।

सोटर मेगास

विम कैडफिसस एवं सोटर मेगास की मुद्राएँ काबुल घाटी से उत्तर प्रदेश तक पाई जाती हैं और दोनों की मुद्राएँ एक-सी प्रतीत होती हैं।

विम कैडफिसस एवं सोटर मेगास एक ही कुषाण नरेश का नाम है।

सोटर मेगास विम की उपाधि बताई गई है, किंतु विम की मुद्राओं पर सोटर मेगास की उपाधि नहीं मिलती है।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सोटर मेगास, विम कैडफिसस का गवर्नर था, क्योंकि हाउ-हान-शू नामक चीनी ग्रंथ में पता चलता है कि विम ने अपने भारतीय प्रदेशों के शासन-संचालन के लिए गवर्नर नियुक्त किया था।

संभवतः वह भारतीय प्रदेशों में विम का अर्ध-स्वतंत्र गवर्नर था जिसका उल्लेख 65 ई. के पतंजर अभिलेख एवं 79 ई. (136 तिथि) तक्षशिला अभिलेख में आया है।

कनिष्क प्रथम

राबाटक लेख में कनिष्क की वंशावली है और लेख में कनिष्क की उपाधि ‘देवपुत्र’ मिलती है तथा उसे विम कैडफिसस का पुत्र बताया गया है।

राज्यारोहण की तिथि

कनिष्क के राज्यारोहण के संबंध में मुख्यतः चार धारणाएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता के अनुसार कनिष्क ने प्रथम शताब्दी ई.पू. के मध्य में राज्य ग्रहण किया था।

दूसरे मत के अनुसार कनिष्क का आर्विभाव द्वितीय शताब्दी ई.पू. में हुआ था।

तीसरी मान्यता कनिष्क को तृतीय शताब्दी ई. में रखती है।

चौथे मत के अनुसार कनिष्क का राज्यारोहण प्रथम शताब्दी ई. में हुआ था।

प्रथम शताब्दी ई.पू. का मत

फ्लीट, कनिंघम, डाउसन, फ्रैंके, केनेडी, लूडर्स, सिलवांलेवी जैसे इतिहासकार कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई.पू. में रखते हैं और उसका राज्यारोहण 58 ई.पू. में स्वीकार करते हैं।

कनिष्क ने कैडफिसस वर्ग के पूर्व शासन किया था और 58 ई.पू. में उसने जिस संवत् की स्थापना की, वह कालांतर में विक्रम संवत् के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने विवरण में लिखा है कि बुद्ध ने अपनी मृत्यु के चार सौ वर्ष बाद एक कनिष्क नामक राजा के आर्विभाव की भविष्यवाणी की थी।

चूंकि बुद्ध का महापरिनिर्वाण 483 ई.पू. में हुआ था, इसलिए कनिष्क का राज्यारोहण 83 ई.पू. माना जा सकता है।

फ्रैंके के अनुसार दूसरी शताब्दी ई.पू. में किसी यू-ची शासक द्वारा एक चीनी अधिकारी से कतिपय बौद्ध ग्रंथों के संबंध में किये गये पत्र-व्यवहार में कनिष्क का संकेत मिलता है।

मार्शल, थामस, स्टेनकेनो, रैप्सन, रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, जे.एस. नेगी, दिनेशचंद्र्र सरकार जैसे इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं।

मार्शल को तक्षशिला उत्खनन के दौरान कैडफिसेस वर्ग की मुद्राएँ कनिष्क परिवार की मुद्राओं से नीचे के स्तर से मिली हैं।

कनिष्क की मुद्राएँ विम कैडफिसस की मुद्राओं के साथ तो मिलती हैं, किंतु कैडफिसस प्रथम के साथ नहीं मिलती हैं।

मुद्राओं, अभिलेखों तथा ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से पता चलता है कि गांधार कनिष्क के अधिकार-क्षेत्र में था।

चीनी स्रोतों में प्रथम शताब्दी ई.पू. के मध्य में गांधार पर यिन-मोफू का अधिकार था।

एलन के अनुसार कनिष्क की स्वर्ण मुद्राओं पर रोमन सम्राट टाइटस (79-81 ई.) तथा ट्रोजन (98-117 ई.) की मुद्राओं का प्रभाव परिलक्षित है।

परवर्ती कुषाण मुद्राओं पर विद्यमान ससैनियन मुद्रा-प्रभाव भी कनिष्क को ई.पू. प्रथम शताब्दी में रखने में बाधक है।

दूसरी शताब्दी ई.पू. में यू-ची शासक बौद्ध धर्म से परिचित था, किंतु यह यू-ची शासक कनिष्क ही था, यह निश्चित नहीं है।

द्वितीय शताब्दी ई. का मत

स्मिथ, मार्शल, थामस, स्टेनकेनो आदि विद्वानों के अनुसार कनिष्क का आर्विभाव द्वितीय शताब्दी ई. में 120-125 ई. में हुआ था।

घिर्शमान, बी.एन. पुरी, के.सी ओझा जैसे पुराविद् कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 144 ई. मानते हैं।

मौद्रिक साक्ष्यों से पता चलता है कि कनिष्क ने कैडफिसस प्रथम तथा द्वितीय के बाद शासन किया था और कनिष्क का कैडफिसस वर्ग के शासकों के साथ निकट का संबंध था।

