वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)

नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने विजय अभियान से समस्त यूरोपीय मानचित्र को परिवर्तित कर दिया था। उसकी पराजय के बाद यूरोप में कई तरह के तनावों और अंतर्द्वन्द्वों ने निर्णायक भूमिका निभाई। निरंतरता और परिवर्तन की शक्तियों में खींचतान मची हुई थी। राजतंत्र, चर्च, सामंत और पच्चीस वर्षों की उथल-पुथल के बाद शांति और स्थिरता की आकांक्षा यथास्थिति की पोषक शक्तियां थीं। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिक विकास, नगरों का विकास और वृद्धि, राष्ट्रवाद और क्रांति के कारण जन्मे तथा विकसित और प्रसारित विचार परिवर्तन के वाहक तत्व थे। निरंतरता और परिवर्तन के इसीं द्वंद्व ने नेपोलियन के बाद के यूरोप का निर्णय किया।

वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)

नेपोलियन की विजयों से उत्पन्न राजनीतिक समस्याओं एवं परिवर्तनों का समाधान करने तथा यूरोप के अन्य देशों की पुनर्व्यवस्था करने के लिए विजयी राष्ट्रों- ब्रिटेन, आस्ट्रिया, रूस, प्रशा आदि देशों के प्रतिनिधियों और राजनीतिज्ञों ने मेटरनिख के बढ़ते प्रभाव के कारण आस्ट्रिया की राजधानी वियेना में एक ऐतिहासिक कांग्रेस का आयोजन किया, जिसे ‘वियेना कांग्रेस’ कहा जाता है। वियेना कांग्रेस यूरोप को नेपोलियन युग से मेटरनिख युग तक ले जानेवाली एक कड़ी है। जहाँ उन्नीसवीं शती के प्रारंभिक पंद्रह वर्षों पर नेपोलियन की अमिट छाप थी, वहीं उसके बाद के तैंतीस वर्षों तक आस्ट्रिया का चांसलर (प्रधानमंत्री) मेटरनिख यूरोप पर छाया रहा। नेपोलियन कहा करता था कि फ्रांस की जनता स्वतंत्रता की नहीं, समानता की भूखी है। मेटरनिख का कहना था कि यूरोप को स्वतंत्रता नहीं, शांति चाहिए। वियेना कांग्रेस में नेपोलियन और क्रांति को दफन करके जहां तक संभव था पुरातन व्यवस्था के मूल्यों की पुनर्स्थापना करने का प्रयास किया गया।

नेपोलियन के विरुद्ध इंग्लैंड, आस्ट्रिया, प्रशा और रूस ने मार्च 1814 में शोमों की संधि की थी। इसके अनुसार नेपोलियन की पराजय के बाद भी बीस वर्षों तक क्षेत्रीय और राजनैतिक निर्णयों को लागू करने के लिए सहयोग करना था। अक्टूबर 1813 ई. में लाइपजिंग के युद्ध में नेपोलियन की पराजय के बाद मई 1814 में फ्रांस के साथ पेरिस की प्रथम उदार संधि के द्वारा उसे 1792 की सीमा प्रदान की गई थी और बूढे राजवंश को फ्रांस में पुनर्स्थापित कर दिया गया था। इस प्रकार वियेना कांग्रेस का आरंभ 1 नवंबर 1814 ई. को ही आरंभ हो गया था। किंतु तभी नेपोलियन एल्बा से लौट आया और कांग्रेस को कुछ समय तक के लिए स्थगित करना पड़ा। वाटरलू के युद्ध (8 जून 1815 ई.) में नेपोलियन को पराजित करने के और सेंट हेलेना में अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के बाद वियेना कांग्रेस का अधिवेशन पुनः प्रारंभ हुआ।

यूरोप की पुनर्व्यवस्था और उस व्यवस्था की सुरक्षा के लिए मिल-जुलकर एक संगठन बनाये रखने की दिशा में कांग्रेस का जो क्रम वियेना में शुरू हुआ वह वेरोना तक चला। इस बीच हुए सम्मेलनों में प्रमुख रूप से आस्ट्रिया और रूस सक्रिय रहे। कभी-कभी फ्रांस और प्रशा जैसे अन्य देशों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। कांग्रेसों का यह क्रम अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की शुरुआत करने में अपनी असफलताओं के बावजूद ऐतिहासिक माना जाता है। उन्नीसवी सदी के यूरोपीय राज्य व्यवस्था की आधारशिला वियेना सम्मेलन में ही रखी गई।

