अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम (America’s War of Independence)

फ्रांस की पुरातन व्यवस्था

अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम, जिसे ‘अमेरिकी क्रांति’ भी कहा जाता है, यूरोपीय उपनिवेशवाद के इतिहास की एक क्रांतिकारी घटना है। यह स्वतंत्रता संग्राम ग्रेट ब्रिटेन और उसके तेरह उत्तर अमेरिकी उपनिवेशों के बीच 1775 से 1783 के बीच चलने वाला एक सैन्य-संघर्ष था, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका की ब्रिटिश कालोनियाँ ब्रितानी साम्राज्य से स्वतंत्र हो गईं और एक नये देश संयुक्त राज्य अमेरिका का निर्माण हुआ। इस स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान जनरल जॉर्ज वाशिंगटन ने अमरीकी उपनिवेशों की सेना का नेतृत्व किया, जिन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रथम राष्ट्रपति होने का गौरव प्राप्त है।

वियेना कांग्रेस

उपनिवेश-स्थापना की पृष्ठभूमि

जब तुर्कों ने 1453 में कुस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया और यूरोप से पूर्वी देशों के व्यापारिक मार्ग को बंद हो गये, तो यूरोप के साहसी नाविकों ने नये समुद्री मार्गों की खोज आरंभ की, जिससे पूर्वी देशों के साथ समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार किया जा सके। भारत के लिए नये समुद्री मार्ग की खोज में स्पेन का नाविक कोलंबस भटक कर अटलांटिक महासागर को पार करता हुआ 1492 में ‘नई दुनिया’ (अमेरिका) के तट पर पहुँच गया। कोलंबस ने इस दीप को भारत समझ कर यहाँ के निवासियों को ‘रेड इंडियन’ कहा। उसके बाद इतावली यात्री वेस्पुची अमेरिगो 1499 में नई दुनिया पहुँचा और उसके नाम पर नई दुनिया का नाम अमेरिका पड़ा। अमेरिका महाद्वीप सभी प्रकार के धन-धान्य से परिपूर्ण था। यहाँ न केवल कृषि योग्य विस्तृत उपजाऊ क्षेत्र थे,, बल्कि सोना, चाँदी, लोहा जैसे बहुमूल्य खनिज पदार्थ भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे।

अमेरिका की खोज के बाद यूरोपीय देशों में इसे उपनिवेश बनाने की होड़ मच गई। सबसे पहले स्पेन के निवासियों ने अमेरिका के मूल निवासियों को दास बनाकर उनसे कषि कार्य कराना चाहा, किंतु अमेरिकी लोग दासता को पसंद नहीं करते थे। इसलिए अफ्रीका से हब्शियों को पकड़कर अमेरिका में दासों के रूप में भेजा गया और उनसे कृषि कार्य लिया गया। धीरे-धीरे अमेरिका में वेस्टइंडीज, ब्राजील, मेक्सिको, पेरू आदि स्थानों पर स्पेन के उपनिवेश स्थापित हो गये।

इंग्लैंड के उपनिवेश

इंग्लैंड एवं स्पेन के मध्य 1588 में भीषण नौसैनिक युद्ध हुआ, जिसमें स्पेनी आर्मडा की पराजय के साथ ब्रिटिश नौसैनिक श्रेष्ठता की स्थापना हुई और इंग्लैंड ने अमेरिका में अपनी औपनिवेशिक बस्तियाँ बसानी आरंभ की। उत्तरी अमेरिका में इंग्लैंड का पहला उपनिवेश जेम्स प्रथम के शासनकाल (1603-1625) में स्थापित किया गया। जेम्स प्रथम ने लंदन कंपनी नामक एक व्यावसायिक संघ को एक अधिकार-पत्र प्रदान किया था। इस कंपनी ने 1607 ई. में कैप्टन जान स्मिथ के नेतृत्व में सौ अंग्रेजों के साथ अमेरिका में जेम्स टाउन उपनिवेश की नींव डाली। 1612 में एक अन्य कंपनी ने बरमूडा द्वीप समूह में उपनिवेश बसाया। 1620 में जेम्स प्रथम की धार्मिक नीति से असंतुष्ट और पीड़ित प्यूरिटनों ने न्यू इंग्लैंड नामक उपनिवेश की स्थापना की।