विम कैडफिसस ने 78 ई. में कुजुल कैडफिसस के बाद शासन किया। इसका शासनान्त द्वितीय शताब्दी ई. के प्रारंभ में हुआ।

कनिष्क ने कैडफिसेस के बाद 120 ई. के आसपास शासन ग्रहण किया था1।

अफगानिस्तान के बेग्राम उत्खनन के आधार पर घिर्शमान का मानना है कि कनिष्क ने 144 ई. में राज्य ग्रहण किया तथा 172 ई. तक शासन किया।

घिर्शमान का अनुमान है कि बेग्राम नगर ईरान के ससैनियन सम्राट शापुर प्रथम के द्वारा 241 से 250 ई. के बीच नष्ट किया गया। उस समय वासुदेव का शासन था।

कनिष्क संवत् के अनुसार वासुदेव ने 74 से 98 वर्ष में शासन किया। कनिष्क संवत् का आरंभ 144 ई. में किया गया और 1यही कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि थी।

कनिष्क ने शक शासक की मृत्यु के बाद उत्तरी सिंधु को विजित किया था।

के.सी. ओझा का अनुमान है कि कनिष्क ने 140 ई. में शासन ग्रहण किया।

अय, खलात्से अभिलेख तथा जिहोणिक की वर्ष 136, 187, तथा 191 की तिथि विक्रम संवत् की हैं क्योंकि इस काल के अन्य लेखों में यही तिथि मिलती है।

ओझा अय को 79 ई. में मानते हुए कनिष्क को 78 ई. में रखने की संभावना को अस्वीकार करते हैं।

अय लेख में उल्लिखित कुषाण शासक कनिष्क नहीं है।

खलात्से लेख तथा जिहोणिक की क्रमशः 130 तथा 134 तिथियों से पता चलता है कि कनिष्क इसके बाद ही हुआ होगा।

प्रयाग-प्रशस्ति के ‘दैवपुत्रषाहि षाहानुषाहि’ के आधार पर ओझा का विचार है कि यह साम्राज्यिक उपाधि थी और समुद्रगुप्त के काल तक कनिष्क की प्रतिष्ठा जीवित थी।

यदि कनिष्क को 78 ई. में मानें तो कुषाण वंश का अंत 250 ई. में मानना होगा जो समुद्रगुप्त के सौ साल पूर्व की घटना होगी।

यदि कुषाणों का अंत 300 ई. में माना जाये, तो कनिष्क का राज्यारोहण 150 ई. में रखा जा सकता है।

चीनी स्रातों से पता चलता है कि तृतीय शताब्दी ई. के मध्य में आक्सस से भारत तक कुषाणों का साम्राज्य था।

वासुदेव इस वंश का अंतिम शासक था।

यदि वासुदेव ने 250 ई. में शासन किया, तो कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. के पहले नहीं रखा जा सकता है।

एच. हमबैक ने दुशाम्बे सम्मेलन में 132 ई. की तिथि स्वीकार की है।

सुई बिहार लेख से पता चलता है कि निचली सिंधुघाटी पर कनिष्क का अधिकार था, जबकि जूनागढ़ लेख से सिंधु-सौवीर पर शक शासक रुद्रदामन् का आधिपत्य प्रमाणित होता है जिसका शासनकाल 130-150 ई. माना जाता है। वह किसी का अधीनस्थ शासक नहीं था।

यदि कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. में रखा जाये तो रुद्रदामन और कनिष्क समकालीन होंगे और सुई बिहार पर कनिष्क का अधिकार स्वीकार करना संभव नहीं होगा।

कनिष्क, वासिष्क, हुविष्क तथा वासुदेव की तिथियां क्रमशः 24, 28, 60, तथा 67, 98 एक ही संवत् की हैं और इस संवत् का संस्थापक कनिष्क था, किंतु दूसरी शताब्दी ई. में प्रवर्तित किसी भी संवत् के संबंध में जानकारी नहीं मिलती है।

बेग्राम के उत्खनन में प्राप्त साक्ष्यों के संबंध में सुधाकर चट्टोपाध्याय का कहना है कि बेग्राम के उत्खनन से प्राप्त वासुदेव नामधारी सिक्के वासुदेव प्रथम के नहीं माने जा सकते हैं क्योंकि अभिलेखों से पता चलता है कि वासुदेव का साम्राज्य उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था और उसकी राजधानी मथुरा थी।

बेग्राम से प्राप्त सिक्कों के वासुदेव की पहचान चीनी स्रोतों में उल्लिखित ता-यू-ची शासक पुर-ड्यू से की जा सकती है जिसने 230 ई. में एक दूतमंडल चीन भेजा था।

इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि शापुर प्रथम ने ही बेग्राम को नष्ट किया था।

चट्टोपाध्याय के अनुसार रुद्रदामन् ने जिस समय उत्तरी भारत की विजय की, वह कुषाणों के अपकर्ष का काल था, इसलिए कनिष्क का राज्यारोहण 120-30 ई. में नहीं माना जा सकता है।

अय, खलात्से लेख एवं जिहोणिक तिथियों के आधार भी कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. में नहीं रखा जा सकता है।