वियेना कांग्रेस के प्रमुख उदेश्य (The Main Objectives of Vienna Congress)

वियेना में उपस्थित सभी प्रतिनिधि क्रांति और नेपोलियन से आतंकित थे, इसलिए वे ऐसी व्यवस्था करना चाहते थे कि 1789 से 1815 तक की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और यूरोप में शांति बनी रहे। नेपोलियन ने अपने युद्धों के द्वारा पूरे यूरोप का, विशेष रूप से यूरोप के मध्यभाग का राजनीतिक नक्शा बदल दिया था, इसलिए वियेना कांग्रेस को यूरोप का पुननिर्माण कर कई देशों की सीमाओं को पुनर्व्यवस्थित करना था। नेपोलियन ने कई राज्यों का अंतकर उनके राजवंशों को नष्ट कर दिया था। वियेना कांग्रेस को उन राज्यों और इनके राजवंशों को पुनः स्थापित करना था। पवित्र रोमन साम्राज्य भंग हो चुका था। इटली और जर्मनी में भी नेपोलियन ने कई परिवर्तन किये थे। पोलैंड, हालैंड, बेल्जियम, फिनलैंड आदि से संबंधित क्षेत्रीयता की समस्याएं थीं। सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक चीज थी तेईस वर्षों के निरंतर युद्धों के बाद यूरोप में पूर्ण और स्थायी शांति, यही वियेना कांग्रेस का प्रमुख उदेश्य था ।

वास्तव में वियेना कांग्रेस के कर्ता-धर्ता नेपोलियन को परास्त करने पर एकमत थे और फ्रांस के चारों ओर ऐसे शक्तिशाली राज्यों का घेरा निर्मित करना चाहते थे ताकि भविष्य में फ्रांस किसी अन्य देश पर पुनः आक्रमण न कर सके और यूरोप की शांति-व्यवस्था और शक्ति-संतुलन बना रहे। किंतु विभिन्न देशों के पुनगर्ठन में निजी स्वार्थ के कारण उनमें मत-विभिन्नता थी। विजेता राष्ट्र युद्ध में नेपोलियन को हराने के एवज के रूप में भी कुछ-न-कुछ पाना चाहते थे। आस्ट्रिया, इटली को हड़पना चाहता था, रूस के जार की आँखें पोलैंड पर लगी हुई थी, प्रशा सैक्सनी राज्य को हड़पना चाहता था और इंग्लैंड, युद्धों में जीते हुए फ्रांस के उपनिवेश किसी भी कीमत पर लौटाने को तैयार नहीं था। इसी प्रकार छोटे-छोटे राज्यों के भी अपने-अपने हित और स्वार्थ थे। आपसी स्वार्थों की टकराहट से कई बार वियेना कांग्रेस के भंग होने तक की नौबत आ गई, जैसे पोलैंड और सैक्सनी की समस्या।

वियेना कांग्रेस के प्रमुख प्रतिनिधि (Main Representatives of Vienna Congress)

वियेना कांग्रेस यूरोपीय इतिहास का पहला बड़ा सम्मेलन था जिसमें कुल 90 बड़े शासक तथा 63 राजा या उनके प्रतिनिधि सम्मिलित हुए थे। किंतु तुर्की ने वियेना कांग्रेस में भाग नहीं लिया था। यद्यपि वियेना में बहुत सारे देशों के राजप्रमुख और राजनेता उपस्थित थे, किंतु रूस, प्रशा और आस्ट्रिया के राजा, इंग्लैंड के ड्यूक आफ वेलिंगटन और विदेश मंत्री कासलरिआ तथा फ्रांस के कूटनीतिज्ञ तालिरां की चकाचौंध में यूरोप के अन्य राजप्रतिनिधियों का स्थान गौण था। कुछ प्रभावशाली देशों के प्रतिनिधियों का विवरण इस प्रकार है-

आस्ट्रिया का मेटरनिख

वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)
आस्ट्रिया का प्रधानमंत्री मेटरनिख