चार्ल्स प्रथम के शासनकाल (1625-1649) में औपनिवेशिक गतिविधियों में तेजी आई। 1630 में प्यूरिटन लोगों का एक दल उत्तरी अमेरिका में बोस्टन के आस-पास बस गया। 1634 में चार्ल्स प्रथम की रानी मेरी के नाम पर मेरीलैंड नामक उपनिवेश बसाया गया। 1636 में प्रावडेंस, हार्टफोर्ड, 1638 में न्यू हेवेन तथा अन्य स्थानों पर बस्तियाँ बसाई गईं। इस समय हॉलैंड और फ्रांस भी उत्तरी अमेरिका में अपने उपनिवेश स्थापित कर रहे थे। ब्रिटिश उपनिवेशों के उत्तर कनाडा, नोवास्कोशिया और क्यूबेक आदि स्थानों पर फ्रांस के उपनिवेश थे।

हेनरी अष्टम

यूरोपियों के अमेरिका में बसने के कारण

अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करने के कई कारण थे। एक तो, उपनिवेशों की स्थापना का मुख्य कारण वाणिज्यवाद था। उपनिवेशों को धन प्राप्त करने का साधन समझा जाता था। स्पेन की तरह इंग्लैंड भी अपने उपनिवेश स्थापित कर धन कमाना चाहता था। इंग्लैंड में औद्योगीकरण का दौर आरंभ हो चुका था और इसके लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी जिसकी आपूर्ति उपनिवेशों से आसानी से हो सकती थी और तैयार माल की खपत के लिए एक बड़े बाजार की जरूरत भी पूरी हो सकती थी। दूसरे, इंग्लैंड में धर्मसुधार आंदोलन के चलते प्रोटेस्टेंट धर्म का प्रचार हुआ और एग्लिंकन चर्च की स्थापना हुई। किंतु इसके विरोध में भी अनेक धार्मिक संघ बने और जेम्स प्रथम तथा चार्ल्स प्रथम की धार्मिक असहिष्णुता की नीति से तंग आकर हजारों की संख्या में लोग इंग्लैड छोड़कर अमेरिका में जाकर बसने लगे। तीसरे, ब्रिटेन में स्वामित्व की स्थिति में परिवर्तन होने के कारण बहुत से किसान भूमिहीन हो गये और वे अमेरिका जाकर आसानी से मिलने वाली भूमि को साधारण मूल्य पर खरीदना चाहते थे। भूमिहीन कृषकों के साथ-साथ भिखारियों एवं अपराधियों की संख्या भी निरंतर बढ़ती जा रही थी। अतः उन्हें अमेरिका भेजना उचित समझा गया। इसी प्रकार आर्थिक कठिनाइयों से परेशान लोगों को भी ब्रिटिश कंपनियाँ अपने खर्च पर अमेरिका ले जाती थीं और उनसे मजदूरी करवाती थीं।

अमेरिकी उपनिवेशों में 90 प्रतिशत अंग्रेज और 10 प्रतिशत डच, जर्मन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आदि थे। इस तरह अमेरिकी उपनिवेश पश्चिमी दुनिया और नई दुनिया दोनों का हिस्सा था। वस्तुतः पश्चिमी दुनिया का हिस्सा इसलिए कि यहाँ आकर बसने वाले लोग यूरोप के विभिन्न देशों जैसे- ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड आदि से आये थे और साथ ही नई दुनिया का भी हिस्सा थे क्योंकि यहाँ धार्मिक, सामाजिक वातावरण और परिवेश वहाँ से भिन्न था। इस प्रकार यहाँ मिश्रित संस्कृति का जन्म हुआ क्योंकि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आये लोगों के अपने रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास, शासन-संगठन, रहन-सहन आदि भिन्न-भिन्न थे। इन भिन्नताओं के बावजूद उनमें एकता थी और यह एकता एक समान समस्याओं के कारण और उसके समाधान के प्रयास के फलस्वरूप पैदा हुई थी। इतना ही नहीं, पश्चिम से लोगों के आगमन के कारण लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की भावना का भी प्रसार हुआ।