‘अय’ निश्चित रूप से कनिष्क के पूर्व आर्विभूत हुआ था और खलात्से लेख में उल्लिखित ‘महाराज उविमिकस्तु’ का स्टेनकेनो ने जो समीकरण विम कैडफिसेस से किया है, वह भी संदिग्ध है।

प्रयाग-प्रशस्ति में उल्लिखित ‘दैवपुत्रषाहि षाहानुषाहि’ के संबंध में यह कहना कठिन है कि इसमें साम्राज्यवादी कुषाणों का उल्लेख है।

श्रीराम गोयल के अनुसार दैवपुत्रषाहि तथा षाहानुषाहि अलग-अलग पद हैं जिसमें क्रमशः किदार कुषाणों और ससैनियनों का उल्लेख है।

हमबैक का मत मूलतः वासुदेव के समीकरण पर आधारित है। यदि इसे वासुदेव द्वितीय या तृतीय मान लिया जाये तो कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई. में ही मानना पड़ेगा।

तृतीय शताब्दी ई. का मत

रमेशचंद्र्र मजूमदार एवं राधागोविंद भंडारकर जैसे इतिहासकार कनिष्क को तृतीय शताब्दी ई. में रखते हुए उसका राज्यारोहण क्रमशः 248 तथा 278 ई. स्वीकार करते हैं।

मजूमदार के अनुसार कनिष्क ने जिस संवत् स्थापना की थी, वह त्रैकूटक कलचुरि चेदि संवत् था और इसकी स्थापना 248 ई. में की गई थी।

कुषाण लेखों से पता चलता है कि कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव कनिष्क काल के 98वें वर्ष में मथुरा पर शासन कर रहा था। यदि इसे त्रैकूटक कलचुरि चेदि संवत् माना जाए तो पता चलता है कि वासुदेव 346 ई. में मथुरा का शासक था।

चैथी शताब्दी के मध्य इस क्षेत्र पर यौधेयों एवं नागों का अधिकार था।

नागों की राजधानी मथुरा, कांतिपुर तथा पद्मावती थी।

कनिष्क खोतान के शासक विजयकीर्ति का समकालीन था जो द्वितीय शताब्दी ई. के पहले हुआ था।

चीनी त्रिपिटक के सूची-पत्र से पता चलता है कि अनशिह काव (148-170 ई.) ने कनिष्क के पुरोहित संघरक्षक के मार्गभूमि का अनुवाद किया था।

प्रथम शताब्दी ई. का मत

फग्र्यूसन, ओल्डेनबर्ग, थामस, रैप्सन, एन.एन. घोष, हेमचंद्र रायचौधरी, सुधाकर चट्टोपाध्याय, दिनेशचंद्र सरकार, राधाकुमुद मुकर्जी, जे.एस. नेगी आदि कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई. में मानते हुए उसका राज्यारोहण 78 ई. में मानते है।

कनिष्क ने 78 ई. में जिस संवत् की स्थापना की थी, उसका प्रयोग चौथी शताब्दी ई. तक के मध्य तक पश्चिमी भारत के शक क्षत्रप करते रहे, इसलिए इस संवत् को शक संवत् कहा जाने लगा।

मार्शल के तक्षशिला उत्खनन के आधार पर कनिष्क को प्रथम शताब्दी ई. में माना जा सकता है।

यदि यदि कुजुल और हर्मियस का शासनकाल 50 ई. माना जाए और यह स्वीकार किया जाए कि कनिष्क ने ही 78 ई. में शक संवत् की स्थापना की थी, तो कैडफिसेस प्रथम और द्वितीय के लिए मात्र 28 वर्ष बचता है।

तक्षशिला के चिरस्तूप से एक ऐसा दस्तावेज मिला था जिस पर विक्रम संवत् में 136 वर्ष अर्थात् 78 ई. की तिथि अंकित है। इसमें जिस शासक का उल्लेख है वह कैडफिसेस द्वितीय तो हो सकता है, किंतु उसे कनिष्क नहीं माना जा सकता है।

कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में नहीं माना जा सकता है।

महाराज कनिष्क द्वितीय शताब्दी ई. में शासन कर रहा था।

प्रथम शताब्दी ई. के समर्थक इतिहासकारों का मानना है कि कैडफिसेस ने 50 ई. तक शासन किया, यह अनिश्चित है।

यदि इसे सत्य भी मान लिया जाए तो कैडफिसेस द्वितीय के लिए 28 वर्ष का समय कम नहीं है क्योंकि कैडफिसेस प्रथम की मृत्यु अस्सी वर्ष की आयु में हुई थी।

तक्षशिला चिरस्तूप के दस्तावेज में उल्लिखित तिथि के संबंध में माना जाता है कि इसमें उल्लिखित ‘देवपुत्र’ उपाधि कैडफिसेस वर्ग के राजाओं के लिए नहीं, कनिष्क वर्ग के राजाओं के लिए प्रयुक्त है।

स्टेनकेनो चीनी एवं तिब्बती स्रोतों के आधार पर जिस कनिष्क को द्वितीय शताब्दी ई. में रखते हैं, वह कनिष्क प्रथम न होकर आरा लेख का कनिष्क है।