वियेना कांग्रेस का मुख्य सूत्रधार आस्ट्रिया का प्रतिनिधि प्रधानमंत्री मेटरनिख था। मेटरनिख असाधारण प्रतिभा-संपन्न यूरोपीय राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी था जो नेपोलियन के पतन के बाद 1815 से 1848 ई. तक यूरोपीय राजनीति में इतना प्रभावी था कि उसके अपने पतन तक के तैंतीस वर्षों के काल को ‘मेटरनिख काल’ कहा जाता है। घोर प्रतिक्रियावादी मेटरनिख स्वतंत्रता और समानता का घोर विरोधी था। उसका मुख्य उद्देश्य आस्ट्रिया के सम्मान और शक्ति बनाए रखना था और उसे इस कार्य में सफलता भी मिली।

रूस का अलेक्जेंडर प्रथम

वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)
रूस का जार अलेक्जेंडर प्रथम

वियेना कांग्रेस में रूस के प्रतिनिधि जार अलेक्जेंडर प्रथम भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण थी। जार में मेटरनिख के समान राजनैतिक और कूटनीतिक गुण नहीं थे। वह एक कल्पनाशील, अस्थिर, अभिमानी, सरलता से प्रभावित होनेवाला अव्यवहारिक व्यक्ति था। कासलरिआ ने वियेना से अपने प्रधानमंत्री को लिखा था कि ‘सबसे बड़ा खतरा तो जार से है जिसे पेरिस से बहुत लगाव है। अपने देश के निरंकुश शासन के विपरीत यहां उदारता और सहिष्णुता की नीति बरतकर वह अपने को तुष्ट और दूसरों को प्रभावित करना चाहता है।‘ वास्तव में अलेक्जेंडर पूरी तरह निरंकुश और क्रांति विरोधी शासक था, लेकिन रूस की सीमाओं के बाहर उसे उदारता का मुखौटा लगाने में लाभ प्रतीत होता था। वह कहा करता था : ‘ईश्वर ने मुझे आठ लाख की फौज इसलिए नहीं दी है कि मैं अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करूं।’ जबकि वास्तविकता इसके विपरीत थी। वियेना में वह संधि से अधिक ईसाई सिद्धांतों को आधार बनाकर यूरोपीय राज्यों का एक पवित्र संगठन बनाने में व्यस्त था। गेंट्ज ने कहा था कि वह वियेना तो केवल प्रशंसा प्राप्त करने गया। मेटरनिख उसे ‘पागल’ समझता था, लेकिन वह एक शक्तिशाली शासक था जिसकी शक्ति से इंग्लैंड और आस्ट्रिया भयभीत रहते थे।

इंग्लैंड के कासलरिआ और ड्यूक आफ वेलिंगटन

इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व वहाँ के विदेशमंत्री कासलरिआ और ड्यूक आफ वेलिंगटन ने किया। नेपोलियन को पराजित करने में ड्यूक आफ वेलिंगटन ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, इसलिए नेपोलियन के पतन के बाद उसे ही सर्वश्रेष्ठ सेनापति समझा जाने लगा था। लेकिन कूटनीति की जिम्मेदारियाँ कासलरिआ पर थीं। कासलरिआ योग्य होने के बावजूद अंतर्मुखी व्यक्ति था लेकिन अपनी शंकालु प्रवृत्ति के कारण वह अपना रसोइया तक साथ लाया था। कासलरिआ दूसरों को मेटरनिख की तरह धोखा नहीं देता था, लेकिन उसे भी धोखा देना मुश्किल था। उसे इंग्लैंड के औपनिवेशिक हितों की विशेष चिंता थी और उनकी सुरक्षा में वह सफल भी हुआ। वियेना कांग्रेस में मेटरनिख के बाद कासलरिआ का ही स्थान था।

फ्रांस का तालिरां

वियेना कांग्रेस में निर्णायक भूमिका अदा करने वालों में फ्रांस के प्रतिनिधि के रूप में तालिरां उपस्थित था जिसने अपना जीवन एक पादरी के रूप में शुरू किया था। क्रांतिकाल में वह चर्च का पद छोड़कर क्रांतिकारी हो गया था। नेपोलियन का उदय होने पर वह क्रांति-विरोधी हो गया और 1797 से 1807 ई. तक नेपोलियन के अधीन फ्रांस का विदेशमंत्री रहा था। स्पेन और पुर्तगाल पर आक्रमण का विरोध करने के कारण उसकी नेपोलियन से अनबन हो गई थी। नेपोलियन तालिरां को ‘रेशमी कपड़ों में लिपटा हुआ गोबर का टुकड़ा’ कहा करता था। अपनी कूटनीति के बल पर तालिरां अत्यंत कुशलता के साथ कांग्रेस में वैधता के सिद्धांत को स्वीकृत कराने में कामयाब रहा। इससे उसे सम्मान भी मिला जो उसकी योग्यता का प्रमाण था।

