आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता और कर्नाटक के युद्ध (Anglo-French rivalry and Battle of Karnataka)

अंग्रेजी और फ्रेंच के बीच शत्रुता देर से 18वीं सदी में शुरू हुई। व्यापार से आरंभ होकर अंग्रेजी-फ्रांसीसी कंपनियाँ भारत की राजनीति में अपरिहार्य रूप से उलझ गईं। जब मुगल सत्ता क्षीण हो गई तथा दकन के सूबेदार कंपनियों की रक्षा करने में असफल रहे तो कंपनियों ने स्वयं अपनी रक्षा के लिए तलवार उठा लिये। दोनों कंपनियों का उद्देश्य व्यापार से अधिकाधिक मुनाफा कमाना था, इसलिए व्यापारिक एकाधिकार को बनाये रखने के लिए एक-दूसरे को हटाने में लग गईं।

17वीं-18वीं शताब्दी में आंग्ल-फ्रांसीसी शाश्वत शत्रु थे तथा ज्यों ही यूरोप में उनका आपसी युद्ध आरंभ होता, संसार के प्रत्येक कोने में जहाँ ये दोनों कंपनियाँ कार्य करती थीं, आपसी युद्ध आरंभ हो जाते थे। भारत में आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध आस्ट्रिया के उत्तराधिकर युद्ध से आरंभ हुआ।

उस समय फ्रांसीसियों का मुख्य कार्यालय पांडिचेरी में था और मसुलीपट्टनम, कारिकल, माही, सूरत तथा चंद्रनगर में उनके उपकार्यालय थे। इसी प्रकार अंग्रेजों की मुख्य बस्तियाँ मद्रास, बंबई और कलकत्ता में थीं तथा अनेक कार्यालय थे।

प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746-48 ई.)

पहला कर्नाटक युद्ध आस्ट्रियाई उत्तराधिकार के युद्ध का नतीजा था और यह उसी का विस्तारमात्र था। बार्नेट के अधीन अंग्रेजी नौसेना ने कुछ फ्रांसीसी जलपोतों पर कब्जा कर लिया। डूप्ले जो 1741 ई. से पांडिचेरी का फ्रांसीसी गवर्नर जनरल था, ने मारीशस सिथत फ्रांसीसी गवर्नर ला बूर्डोने से सहयता माँगी। मद्रास को  दोनों ओर से फ्रांसीसी सेना ने घेर लिया। 21 सितंबर को मद्रास ने आत्म-समर्पण कर दिया। ला बूर्डोने ने धन लेकर नगर को वापस कर दिया, किंतु डूप्ले ने नगर को पुनः जीत लिया। डूप्ले फोर्ट सेंट डेविड किले को जीत नहीं पाया, जो पांडिचेरी से मात्र 18 मील दूर था। इस बीच एक अंग्रेजी स्क्वाड्रन रीयल एडमिरल बोस्कावे ने पांडिचेरी को जीतने का असफल प्रयास किया।

  • सेंट टामे का युद्ध
    फ्रांसीसी सेना और कर्नाटक के नवाब अनवरूद्दीन के नेतृत्व में भारतीय सेना के बीच सेंट टामे का युद्ध लड़ा गया। जब फ्रांसीसियों ने मद्रास को जीत लिया तो नवाब ने दोनों कंपनियों को आदेश दिया कि वे युद्ध बंद कर दें तथा देश में शांति बनाये रखें। डूप्ले ने मद्रास नवाब को देने का लालच दिया, लेकिन वह अपनी बात से मुकर गया। अब नवाब ने अपनी बात मनवाने के लिए अपनी सेना भेज दी। कैप्टन पैराडाइज के अधीन एक छोटी सी फ्रांसीसी सेना ने महफूज खाँ के नेतृत्ववाली भारतीय सेना को अडयार नदी के निकट सेंट टाॅमे के स्थान पर हरा दिया।
    जब एक्स-ला-शैपल की संधि 1748 ई.द्ध से यूरोप में युद्ध बंद हो गया, तो कर्नाटक का प्रथम युद्ध भी समाप्त हो गया। मद्रास फिर अंग्रेजों को मिल गया। इस प्रथम दौर में दोनों बराबर रहे। स्थल पर फ्रांसीसी श्रेष्ठ रहे और डूप्ले ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। यद्यपि अंग्रेज पांडिचेरी को नहीं जीत पाये, किंतु युद्ध में नौसेना का महत्त्व स्पष्ट हो गया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध (1749-54 ई.)