कनिष्क को 78 ई. से 127 ई. तक कहीं पर भी रखा जा सकता है।

तथाकथित शक संवत्, जो 78 ई. में आरंभ हुआ माना जाता है, कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि हो सकती है।

अहमदहसन दानी ने पेशावर के शैखान ढ़ेरी की खुदाई में प्राप्त कुषाणकालीन अवशेषों की रेडियो कार्बन तिथियों से भी कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि द्वितीय शताब्दी ई. की अपेक्षा प्रथम शताब्दी ई. में निर्धारित की है।

कनिष्क की विजयें

तिब्बत और चीन के कुछ लेखकों के अनुसार कनिष्क का साकेत और पाटलिपुत्र के राजाओं से युद्ध हुआ था।

कश्मीर को अपने राज्य में मिलाकर उसने वहाँ कनिष्कपुर नामक एक नगर बसाय

कनिष्क ने उज्जैन के क्षत्रप को भी हराया था और मालवा का प्रांत प्राप्त किया था।

कनिष्क का सबसे प्रसिद्ध युद्ध चीन के शासक के साथ हुआ था, जहाँ पहली बार पराजित होकर वह दूसरी बार विजयी हुआ और मध्य एशिया में काशगर, यारकंद, खोतान आदि प्रदेशों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

पार्थिया से युद्ध

मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए पार्थिया एवं कनिष्क के बीच युद्ध हुआ।

चीनी साहित्य से पता चलता है कि नान-सी के राजा ने देवपुत्र कनिष्क पर आक्रमण कर दिया, किंतु उसे इस युद्ध में सफलता नहीं मिली। कनिष्क ने उसे पराजित कर दिया।

नान-सी का समीकरण पार्थिया से किया जाता है।

पंजाब और मगध की विजय

कुमारलात की कल्पनामंडिटीका में कनिष्क द्वारा की गई पूर्वी भारत की विजय का उल्लेख मिलता है।

बौद्ध ग्रंथ श्रीधर्मपिटकनिदान सूत्र के चीनी अनुवाद से पता चलता है कि कनिष्क ने पाटलिपुत्र को जीतकर उसे अपने अधीन किया और वहाँ से प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् अश्वघोष और भगवान् बुद्ध के कमंडल को प्राप्त किया था।

तिब्बत की बौद्ध अनुश्रुति भी कनिष्क को साकेत (अयोध्या) विजय का श्रेय देती है।

कनिष्क के सिक्के पूर्व में बंगाल के तामलुक, ताम्रलिप्ति तथा महास्थान तक से मिले हैं।

दक्षिण-पूर्व में उड़ीसा के मयूरभंज, शिशुपालगढ़, पुरी, गंजाम आदि स्थानों से कनिष्क के सिक्के पाये गये हैं।

कोशांबी से भी कनिष्क की एक मुहर मिली है।

कनिष्क के लेख पश्चिम में पेशावर से लेकर पूर्व में मथुरा और सारनाथ तक प्राप्त हुए हैं।

कोशांबी तथा श्रावस्ती से प्राप्त बुद्ध प्रतिमाओं की चरण-चोटियों पर उत्कीर्ण लेखों में कनिष्क के शासन का उल्लेख है।

तिब्बती अनुश्रुति के अनुसार खोतन के राजा विजयसिंह के पुत्र विजयकीर्ति ने कुषाण राजा कनिष्क के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया था और सोकेत (साकेत) नगर जीत लिया था।

सातवाहन वंश की शक्ति को नष्ट करने के लिए कनिष्क को सुदूरवर्ती खोतन राज्य के राजा से भी सहायता लेनी पड़ी थी।

चीन से संघर्ष

साम्राज्यवादी चीनी सम्राट के प्रसिद्ध सेनापति पान-चाऊ द्वारा 73-78 ई. के आसपास मध्य एशिया पर अधिकार कर लेने के कारण चीनी साम्राज्य की पश्चिमी सीमा कैस्पियन सागर तक पहुँच गई और कुषाण राज्य की सीमा भी चीन के स्वर्गिक साम्राज्य को स्पर्श करने लगी।

कनिष्क ने सेनापति पान-चाऊ के पास मैत्री-संबंध स्थापित करने के लिए अपना राजदूत भेजा और चीनी सम्राट की कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। कुषाण राजा की इस माँग को सेनापति पान-चाऊ ने अपमानजनक माना, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों में संघर्ष प्रारंभ हो गया।

कनिष्क ने एक बड़ी सेना पान-चाऊ के विरुद्ध भेजी, किंतु इस युद्ध में यू-ची (कुषाण) सेना की पराजय हुई।

कनिष्क की इस पराजय का उल्लेख एक भारतीय अनुश्रुति में भी मिलता है, जिसके अनुसार उसने यह घोषित किया था कि ‘मैंने उत्तर को छोड़कर अन्य तीन क्षेत्रों को जीत लिया है।’

कनिष्क ने सेनापति पान-चाऊ की मृत्यु के बाद अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने के लिए चीन पर दूसरी बार आक्रमण किया और चीनी सेना को पराजित कर मध्य एशिया के प्रदेशों (यारकंद, खोतान और काशगर) पर अधिकार कर कुषाण-साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया।

ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि कनिष्क का साम्राज्य सुंग-लिंग पर्वत के पूर्व में भी विस्तृत था और पीली नदी के पश्चिम में रहनेवाली जातियाँ उससे भयभीत हो गई थीं और उन्होंने अपने राजकुमारों को कनिष्क के दरबार में बंधक के रूप में भेज दिया था।

संगु-लिंग प्रदेश का अभिप्राय चीनी तुर्किस्तान से ही है जिसमें यारकंद, खोतान और काशगर हैं। एक खोतानी पांडुलिपि में भी बहलक (बैक्टिया) के शासक चंद्र कनिष्क का उल्लेख मिलता है।

साम्राज्य-विस्तार

कनिष्क के विस्तृत साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिंधु का भाग, बैक्ट्रिया एवं पार्थिया के प्रदेशों के साथ-साथ मध्य एशिया (चीनी तुर्किस्तान) तथा बंगाल तक के क्षेत्र शामिल थे।

कनिष्क के लेख पेशावर, माणिक्याल (रावलपिंडी), सुईविहार (बहावलपुर), जेदा (रावलपिंडी), मथुरा, कोशांबी, सारनाथ तथा सांँची में मिले हैं, जो उसके आधिपत्य के सूचक हैं।

कनिष्क के सिक्के सिंधु से लेकर बंगाल तक से पाये गये हैं।

कुजुल कैडफिसस के समय से ही बैक्ट्रिया कुषाण साम्राज्य के अंतर्गत था। बैक्ट्रिया पर कनिष्क के आधिपत्य के कुछ प्रमाण मिले हैं।

खोतान में एक पाण्डुलिपि उपलब्ध हुई है जिसमें चंद्र कनिष्क को बहुलक का राजा कहा है।

चंद्र कनिष्क का समीकरण कनिष्क एवं बहुलक का तादात्म्य बैक्ट्रिया से किया जाता है।

काबुल अभिलेख से ज्ञात होता है कि अफगानिस्तान के कुछ भाग पर हुविष्क का अधिकार था। संभवतः अफगानिस्तान की विजय स्वयं हुविष्क ने नहीं की होगी। यह प्रदेश कनिष्क के समय से ही कुषाण साम्राज्य में सम्मिलित था।

ह्वेनसांग के विवरण और अन्य चीनी ग्रंथों से पता चलता है कि गंधार कनिष्क के अधिकार में था जो तत्कालीन कला का प्रख्यात केंद्र था।

कनिष्क के काल में एक विशिष्ट कला शैली का विकास हुआ जिसे गांधार कला के नाम से अभिहित किया जाता है।

रावलपिण्डी के पास स्थित माणिक्याल से कनिष्क के 18वें वर्ष का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है।

सुई विहार (बहावलपुर) अभिलेख से स्पष्ट है कि सिंधु क्षेत्र कनिष्क के अधीन था, जेदा अभिलेख पंजाब पर उसके अधिकार का सूचक है।

टाल्मी का कहना है कि पूर्वी पंजाब पर कुषाणों का शासन था, उसने पंजाब पर कनिष्क के अधिकार का भी उल्लेख किया है।

कश्मीर कनिष्क के साम्राज्य का एक अंग था।

कल्हण ने राजतरंगिणी में कनिष्क, झुष्क और हुष्क द्वारा कश्मीर पर राज्य करने तथा वहाँ अपने नाम पर एक नगर (कनिष्कपुर) बसाने का उल्लेख किया है।

उत्तरी भारत में मथुरा, श्रावस्ती, कोशांबी एवं सारनाथ से कनिष्क के अभिलेख प्राप्त हुए हैं।

कनिष्क कालीन मूर्तियाँ भी मथुरा, कोशांबी, सारनाथ, श्रावस्ती आदि स्थानों से पाई गई हैं।

कनिष्क की मुद्राएँ आजमगढ़, गोरखपुर से मिली हैं। सारनाथ लेख में उसके शासनकाल के तीसरे वर्ष का उल्लेख हुआ है जिसमें महाक्षत्रप खरपल्लान और क्षत्रप वनस्पर के नाम अंकित हैं।

पुराणों में सातवाहन या आंध्र वंश के बाद मगध का शासक वनस्पर को ही बताया गया है।

महाक्षत्रप खरपल्लान की नियुक्ति मथुरा के प्रदेश पर शासन करने के लिए की गई थी।

हाल ही में मुंगरा बादशाहपुर (जौनपुर, उ.प्र.) और खैराडीह (बलिया) से भी कुषाणकालीन बस्तियों के अवशेष प्रकाश में आये हैं।

मध्य भारत में विलासपुर तथा अन्य स्थानों से कनिष्क और उसके उत्तराधिकारियों की मुद्राएँ मिली हैं।

सांची से ऐसी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जो मथुरा शैली की हैं तथा उन पर कुषाण राजाओं के नाम उत्कीर्ण हैं।

दक्षिण में विंध्य क्षेत्र तक कुषाण साम्राज्य विस्तृत था।

कनिष्क के साम्राज्य में अफगानिस्तान, बैक्ट्रिया, काशगर, खोतान (खुतन) एवं यारकंद सम्मिलित थे। भारतीय प्रदेशों में पंजाब, कश्मीर, सिंधु, आधुनिक उत्तर प्रदेश उसके साम्राज्य के अंग थे।