इसके अलावा आस्ट्रिया का शासक फ्रांसिस, प्रशा का शासक फ्रेडरिक विलियम और उसके साथ हार्डेनबर्ग तथा हुमबोल्ड्ट, प्रशा का नेपोलियन-विरोधी सुधारक स्टाइन और अनेक राजा, राजकुमार तथा कूटनीतिज्ञ भी वियेना में उपस्थित थे। प्रशा का हार्डेनबर्ग राष्ट्रवाद और सैनिकवाद में विश्वास करता था। उसका एक मात्र उद्देश्य अपने देश को शक्तिशाली बनाना था।

वियेना कांग्रेस के प्रमुख सिद्धांत (Main Principles of Vienna Congress)

वियेना कांग्रेस के निर्णय किसी भी प्रकार से न्यायपूर्ण नहीं कहे जा सकते। इसका कारण यह था कि वियेना कांग्रेस के निर्णय करने के आधार और कार्य-प्रणाली दोनों ही अनैतिक थे। वियेना में रंगारंग कार्यक्रम का आनंद लेते हुए राष्ट्र की सीमाओं जैसे महत्वपूर्ण मसलों पर निर्णय लिये गये। फिर भी, वियेना कांग्रेस में मोटेतौर पर निम्नलिखित चार सिद्धांतों के आधार निर्णय किये गये-

वैधता का सिद्धांत (Principle of Validity)

वियेना कांग्रेस के निर्णय का प्रमुख आधार वैधता का सिद्धांत था। इस सिद्धांत को फ्रांस के तालिरां ने मेटरनिख के सहयोग से पारित करवाया था क्योंकि वह फ्रांस में बूर्बो राजवंश को पुनर्स्थापित करना चाहता था। वैधता के सिद्धांत के अनुसार यूरोप के उन राज्यों में पुराने राजवंश पुनर्स्थापित किये गये जो फ्रांस की क्रांति या नेपोलियन के युद्धों के कारण अपदस्थ कर दिये गये थे। नेपोलियन द्वारा हटाये गये राजाओं को पुनर्स्थापित करने के नाम पर फ्रांस में बूर्बो वंश के लुई 18वें को गद्दी पर बैठाया गया। किंतु इस सिद्धांत को वहाँ नहीं माना गया जहाँ यह विजेताओं के हित में नहीं था।

शक्ति-संतुलन का सिद्धांत (Principle of Balance of Power)

वियेना कांग्रेस के निर्णय का एक आधार शक्ति-संतुलन का सिद्धांत था जो विशेषकर फ्रांस को दृष्टि में रखकर बनाया गया था। यूरोपीय देश नेपोलियन के युद्धों से आजिज आ गये थे, इसलिए वे ऐसी व्यवस्था करना चाहते थे जिससे स्थायी शांति स्थापित किया जा सके। इस सिद्धांत के आधार पर फ्रांस पर अंकुश. लगाये रखने के लिए उसके चारों ओर छोटे देशों जैसे, हालैंड और बेल्जियम को मिलाकर मजबूत राष्ट्रों का निर्माण किया गया।

क्षतिपूर्ति का सिद्धांत (Principle of Indemnity)

वियेना कांग्रेस के निर्णय का तीसरा आधार था क्षतिपूर्ति का सिद्धांत। यूरोप के जिन राष्ट्रों ने नेपोलियन का सामना किया था, उन्हें भारी हानि उठानी पड़ी थी। इस सिद्धांत के अनुसार नेपोलियन के विरुद्ध संघर्ष में भाग लेने वाले देशों के नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए फ्रांस से मुआवजा लिया गया।

पुरस्कार और दंड का सिद्धांत (Principle of Rewards and Punishments)