कर्नाटक में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता

उपनिवेशों के लिए संघर्ष

क्रामवेल के काल में (1649-1658) इंग्लैंड और हॉलैंड के बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण तीन युद्ध हुए। इसी स्पर्धा के कारण इंग्लैंड ने नेवीगेशन कानून पारित किये थे। इन युद्धों के फलस्वरूप हॉलैंड पराजित हुआ और इंग्लैंड ने अमेरिका में उसके उपनिवेश न्यू एम्सटरडम पर अधिकार कर लिया और उसका नाम न्यूयार्क रखा। इंग्लैंड और डचों के बीच प्रतिद्वंद्विता 1652 से 1674 तक चलती रही। इसके बाद डचों की शक्ति क्षीण हो गई।

डचों के बाद औपनिवेशिक तथा व्यापारिक क्षेत्र में आंग्ल-फ्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता आरंभ हुई। 1713 में फ्रांस युद्ध में पराजित हुआ और यूटेरस्ट की संधि (1713) के द्वारा उसने स्टोकेसिया का उपनिवेश इंग्लैंड को दे दिया। इसके साथ ही फ्रांस को उत्तरी अमेरिका में हडसन की खाड़ी तथा न्यूफाउंडलैंड पर भी अपने दावे को छोड़ना पड़ा। इसके बाद भी, इंग्लैंड और फ्रांस की प्रतिद्वंद्विता चलती रही। उत्तरी अमेरिका के ब्रिटिश उपनिवेशवासियों की आकांक्षा फ्रांस के मिसीसिपी क्षेत्रों को प्राप्त करना था। इसका अवसर इंग्लैंड को सप्तवर्षीय युद्ध (1756-1763) में मिल गया। इस युद्ध में 1763 में फ्रांस इंग्लैंड से पराजित हुआ और पेरिस की संधि के अनुसार फ्रांस को सेंट लारेंस नदी का मुहाना, मिसीसिपी घाटी का संपूर्ण प्रदेश जो नदी के पूर्व में था, तथा वेस्टइंडीज में पेनाडा का द्वीप इंग्लैंड को देना पड़ा, जिससे उत्तरी अमेरिका में फ्रांस की औपनिवेशिक सत्ता समाप्त हो गई।

इस प्रकार 1775 तक अमेरिका में 13 ब्रिटिश उपनिवेश थे, जिनके नाम थे- न्यूहेम्पशायर, मेसाचुसेटस, रोड आइलैंड, कनेक्टिकट, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, पेनसिलवेनिया, डेलावियर, मेरीलैंड, वर्जीनिया, उत्तरी केरोलिना, दक्षिणी केरोलिना, जार्जिया। भौगोलिक दृष्टि से इन अमेरिकी उपनिवेशों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- उत्तरी भाग में स्थित मेसाचुसेट्स, न्यू हैम्पशायर एवं रोड्स द्वीप पहाड़ी तथा बर्फीले क्षेत्र थे और खेती के लायक नहीं थे। इंग्लैंड को यहाँ से मछली और लकड़ी प्राप्त होती थी। मध्य भाग में न्यूयार्क, न्यूजर्सी, मैरीलैंड आदि थे, जहाँ शराब और चीनी जैसे उद्योग थे। दक्षिणी भाग में उत्तरी कैरोलिना, दक्षिणी कैरोलिना, जॉर्जिया, वर्जीनिया आदि थे। इस भाग की जलवायु गर्म थी, इसलिए यहाँ मुख्यतः अनाज, गन्ना, तंबाकू, कपास और बागानी फसलों का उत्पादन होता था। इन उपनिवेशों का शासन अटलांटिक महासागर के पार से ब्रिटिश राजा तथा अंग्रेजी संसद द्वारा होता था।