कनिष्क ने उत्तर-दक्षिण पूर्व-पश्चिम चारों दिशाओं में अपने साम्राज्य का विस्तार किया और मौर्य साम्राज्य के बाद पहली बार भारत में ऐसे विशाल साम्राज्य की स्थापना की, जिसमें गंगा, सिंधु और आक्सस की घाटियाँ सम्मिलित थीं।

कनिष्क ने अपने साम्राज्य की विशालता, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और उत्तरी सीमा पर चीन के स्वर्गिक साम्राज्य से समीपता होने के कारण अफगानिस्तान से सिंधु घाटी की जानेवाले प्रमुख राजपथ पर नई राजधानी के रूप में एक नये नगर कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) की स्थापना की और उसे पुष्पपुर (पेशावर) नाम दिया।

पुष्पपुर में कनिष्क ने अनेक भव्य भवनों, सार्वजनिक शालाओं, बौद्ध विहारों और स्तूपों का निर्माण करवाया जिनमें सबसे प्रमुख तेरह मंजिलोंवाला चार सौ फीट ऊँचा एक स्तूप था।

कनिष्क के लेखों से जो कुछ सूचना मिलती है उससे स्पष्ट है कि उसकी शासन-व्यवस्था सुव्यवस्थित थी।

कनिष्क के लेखों में उसे ‘महाराजराजाधिराज देवपुत्र’ कहा गया है।

‘देवपुत्र’ उपाधि से लगता है कि वह चीनी सम्राटों के ‘स्वर्गपुत्र’ उपाधि का अनुकरण करते हुए राजा की दैवी उत्पत्ति में विश्वास करता था।

कनिष्क ने कुशल प्रशासन के लिए अपने विस्तृत साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित कर क्षत्रपों तथा महाक्षत्रपों की नियुक्ति की थी।

कनिष्क के लेखों में क्षत्रपों के नामोल्लेख से स्पष्ट है कि वह क्षत्रपों की सहायता से शासन का कार्य संचालित करता था।

बड़ी क्षत्रपी के शासक को महाक्षत्रप और छोटी क्षत्रपी के शासक को क्षत्रप कहा जाता था। साम्राज्य के अन्य दूरवर्ती प्रांत भी क्षत्रप प्रणाली द्वारा शासित थे।

सारनाथ लेख में महाक्षत्रप खरपल्लान तथा क्षत्रप वनस्पर का उल्लेख मिलता है।

खरपल्लान मथुरा में महाक्षत्रप था, जबकि वनस्पर मगध का क्षत्रप था।

उत्तर-पश्चिम में लल्ल तथा लाइक (लिआक) उसके राज्यपाल थे।

‘राजाधिराज’ की उपाधि से लगता है कि कुषाण सम्राट के अधीन कई छोटे-छोटे राजा भी शासन करते थे और कुषाण काल में सामंतीकरण की प्रक्रिया का आरंभ हुआ।

कनिष्क के लेखों में मंत्रिपरिषद् जैसी किसी संस्था का उल्लेख नहीं है।

कुषाण लेखों में पहली बार ‘दंडनायक’ तथा ‘महादंडनायक’ जैसे सैनिक अधिकारियों का नाम मिलता है।

ग्रामों का स्थानीय शासन ‘ग्रामिक’ तथा ‘ग्राम कूट्टक’ द्वारा चलाया जाता था जिनका उल्लेख मथुरा लेख में मिलता है।

कनिष्क व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्मानुयायी था।

कनिष्क पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर अश्वघोष नामक कवि तथा बौद्ध दार्शनिक को अपने साथ ले गया था और उन्हीं के प्रभाव में आकर वह बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्त हुआ था।

कनिष्क के संरक्षण में उसके आदेशानुसार काश्मीर के कुंडलवन विहार में बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) का आयोजन किया गया।

अश्वघोष के गुरु आचार्य वसुमित्र और पार्श्व चौथी संगीति के प्रधान थे।

वसुमित्र को चौथी संगीति का अध्यक्ष नियत किया गया था।

ह्वेनसांग के अनुसार महासभा में एकत्र 500 प्रसिद्ध बौद्ध विद्वानों द्वारा संस्कृत भाषा में ‘महाविभाषा’ नामक एक विशाल ग्रंथ तैयार किया गया।

महाविभाषा को ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण करवाकर एक विशाल स्तूप में सुरक्षित रख दिया गया था।

महाविभाषा ग्रंथ बौद्ध त्रिपिटक के भाष्य के रूप में था, किंतु संप्रति इसका चीनी संस्करण ही उपलब्ध है।

कनिष्क के सिक्कों पर यवन (ग्रीक), जरथुस्त्री (ईरानी) और भारतीय सभी प्रकार के देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं ।

ईरान के अग्नि (आतश), चंद्र (माह) और सूर्य (मिहिर), ग्रीक देवता हेलिय, प्राचीन एलम की देवी नाना, भारत के शिव, स्कंद, वायु और बुद्ध आदि देवी-देवता नाम या चित्र के रूप में कनिष्क के सिक्कों पर अंकित हैं।