वियेना कांग्रेस के निर्णय का चौथा आधार पुरस्कार और दंड का सिद्धांत था। इस सिद्धांत के आधार पर नेपोलियन को पराजित करने वालों को पुरस्कार और नेपोलियन की सहायता करने वालों को दंड दिया गया, जैसे-डेनमार्क, जिसने नेपोलियन की सहायता की थी, से नार्वे छीनकर स्वीडन को दे दिया गया क्योंकि स्वीडेन ने मित्र राष्ट्रों की मदद की थी।

किंतु वियेना कांग्रेस में इन सिद्धांतों का पालन करने में किसी नैतिक मानदंड को नहीं अपनाया गया और जहाँ आवश्यक हुआ वहीं उनकी अवहेलना की गई। आरंभ में मेटरनिख और अन्य विजेताओं के प्रतिनिधि- इंग्लैंड, रूस, आस्ट्रिया और प्रशा अपने-अपने हितों को साधने के लिए कांग्रेस को अपनी इच्छानुसार संचालित करना चाहते थे, किंतु फ्रांस के तालिरां के असाधारण कूटनीतिक प्रयास के कारण आठ राज्यों- इंग्लैंड, आस्ट्रिया, रूस, प्रशा, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल तथा स्वीडेन की एक समिति बनाई गई और जनवरी 1815 ई. में फ्रांस को पाँचवाँ राज्य मान लिया गया। यद्यपि विशिष्ट समस्याओं के निराकरण के लिए 18 उपसमितियों की घोषणा की गई थी, किंतु वियेना कांग्रेस पर पाँच बड़ों का ही प्रभुत्व बना रहा। अन्य प्रतिनिधियों स्पेन, पुर्तगाल और स्वीडेन से औपचारिक स्वीकृति प्राप्त कर ली गई। दरअसल वियेना कांग्रेस कोई कांग्रेस ही नहीं थी; यह तो केवल लूट के माल का बँटवारा करनेवालों का जमघट मात्र था।

वियेना कांग्रेस के प्रमुख निर्णय (Major Decisions of Vienna Congress)

वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)
1815 ई. में यूरोप

वैधता के सिद्धांत के आधार पर फ्रांस पर बूर्बो वंश का अधिकार स्वीकार किया गया। लुई सोलहवाँ और उसके पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए उसके भाई लुई अठारहवें को फ्रांस के शासक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

फ्रांस से संबंधित अन्य निर्णयों में नेपोलियन की पत्नी मारी लुइजा को परमा की रियासत दी गई।

फ्रांस से नेपोलियन द्वारा या उससे पहले जीते गये सभी प्रदेशों को छीन लिया गया और फ्रांस की सीमा वही कर दी गई जो 1791 ई. में थी।

फ्रांस में फ्रांस के व्यय पर वेलिंगटन के नेतृत्व में मित्र राष्ट्रों की 1,50,000 सेना पांच वर्ष के लिए रख दी गई। युद्ध के हर्जाने के रूप में फ्रांस को 70 करोड़ फ्रेंक (लगभग 1400 लाख डालर) मित्र राष्ट्रों को पाँच वर्ष में देने थे।

शक्ति-संतुलन बनाये रखने के लिए फ्रांस के उत्तर में हालैंड को बेल्जियम का प्रदेश देकर सुदृढ़ किया गया और हालैंड में आरेंज परिवार को पुनर्स्थापित किया गया। फ्रांस के दक्षिण-पूर्व में साडीर्निया के राज्य को मजबूत करने के लिए उसे पीडमांट, सेवाय, नीस, जिनेवा के गणतंत्र लौटा दिये गये।

पोप को चर्च का राज्य वापस मिल गया।

चूकिं पवित्र रोमन साम्राज्य को पुनर्जीवित करना असंभव था, इसलिए जर्मनी में 38 राज्यों का एक ढीला-ढाला संघ बनाया गया और उसका नेतृत्व आस्ट्रिया को सौंपा गया।

स्पेन में बूर्बो वंश की स्थापना की गई और नेपल्स में भी प्राचीन राजवंश को पुनर्स्थापित किया गया।

आस्ट्रिया को लोंबार्डी और वेनिशिया के प्रांत वापस कर दिये गये। इलीरिया उसे पहले ही मिल चुका था।