कर्नाटक के प्रथम युद्ध से डूप्ले की राजनैतिक पिपासा जाग उठी और उसने फ्रांसीसी राजनैतिक प्रभाव के विस्तार के लिए भारतीय राजवंशों के परस्पर झगड़ों में हस्तक्षेप कर लाभ उठाने की योजना बनाई। मालेसन के शब्दों में ‘महत्वाकांक्षाएँ जाग उठीं, परस्पर द्वेष बढ़ गये। जब बढ़ते हुए प्रभाव की आकांक्षाएँ द्वार खटखटा रही थीं तो उन्हें यूरोपीयद्ध शांति से क्या लेना-देना। यह सुअवसर हैदराबाद तथा कर्नाटक के विवादास्पद उत्तराधिकारों के कारण शीघ्र प्राप्त हुआ।’

आसफजाह, जिसने दकन को स्वायत्त बना लिया था, 21 मई, 1748 को मर गया। उसका पुत्र नासिरजंग (1748-50) उसका उत्तराधिकरी बना। किंतु आसफजाह के पौत्र और उसके भतीजे मुजफ्फरजंग ने उसको चुनौती दी। दूसरी ओर कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन तथा उसके बहनोई चंदासाहिब के बीच विवाद था। जल्दी ही दोनों विवाद बड़े विवाद में बदल गये।

डूप्ले ने इस राजनीतिक अनिश्चितता का लाभ उठाने के लिए मुजफ्फरजंग को दकन का सूबेदार और चंदा साहिब को कर्नाटक का नवाब बनाने के लिए समर्थन देने की सोची, जिसमें उसे सफलता भी मिली। अपरिहार्य रूप में अंग्रेजों को नासिरजंग तथा अनवरुद्दीन का साथ देना पड़ा। मुजफ्फरजंग, चंदासाहिब और फ्रांसीसी सेनाओं ने 1749 ई. के अगस्त में वैल्लौर के निकट अनवरुद्दीन को हराकर मार डाला। दिसंबर 1750 ई. में एक संघर्ष में नासिरजंग भी मारा गया। मुजफ्फरजंग दकन का सूबेदार बन गया। उसने अपने हितैषियों को बहुत-सा उपहार दिया। डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिण के भाग में मुगल प्रदेशों का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया। उत्तरी सरकारों के कुछ जिले भी फ्रांसीसियों को मिल गये। मुजफ्फरजंग की प्रार्थना पर एक फ्रांसीसी सेना भी बुस्सी के नेतृत्व में हैदराबाद में रख दी गई। 1751 ई. में चंदासाहिब कर्नाटक के नवाब बन गये। इस समय डूप्ले अपने राजनैतिक सफलता के चरर्मोत्कर्ष पर था।