कनिष्क के ताँबे के सिक्कों में उसे एक वेदी पर बलिदान करते प्रदर्शित किया गया

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

वसुमित्र ने चौथी बौद्ध संगीति में ‘महाविभाषा सूत्र’ की रचना की, जिसे ‘बौद्ध धर्म का विश्वकोष’ कहा जाता है।

अश्वघोष ने ‘बुद्धचरित’, ‘सौंदरनंद’, ‘शारिपुत्र प्रकरण’ एवं ‘सूत्रलंकार’ जैसे ग्रंथों की रचना की।

बुद्धचरित तथा सौंदरनंद को महाकाव्य की संज्ञा प्राप्त है।

शारिपुत्र प्रकरण एक नाटक ग्रंथ है।

अश्वघोष की तुलना मिल्टन, गेटे, काउंट तथा वाल्तेयर से की जाती है।

नागार्जुन जैसे प्रकांड पंडित और चरक जैसे चिकित्सक कनिष्क के दरबार के रत्न थे।

नागार्जुन ने अपनी पुस्तक ‘माध्यमिक सूत्र’ (प्रज्ञापारमिता सूत्र) में सापेक्षता के सिद्धांत को प्रस्तुत किया।

नागार्जुन की तुलना मार्टिन लूथर से की जाती है और इन्हें ‘भारत का आइंसटाइन’ कहा जाता है।

‘माध्यमिका कारिका’, ‘विग्रहविवर्तनी’, ‘युक्तिषष्टिका’, ‘शून्यतासप्तति’, ‘रत्नावली’ और ‘वैदल्यसूत्र’ नागार्जुन की अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ बताई जाती हैं।

कनिष्क के राजवैद्य चरक ने औषधि पर ‘चरकसंहिता’ की रचना की, जो औषधिशास्त्र की प्राचीनतम् रचना है।

कनिष्क के समय में ही वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’, भारवि के ‘स्वप्नवासवदत्ता’ जैसे ग्रंथों की भी रचना हुई।

स्वप्नवासवदत्ता को भारत का पहला संपूर्ण नाटक माना जा सकता है।

कनिष्क ने पेशावर के निकट एक बड़ा स्तूप बनवाया जिसमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष रखे गये थे।

एक अभिलेख से पता चलता है कि इस स्तूप का निर्माण एक यूनानी इंजीनियर अगेसिलोस की देखरेख में हुआ था।

कश्मीर में कनिष्क ने कनिष्कपुर नामक एक नगर बसाया।

कनिष्क ने रोम के सम्राटों के सिक्कों का अनुकरण कर सोने के सिक्के चलवाए।

कनिष्क के संरक्षण में गांधार कला शैली का विकास हुआ, जिसे ‘यूनानी-बौद्ध कला’ कहा जाता है।

कनिष्क के काल में बुद्ध और बोधिसत्त्वों की मूर्तियाँ बनने लगीं।

कनिष्क के कुछ सिक्कों पर यूनानी ढंग से खड़े और कुछ पर भारतीय ढंग से बैठे बुद्ध की आकृतियाँ प्राप्त होती हैं।

पेशावर गांधार शैली की कला का मुख्य केंद्र था।

कनिष्क का काल गंधार कला के विकास का स्वर्णयुग था।

गांधार कला शैली के अतिरिक्त मथुरा कला शैली का भी विकास हुआ। मथुरा कला शैली में लाल पत्थरों का प्रयेाग हुआ।

मथुरा में एक मूर्ति मिली है जिसमें कनिष्क को सैनिक पोशाक पहने खड़ा दिखाया गया है।

परवर्ती कुषाण शासक

कनिष्क के बाद विशाल कुषाण साम्राज्य का स्वामी वासिष्क बना, जिसने 24 से 28 तिथि तक शासन किया।

वासिष्क के राजकाल के दो अभिलेख मिलते हैं- एक 24 तिथि का मथुरा से और दूसरा 28 तिथि का सांची से।

वासिष्क का समीकरण 41 तिथि के आरा-पेशावर लेख के वाझेष्क से किया जाता हैं।

हुविष्क कुषाण राजा कनिष्क द्वितीय का पुत्र और उत्तराधिकारी था जिसने लगभग 162 ई. से 180 ई. तक राज्य किय

हुविष्क के सोने व चाँदी के सिक्के उत्तर में कपिशा से पूरब में बिहार तक से मिले हैं।

हुविष्क के सिक्कों पर उसकी अपनी सुंदर प्रतिमा के साथ-साथ भारतीय (स्कंद, विशाख), ईरानी और यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं।

हुविष्क के समय का एक लेख काबुल के ‘खवत’ नामक स्थान पर एक स्तूप की खुदाई में मिला है, जिसे कमगुल्मपुत्र वमग्ररेग नामक व्यक्ति ने भगवान् शाक्य मुनि के शरीर की प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में लिखवाया था।

खवत’ लेख काबुल के पश्चिम में बौद्ध धर्म की सत्ता और प्राकृत भाषा के प्रचलन का ज्वलंत प्रमाण है।

कल्हण की राजतरंगिणी से पता चलता है कि कश्मीर में अपने नाम से एक नगर सम्राट कनिष्क के उत्तराधिकारी जुष्क या हुविष्क ने बसाया था जिसकी पहचान श्रीनगर (कश्मीर) के उत्तर जुकुर (हुविष्कपुर?) नामक ग्राम से की जा सकती है।