आस्ट्रिया को रूस से पालैंड का गेलेशिया क्षेत्र और बवेरिया से टाइरोन का प्रदेश भी दिलाये गये। इससे आस्ट्रिया को अपनी खोई हुई शक्ति और प्रतिष्ठा पुनः मिल गई।

प्रशा को रेमिश का प्रांत वापस मिल गया। साथ ही उसे कोलोन, त्रैव तथा स्वीडेन का पामेरेनिया क्षेत्र भी दिया गया। दंड के रूप में सैक्सनी का एक हिस्सा भी प्रशा को दिया गया। इस प्रकार सैक्सनी को सजा मिल गई और प्रशा को पुरस्कार। प्रशा के हिस्से का पोलैंड रूस के ही कब्जे में छोड़ दिया गया।

स्वीडेन के शासक बर्नदात ने नेपोलियन के विरुद्ध मदद की थी, इसलिए उसे नार्वे दिया गया।

रूस को फिनलैंड और अपने हिस्से का पोलैंड वापस मिल गया।

स्विट्जरलैंड स्वतंत्र गणतंत्र मान लिया और उसमें तीन और कैंटन जोड़ दिये गये।

हैनोवर को एक स्वतंत्र राज्य मान लिया गया।

नेपोलियन के साथ हुए युद्धों में सबसे अधिक इंग्लैंड जूझता रहा था, इसलिए हेलिगोलैंड, मारीशस, माल्टा, ट्रिनिडाड, टोबैगो तथा लंका और अफ्रीका के दक्षिण स्थित उत्तमाशा अंतरीप पर इंग्लैंड का प्रभुत्व स्वीकार किया गया। बदले में इंग्लैंड ने हालैंड को साठ लाख पौंड मुआवजे के रूप में दिया।

इन क्षेत्रीय प्रावधानों के अलावा वियेना में कुछ सामाजिक-आर्थिक महत्व के निर्णय भी लिये गये। इंग्लैंड ने पहले ही गुलामी प्रथा का अंत कर दिया था। वियेना में हालैंड, फ्रांस और स्पेन ने भी दासता की प्रथा का उन्मूलन करना स्वीकार किया।

भूमध्य सागर में बारबेरी कोरसैर्स नामक समुद्री लुटेरों ने आतंक मचा रखा था। वियेना कांग्रेस के निर्णय के अनुसार ब्रिटिश नौसेना ने भूमध्यसागरीय डाकुओं पर संगठित रूप से प्रहार कर न केवल उनका अंत कर दिया बल्कि हजारों ईसाई बंदियों को भी उनकी कैद में मुक्त करवाया।

यूरोप की अंतर्राष्ट्रीय नदियों में जहाजरानी के नियम बनाये गये। पहली बार राष्ट्रों के पारस्परिक संबंधों पर विचार हुआ और अंतर्राष्ट्रीय कानून के क्रियान्वयन का निर्णय लिया गया।

वियेना कांग्रेस के निर्णयों का मूल्यांकन (Evaluation of the Decisions of Vienna Congress)

वियेना कांग्रेस (Vienna Congress)
वियेना कांग्रेस के बाद 1815 ई. में यूरोप

नेपोलियन के युद्धों से त्रस्त यूरोप को वियेना कांग्रेस से बड़ी उम्मीदें थीं। यद्यपि वियेना कांग्रेस शांति स्थापित करने में तो सफल रही, किंतु वियेना में लिये गये अनेक निर्णय अनुचित, अनैतिक अन्यायपूर्ण थे। वियेना कांग्रेस के निर्णय एक सदी बाद ही खत्म हो गये क्योंकि वियेना में राजनीतिज्ञों ने इतिहास की धारा को अवरूद्ध करने का प्रयास किया था। मेटरनिख के नेतृत्व में हर जगह प्रजातंत्र और राष्ट्रवाद का गला घोंटा गया। बेल्जियम फ्रांस, नार्वे, पोलैंड और इटली में जनांकांक्षाओं को पूर्णतः नजरअंदाज किया गया।