अनवरुद्दीन के पुत्र मुहम्मदअली ने त्रिचनापल्ली में शरण ले रखी थी। फ्रांसीसी और चंदासाहिब मिलकर भी त्रिचनापल्ली को नहीं जीत पाये। अंग्रेजों की स्थिति फ्रांसीसी विजय से डावाँडोल हो गई थी। कलाइव, जो त्रिचनापल्ली में फ्रांसीसी घेरा को तोड़ने में असफल रहा, त्रिचनापल्ली पर दबाव करने के लिए कर्नाटक की राजधानी अर्काट का घेरा डाल दिया और केवल 210 सैनिकों की सहायता से अर्काट को जीत लिया। चंदासाहिब ने 400 सैनिकों को भेजा, किंतु वे अर्काट नहीं जीत सके। क्लाइव ने 53 दिन तक इस सेना का प्रतिरोध किया। इससे फ्रांसीसियों की प्रतिष्ठा को काफी ठेस पहुँची। 1752 ई. में लारेंस के नेतृत्व में एक अंग्रेजी सेना ने त्रिचनापल्ली को बचा लिया और उसका घेरा डालनेवाली फ्रांसीसी सेना ने आत्म-समर्पण कर दिया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध के अंत में 1754 ई. पांडिचेरी की संधि हुई। इस संधि के अनुसार अंग्रेजी और फ्रांसीसी कंपनियों ने वादा किया कि वे भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। हैदराबाद में बुस्सी के अधीन एक फ्रांसीसी सेना के रहने के लिए स्वीकृति मिल गई। अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने एक-दूसरे के विजित भागों को लौटा दिया। संधि को दोनों कंपनियों के संबंधित सरकारों के अनुमोदन के बाद अंतिम रूप दिया जाना था।
इस बीच तंजौर के राजा ने धोखे से चंदासाहिब की हत्या कर दी। त्रिचनापल्ली मे फ्रांसीसी हार से डूप्ले का सत्यानाश हो गया। फ्रांसीसी कंपनी के निदेशकों ने डूप्ले को वापस बुला लिया क्योंकि इसमें धन की हानि अधिक हुई थी। 1754 ई. में गोडेहू भारत में फ्रांसीसी प्रदेशों का गवर्नर जनरल तथा डूप्ले का उत्तराधिकरी बनकर आया। 1755 ई. में दोनों कंपनियों में अस्थायी संधि हो गई।

इस प्रकार झगड़े का दूसरा दौर भी अनिश्चित रहा। स्थल पर अंग्रेजी शक्ति की महत्ता सिद्ध हो गई और उनका प्रत्याशी मुहम्मदअली कर्नाटक का नवाब बन गया। 1751 ई. में मुजफ्फरजंग एक छोटी लड़ाई में मारा गया। हैदाराबाद में अभी भी फ्रांसीसी सेना तैनात थी और उन्होंने नये सूबेदार सालारजंग से और अधिक सुविधाएँ प्राप्त कर ली थीं। उत्तरी सरकारों के महत्त्वपूर्ण जिले, जिनकी आय 30 लाख रुपया थी, फ्रांसीसी कंपनी को दे दिया।

तृतीय कर्नाटक युद्ध (1756-63 ई.)

पाण्डिचेरी की संधि अल्पकालिक साबित हुई। तीसरा कर्नाटक युद्ध भी यूरोपीय संघर्ष का हिस्सा था। यह यूरोप में 1756 ई. में सात साल के युद्ध की प्रतिध्वनि था। सप्तवर्षीय युद्ध आरंभ होते ही भारत में शांति भंग हो गई। फ्रांसीसी सरकार ने अप्रैल, 1757 ई. को काउंट लाली को भारत भेजा जो अप्रैल, 1758 ई. में पहुँचा। इस बीच अंग्रेज बंगाल में सिराजुद्दौला को हराकर अपना अधिकार स्थापित कर चुके थे और उनका मनोबल बढ़ा था। बंगाल से प्राप्त धन के बल पर अंग्रेज फ्रांसीसियों को पराजित करने में सफल हो गये।

काउंट लाली ने 1758 ई. में ही फोर्ट सेंट डेविड को जीत लिया। इसके बाद उसने तंजौर के पर आक्रमण किया क्योंकि उसके ऊपर 56 लाख रुपया बकाया था। लाली का यह अभियान असफल रहा। इसके बाद लाली ने मद्रास का घेरा डाला, किंतु शक्तिशाली अंग्रेजी सेना के आ जाने के कारण उसे यह घेरा उठाना पड़ा। लाली ने बुस्सी को हैदराबाद से बुला लिया जो उसकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई। इससे वहाँ फ्रांसीसियों की स्थिति कमजोर हो गई। इसके बाद पोकाॅक के नेतृत्व में अंग्रेजी बेड़े ने डआश के नेतृत्ववाली फ्रांसीसी बेड़े को तीन बार पराजित किया और उसे भारतीय समुद्र में वापस जाने पर बाध्य कर दिया।