हुविष्क ने मथुरा में भी एक सुंदर विहार बनवाया था।

हुविष्क का झुकाव संभवतः ब्राह्मण धर्म की ओर था।

मथुरा में गोकर्णेश्वर के नाम से पूजी जानेवाली मूर्ति संभवतः कुषाण सम्राट हुविष्क की ही मूर्ति है।

पेशावर जिले में सिंधु के तट पर आरा नामक स्थान से प्राप्त एक लेख में महाराज राजाधिराज देवपुत्र कइसर वाझेष्कपुत्र के शासनकाल में दशव्हर नामक व्यक्ति द्वारा एक कुंआ खुदवाने का उल्लेख है।

आरा लेख में कनिष्क को वाझेष्कपुत्र लिखा गया है।

आरा लेख में कनिष्क द्वितीय के नाम के साथ महाराज, राजाधिराज, देवपुत्र आदि विशेषणों के अतिरिक्त कइसर (कैसर या सीजर) का भी प्रयोग किया गया है जो प्राचीन रोमन सम्राटों की उपाधि थी।

हुविष्क के बाद वासुदेव कुषाण साम्राज्य का स्वामी हुआ।

वासुदेव शैव धर्मानुयायी था क्योंकि इसके सिक्कों पर शिव तथा नंदी की आकृतियाँ अंकित हैं।

राजा वासुदेव के शासनकाल में कुषाण साम्राज्य की शक्ति क्षीण होनी शुरू हो गई थी।

वासुदेव के समय उत्तरापथ में अनेक ऐसी राजशक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने कुषाणों के गौरव का अंतकर अपनी शक्ति का विकास किया।

ईरान में ससैनियन वंश के तथा पूर्व में भारशिव नागवंश के उदय ने कुषाणों के पतन में बहुत योग दिया।

कुषाणों की प्रशासनिक व्यवस्था

कुषाणों ने मौर्ययुगीन केंद्रीकरण की प्रवृत्ति के स्थान पर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया।

कुषाण राजतंत्रीय प्रशासन में सत्ता का प्रधान राजा होता था।

कुषाण शासकों ने महाराज, राजाधिराज, शाओनानोशाओ (षाहानुषाहि), महीश्वर, सर्वलोकेश्वर आदि अनेक गौरवपूर्ण उपाधियां धारण की।

कुषाण शासकों ने अपने-आपको ‘देवपुत्र’ के रूप में प्रतिष्ठितकर मृत राजाओं के लिए ‘देवकुल’ स्थापना की प्रथा

कुषाण साम्राज्य पांच या सात प्रांतों में विभक्त था।

प्रांतों के प्रशासन के लिए महाक्षत्रपों या क्षत्रपों की नियुक्ति की जाती थी।

कुषाणों ने एक ही क्षेत्र में दो शासक नियुक्त करने की विचित्र प्रथा भी चलाई।

सारनाथ अभिलेख से ज्ञात होता है कि वहाँ वनस्पर और खरपल्लन दो क्षत्रप एक ही साथ शासन करते थे।

दंडनायक और महादंडनायक नामक अधिकारियों का भी उल्लेख अभिलेखों में मिलता है जो प्रशासन के साथ-साथ सैनिक व्यवस्था से भी संबद्ध रहे होंगे।

नगर प्रशासन में संभवतः श्रेणी और निगम महत्त्वपूर्ण थे।

ग्राम प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी जिसका प्रधान ‘ग्रामिक’ होता था, इसका उल्लेख वासुदेव के मथुरा लेख में मिलता है।

ग्रामिक का मुख्य कार्य राजस्व की वसूली करना था।

‘पद्रपाल’ नामक कर्मचारी गाँव की सामूहिक परती (ऊसर) भूमि की देखभाल करता था।

कुषाण शासन का महत्त्व

मौर्यों के पतन के बाद पहली बार कुषाणों ने ही समस्त उत्तरी भारत को एक राजनीतिक एकता के सूत्र में बांधा।

भारतीयों ने कुषाणों से घुड़सवारी, लगाम, जीन, पगड़ी, कुरती, पतलून, लंबे कोट, शिरस्त्राण, बूट आदि का प्रयोग करना सीखा।

शक्तिशाली कुषाण शासकों ने शांति, सुव्यवस्था और सामंजस्य का वातावरण स्थापित कर व्यापार-वाणिज्य को बढ़ावा दिया जिसके कारण अनेक शिल्पों एवं उद्योग-धंधों का विकास हुआ।

राजनीतिक शांति और आर्थिक समृद्धि के इस युग में धर्म, साहित्य, कला, विज्ञान, व्यापार-वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई।

व्यापारिक एवं औद्योगिक विकास के परिणामस्वरूप पुराने नगरों में अधिक समृद्धि आई तथा तक्षशिला, पुरुषपुर, मथुरा, श्रावस्ती, कोशांबी, वाराणसी, पाटलिपुत्र, वैशाली जैसे नगरों का अभ्युदय हुआ।

सही अर्थों में कुषाणकाल को ही ‘भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग’ माना जाना चाहिए।

1 thought on “कुषाण राजवंश और कनिष्क (Kushan and Kanishka)

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