आर्थिक शोषण की ब्रिटिश नीति

16वीं शताब्दी में उपनिवेशों की स्थापना का मुख्य कारण वाणिज्यवाद था। अमेरिका में उपनिवेश स्थापित करने में इंग्लैंड के तीन मुख्य कारण थे- प्रथम, इंग्लैंड को बढती आबादी के लिए नवीन प्रदेश प्राप्त करना; दूसरे, इंग्लैंड के उद्योगों के लिए उपनिवेशों से कच्चा माल प्राप्त करना तथा तैयार माल के लिए बाजार प्राप्त करना, और तीसरे, इंग्लैंड में जिन्हें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी वे ऐसे स्थान पर जाकर रहना चाहते थे जहाँ वे स्वतंत्रतापूर्वक अपने धर्म का पालन कर सकें।

उपनिवेशों को मातृदेश की समृद्धि का साधन समझा जाता था। इन उपनिवेशों से मातृदेश कच्चा माल प्राप्त करता था और मातृदेश की आवश्यकता के अनुसार ही उपनिवेशों को उत्पादन करना पड़ता था। उपनिवेशों को मातृदेश में निर्मित माल को ही खरीदना पड़ता था। इस प्रकार तैयार माल वे अपने यहाँ सुविधा होते हुए भी नहीं बना सकते थे। वे अपना कच्चा माल मूल्य अधिक मिलने पर भी दूसरे देशों को नहीं बेच सकते थे और दूसरे देशों से तैयार माल सस्ता होने पर भी नहीं मँगा सकते थे।

इंग्लैंड के राजनीतिज्ञों का विचार था कि इंग्लैंड की आर्थिक समृद्धि के लिए उपनिवेशों पर नियंत्रण आवश्यक था। अतः इंग्लैंड ने उपनिवेशों का आर्थिक शोषण करने के लिए आर्थिक नियंत्रण की सुविचारित नीति अपनाई। उसका विचार था कि उपनिवेशों का इंग्लैंड के प्रति तीन कर्तव्य थे- प्रथम, वे इंग्लैंड के लिए उन वस्तुओं का उत्पादन करें जो इंग्लैंड में उत्पन्न नहीं होतीं। दूसरे, वे इंग्लैंड की वस्तुओं से स्पर्धा करके इंग्लैंड को हानि न पहुँचायें और उनके प्रतिस्पर्द्धी देशों को समृद्धिशाली न बनायें। तीसरे, वे प्रशासन, सेना और नौसेना के व्यय का भार वहन करें। इस प्रकार मातृदेश का उद्देश्य उपनिवेशों का शोषण करना था।

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के कारण

अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम मुख्यतः ग्रेट ब्रिटेन और उसके 13 उपनिवेशों के बीच आर्थिक हितों का संघर्ष था, किंतु कई तरीकों से यह सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह भी था। जिस प्रकार यूरोप में पुनर्जागरण, धर्मसुधार और राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ, उसी प्रकार अमेरिका में भी बौद्धिक क्रांति हुई और स्वतंत्रता तथा राष्ट्रवाद का विकास हुआ था। इस स्वातंत्र्य आंदोलन के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार थे-