1760 ई. में आयरकूट ने वांदीवाश नामक स्थान पर फ्रांसीसियों को बुरी तरह हराया। बुस्सी बंदी बना लिया गया। जनवरी, 1761 ई. में अपनी पूर्ण पराजय के बाद फ्रांसीसी पांडिचेरी लौट गये। अंग्रजों ने पांडिचेरी को भी घेर लिया और 8 माह बाद फ्रांसीसियों ने इस नगर को भी अंग्रजों के हवाले कर दिया। माही और जिंजी भी जल्दी ही फ्रांसीसियों के हाथ से निकल गये। यु( पेरिस की संधि पर हस्ताक्षर किये जाने के साथ 1763 ई. में समाप्त हो गया। फ्रांसीसियों को पांडिचेरी के कुछ भाग वापस कर दिये गये, किंतु उनकी किलेबंदी पर प्रतिबंध था। इस प्रकार तीसरा एंग्लो-फ्रेंच संघर्ष निर्णायक सिद्ध हुआ जिससे आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता का नाटक खत्म हो गया और भारत से फ्रांसीसियों का पत्ता साफ हो गया।

अंग्रेजी नौसेना श्रेष्ठता, इंग्लैंड की अपेक्षाकृत सुरक्षित भौगोलिक स्थिति, गृह सरकार की अंग्रेजी नीतियों और कार्यक्रमों को पूरा अनुमोदन, जबकि भारतीय मामलों में फ्रांस की सरकार की कम रुचि व ब्रिटिश की मजबूत वित्तीय स्थिति फ्रांसीसी कंपनी की असफलता के कारण थे।