वियेना कांग्रेस प्रतिक्रियावादी शक्तियों की विजय थी। वहां एकत्र लोगों का दृढ़ निश्चय था कि क्रांति और राष्ट्रीयतावादी शक्तियों को सिर नहीं उठाने देंगे। तालिरां ने वैधता के सिद्धांत के माध्यम से फ्रांस में पुरातन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना चाहा था। लेकिन वहाँ भी राजवंशों के हित के लिए राष्ट्रीयता के सिद्धांत की अनदेखी की गई। नार्वे स्वीडेन के साथ मिलने के लिए तैयार नहीं था और बाद में वहाँ स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई। इसी तरह बेल्जियम ने भी हालैंड में विलय का विरोध किया और बाद में उसने अपनी स्वतंत्रता हासिल कर ली। जर्मनी में आस्ट्रिया का हस्तक्षेप बना रहा। इस प्रकार वैधता का सिद्धांत धूर्ततापूर्ण, और केवल कुछ परिवारों के पक्ष में था।

पुरस्कार, मुआवजे और दंड के सिद्धांत को भी विजेताओं ने अपने लाभ और स्वार्थ के आधार पर अन्यायपूर्ण ढ़ंग से लागू किया। कहीं इनके लिए देश चुने गये तो कहीं राजा, जैसे- फ्रांस से मुआवजा तो लिया गया, लेकिन दंड केवल नेपोलियन को मिला, फ्रांस को नहीं। सैक्सनी में मामले में शासक को दंड न देकर उस राज्य को ही बाँट दिया गया ताकि विजेताओं को पुरस्कार दिया जा सके। पोलैंड के साथ भी मनमाना व्यवहार किया गया। पुरस्कार और सजा का कोई एक मापदंड नहीं रखे जाने से वियेना सम्मेलन के सचिव गेंज ने कहा है कि ’वास्तव में कांग्रेस का लक्ष्य विजित प्रदेशों के लूट के माल का बँटवारा करना मात्र था।

शक्ति-संतुलन का सिद्धांत भी फ्रांस के अलावा किसी अन्य देश पर लागू हो पाया। वास्तविकता यह थी कि यूरोप में सबसे शक्तिशाली देश इंग्लैंड की शक्ति न केवल अक्षुण्ण रही बल्कि उसका विस्तार भी हुआ। बड़ें देशों, विशेषकर प्रशा, रूस और फ्रांस ने जब आवश्यक समझा तो शक्ति-संतुलन के सिद्धांत की अवहेलना की। हेजेन का कहना है कि वियेना में उच्च आदर्शों का अभाव और स्वार्थों का बोलबाला था। 1815 के बाद संपूर्ण उन्नीसवीं सदी का यूरोपीय इतिहास वियेना कांग्रेस की इन्हीं भूलों को सुधारने के प्रयत्नों का इतिहास है।

यद्यपि किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते और संधि की तरह वियेना की संधि भी मोलतोल और आपसी समझौतों का परिणाम थी। फिर भी, अपनी तमाम कमियों के बावजूद वियेना कांग्रेस में कुछ ऐसे निर्णय भी लिये गये जो व्यवहारिक और दूरदर्शितापूर्ण थे। डेविड टामसन के अनुसार वियेना संधि पर राजनैतिक सूझ-बूझ और तर्कसंगतता की छाप थी। तत्कालीन यूरोप को सबसे अधिक शांति की आवश्यकता थी और और इस मामले में कांग्रेस सफल रही क्योंकि लगभग अगले 40 वर्षों तक यूरोप में कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ। इसके बाद युद्ध हुआ भी तो सुदूर क्रीमिया के दलदल में। सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह थी कि वियेना सम्मेलन में फ्रांस के प्रति उदार नीति अपनाई गई और पहली बार वियेना कांग्रेस में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर आधारित एक संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (Concert of Europe) का गठन किया गया जो बाद में राष्ट्रसंघ और संयुक्त राष्ट्रसंघ का अग्रगामी सिद्ध हुआ।

वियेना कांग्रेस के प्रतिनिधियों ने दास प्रथा, नाविक व्यापार की स्वतंत्रता आदि प्रश्नों पर विचार करके और उस पर सक्रिय कदम उठाने का निर्णय करके यूरोप के नवनिर्माण की भावना तथा अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण की उदारता का परिचय दिया। कांग्रेस की प्रशंसा करते हुए मेरिएट लिखते हैं कि यद्यपि कांग्रेस के कार्य प्रतिक्रियावादी थे, किंतु इससे एक पुराने युग की समाप्ति और नये युग का आरंभ होता है।

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