उपनिवेशों की दोषपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था: औपनिवेशिक शासन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार गवर्नर की नियुक्ति करती थी, जो ब्रिटिश सरकार के प्रति उत्तरदायी होता था। यद्यपि प्रत्येक उपनिवेश में गवर्नर को सलाह देने के लिए निर्वाचित विधान सभा होती थी, किंतु उपनिवेशों के लिए कानून बनाने का अधिकार ब्रिटिश पार्लियामेंट को था। उपनिवेशों की विधान सभाएँ इंग्लैंड की पार्लियामेंट के समान यह दावा करती थीं कि उसकी स्वीकृति के बिना न तो कोई कर उन पर लगाया जा सकता था और न ही कोई कानून उन पर लागू किया जा सकता था। अपनी नीतियों को स्वीकार कराने के लिए वे गवर्नरों पर दबाव डालती थीं, किंतु कानूनों को स्वीकार करना अथवा रद्द करने का पूर्ण अधिकार गवर्नर को था।

उपनिवेशों में अन्य संस्थाएँ इंग्लैंड के अनुकरण पर स्थापित की गई थीं, जैसे- न्याय व्यवस्था समान कानून और जूरी प्रणाली पर आधारित थी। इन उपनिवेशों में रहने वाले प्रवासी अंग्रेजों में अधिकांश प्यूरिटन धर्म के अनुयायी थे जो अपने स्वतंत्रता के अधिकारों के प्रति अत्यंत जागरुक थे और केंद्रीकृत सत्ता के विरोधी थे। अतः इस व्यवस्था से उपनिवेशों की जनता में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक था।

उपनिवेशों में प्रशासन के उच्च पदों पर इंग्लैंड से अधिकारी भेजे जाते थे। इंग्लैंड की सरकारों का विश्वास था कि उपनिवेश के लोग उच्च प्रशासनिक पदों के लिए योग्य नहीं थे। इंग्लैंड की सरकार इस प्रकार उपनिवेशों पर अपना नियंत्रण भी रखती थी, लेकिन उपनिवेश के लोग इसे अपने लिए अपमानजनक समझते थे। वे अपने राज्यों का प्रशासन स्वयं करना चाहते थे। उनका दृष्टिकोण था कि गवर्नर को इंग्लैंड के राजा के समान कम से कम हस्तक्षेप करना चाहिए।

इंग्लैंड के प्रति सद्भाव न होना: अमेरिका के उपनिवेशों में इंग्लैंड से जो लोग जाकर बसे थे, उनमें इंग्लैंड के प्रति सद्भावना नहीं थी। जेम्स प्रथम के काल में धार्मिक अत्याचारों से क्षुब्ध होकर प्यूरिटन लोग, जिन्हें ‘पिलग्रिम फॉदर्स’ कहा गया, अमेरिका गये थे। वे कैथोलिकों अथवा एंग्लिकन धर्मों के समान विशप व्यवस्था और चर्च के आधिपत्य में विश्वास नहीं रखते थे। वे अति नैतिकतावादी तथा स्वतंत्र विचारों के थे। वे मातृदेश से संबंध बनाये रखने के पक्ष में नहीं थे। उनमें इंग्लैंड की अपेक्षा अधिक राजनीतिक जागृति थी और अपने अधिकारों के प्रति भी उनमें अधिक सतर्कता थी। इसी प्रकार डिसेंटरों तथा कैथोलिकों ने भी धार्मिक अत्याचारों के कारण इंग्लैंड को छोड़ा था। उन्हें इंग्लैंड में धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। कैथोलिकों को टेस्ट एक्ट आदि अयोग्यताओं का सामना करना पड़ता था। अमेरिका में कोई स्थापित चर्च नहीं था और इन अंग्रेज प्रवासियों को आशा थी कि वे अमेरिका में स्वतंत्रता से रह सकेंगे और अपने धर्म का पालन कर सकेंगे। इन कारणों से उनके मन में इंग्लैंड के प्रति सदैव कटु भावना बनी रही। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अमेरिकन उपनिवेशों में अपने परिश्रम से कृषि, उद्योग स्थापित किया था और असीम कष्टों को उठाकर अमेरिका गये थे। उन्हें इन सभी कार्यों में इंग्लैंड की सरकार से कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई थी। इन कारणों से भी उनमें इंग्लैंड के प्रति कटुता की भावना बनी रही।