डूप्ले

  • डूप्ले का पूरा नाम जोसेफ फ्रैक्वाय डूप्ले था। वह फ्रांसीसी ईस्ट कंपनी की व्यापारिक सेवा में भारत आया और बाद को 1731 ई. में चंद्रनगर का गवर्नर बन गया।
  • 1741 ई. में वह पांडिचेरी का गवर्नर-जनरल बनाया गया और 1754 ई. तक इस पद पर रहा, जहाँ से वह वापस बुला लिया गया।
  • वह योद्धा न होते हुए भी कर्नाटक युद्धों में डूप्ले ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  • डूप्ले ने अपनी दूरदृष्टि से ये देख लिया था कि 18वीं शताब्दी ई. के पंचम दशक में दक्षिण भारत के राजनीतिक संतुलन में परिवर्तन घटित हो रहा है। तत्कालीन दक्षिण भारत की राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरियों को उसने समझा और इस बात को भी महसूस किया कि एक छोटी-सी यूरोपियन सेना लंबी दूरी तक मार कर सकनेवाली तोपों, जल्दी गोली दागनेवाले पैदल सिपाहियों की बंदूकों और प्रशिक्षित सैनिकों की सहायता से दक्षिण भारत की राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।
  • डूप्ले मद्रास पर कब्जा करके ब्रिटिश शक्ति को पंगु बना देना चाहता था। इसीलिए उसने फ्रांसीसी जलसेनापति ला बोर्दने को अपना जहाजी बेड़ा सशक्त करने के लिए धन दिया और सितंबर 1746 ई. में मद्रास अंग्रेजों से छीन लिया।
  • ला बोर्दने अंग्रेजों से घूस लेकर मद्रास वापस कर देना चाहता था, लेकिन ला बोर्दने के बेड़े ने जब मद्रास से हटकर आयल्स आफ फ्रांस में अड्डा जमाया, तो डूप्ले ने स्वयं जाकर मद्रास पर अधिकार किया।
    डूप्ले अंग्रेजों के निकटवर्ती सेट डेविड के किले को लेने में विफल रहा।
  • कर्नाटक के नावब अनवरुद्दीन ने एक बड़ी सेना मद्रास पर कब्जा करने के लिए भेजी, लेकिर उसे दो बार फ्रांसीसी भारतीय सेना द्वारा परास्त किया गया। ये दोनों युद्ध कावेरी पाक और सेंट टाम में हुए।
  • यूरोप में फ्रांस और इंग्लैंड के बीच युद्ध 1748 ई. में समाप्त हो गया। दोनों देशों के बीच एक्स-ला-चैपल की संधि हुई, जिसके अनुसार मद्रास अंग्रेजों को वापस कर दिया गया। फिर भी डूप्ले ने यह सिद्ध कर दिया कि यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित और आधुनिक शास्त्रों से लैस छोटी-सी फ्रांसीसी भारतीय सेना इस देश की विशाल भारतीय सेनाओं की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है।
  • डूप्ले ने अपने इस अनुभव का प्रयोग करके दक्षिण भारत की रियासतों के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू किया।
  • 1748 ई. में हैदराबाद के निजाम के मरने पर जब उत्तराधिकार का झगड़ा चला तो डूप्ले ने हस्तक्षेप किया और निजाम के पुत्र नासिरजंग के विरुद्ध पोते मुजफ्फरजंग का पक्ष लिया। इसी तरह डूप्ले ने कर्नाटक में नवाब अनवरुद्दीन के विरुद्ध चंदासाहिब का पक्ष लिया। आरंभ में डूप्ले को कुछ सफलता भी मिली। 1749 ई. में अंबूर की लड़ाई में अनवरुद्दीन मारा गया और उसका पुत्र मुहम्मदअली भागकर त्रिचनापल्ली गया, जहाँ चंदासाहिब और फ्रांसीसियों की सेना ने उसे घेर लिया।
  • दूसरी ओर हैदराबाद में 1750 ई. में नासिरजंग मारा गया और फ्रांसीसी जनरल बुस्सी के संरक्षण में मुजफ्फरजंग निजाम की गद्दी पर बैठा दिया गया। नये निजाम ने डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिण में समस्त मुगल प्रदेश का निजाम मान लिया। नये निजाम ने पांडिचेरी के आसपास के क्षेत्र तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र और मसुलीपट्टम भी फ्रांसीसियों को दे दिया। लेकिन बाद में डूप्ले का पासा पलटने लगा। फ्रांसीसी जनरल बड़े अयोग्य साबित हुए। फ्रांसीसी सेनापति त्रिचनापल्ली पर कब्जा नहीं कर पायेे। फ्रांसीसियों ने त्रिचनापल्ली की घेराबंदी इतने लंबे समय तक की कि अंग्रेजी सेना कर्नाटक के शहजादे की मदद के लिए आ गई।
  • दूसरी ओर राबर्ट क्लाइब की अंग्रेजी सेना ने कर्नाटक की राजधानी अर्काट के किले को घेर लिया और अंग्रेजी सेना आ जाने पर क्लाइब ने चंदासाहिब का पराजित करके मार डाला।
    इसी बीच नया निजाम मुजफ्फरजंग भी मारा गया। उसकी जगह सलारजंग गद्दी पर बैठा और उसने भी फ्रांसीसियों से मैत्री रखी।
  • डूप्ले ने और 31 दिसंबर, 1752 ई. को त्रिचनापल्ली को घेराबंदी एक बार फिर से शुरू की जो 1754 ई. के मध्य तक चली। जब यह सब कुछ हो रहा था, फ्रांस की सरकार इन लड़ाइयों के भारी खर्चे से वह परेशान हो उठी और 1754 ई. में डूप्ले को वापस बुला लिया।
  • 1 अगस्त 1754 ई. को जनरल गोडेहू को नया गवर्नर-जनरल बनकर आया। गोडेहू ने आते ही 1755 ई. में अंग्रेजों से संधि कर ली जिसके अनुसार तय हुआ कि अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही भारतीय रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और जितना-जितना क्षेत्र अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के पास है, वह उनके पास ही बना रहेगा।
  • डूप्ले की मृत्यु फ्रांस में 1763 ई. में हुई। डूप्ले भले ही असफल रहा, लेकिन उसने जिस राजनीतिक दूरदृष्टि का परिचय दिया, उससे अंग्रेजों ने बाद में स्वयं लाभ उठाया।

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