स्वातंत्र्य चेतना की अंग्रेजी परंपरा: अमेरिका के उपनिवेशों में इंग्लैंड के प्रवासी बहुसंख्या में थे, जो इंग्लैंड के नागरिकों के अपेक्षा कहीं अधिक स्वातंत्र्य-प्रेमी थे क्योंकि यहाँ का समाज यूरोप की तुलना में कहीं अधिक समतावादी था। अमेरिकी समाज की खास विशेषता थी-सामंतवाद एवं अटूट वर्ग सीमाओं की अनुपस्थिति। अमेरिकी समाज में उच्चवर्ग के पास राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति ब्रिटिश समाज की तुलना में अत्यंत कम थी। वस्तुतः अमेरिका में अधिकांश किसानों के पास जमीन थी जबकि ब्रिटेन में सीमांत काश्तकारों एवं भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की संख्या ज्यादा थी। उनकी अपनी राजनीति संस्थाएँ थी। अमेरिकी उपनिवेशों में आरंभ से ही स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान थी जो समय के साथ विकसित होती गई। उपनिवेश के निवासी भी उन स्वतंत्रताओं को प्राप्त करना चाहते थे जो इंग्लैंड में अंग्रेजों को प्राप्त थीं। उनका कहना था कि वे भी अंग्रेज थे और उन्हें भी वे स्वतंत्रताएँ मिलनी चाहिए।

सामाजिक भिन्नता: अंग्रेजी समाज और अमेरिकी समाज एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न थे। आंग्ल समाज प्राचीन, विस्तृत एवं कृत्रिम था, जबकि अमेरिकी समाज नवीन, प्रगतिशील तथा स्वतंत्र विचारों का था। प्रवासियों में सामान्य रूप से मध्यम तथा निम्न वर्गों के लोग थे। उनमें इंग्लैंड के समान वंशानुगत कुलीनों, जैसे- लॉर्ड, ड्यूक आदि नहीं थे। उपनिवेश के नगरों में दुकानदार और नाविकों का प्रभाव था। उपनिवेशों में स्वतंत्र भूस्वामी वर्ग था, जो किसी सामंत की अधीनता में नहीं थे। उपनिवेशों में भूमिहीन मजदूर या निर्धन कृषक वर्ग नहीं था। उपनिवेशों में विशाल मात्रा में भूमि उपलब्ध थी और इंग्लैंड से आने वाले प्रवासी विशाल भू-क्षेत्रों पर अधिकार कर लेते थे। इस प्रकार उपनिवेशों के कृषक आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र विचारों के थे। उनके राजनीतिक विचार इंग्लैंड के कृषकों की अपेक्षा अधिक प्रगतिशील थे। इस प्रकार उपनिवेशों का सामाजिक संगठन प्रगतिशील और स्वतंत्र विचारों का था।

भौगोलिक कारण: उपनिवेशों के प्रवासियों में भौगोलिक कारणों से भी स्वतंत्रता तथा आत्मनिर्भरता की भावनाओं का विकास हुआ था। ये उपनिवेश मातृदेश इंग्लैंड से बहुत दूर थे। उन दिनों पाल से चलने वाले जहाजों की धीमी गति के कारण यातायात धीमा था और अटलांटिक महासागर को पार करने में बहुत समय लगता था। प्राकृतिक प्रकोपों से भी यातायात में बाधा पड़ती थी। ऐसी स्थिति में उपनिवेशों के प्रशासन पर इंग्लैंड का पूरा नियंत्रण नहीं हो सकता था। इसके अतिरिक्त, स्टुअर्ट राजा अपनी पार्लियामेंटों से झगड़ा करने तथा अपनी निरंकुश सत्ता स्थापित करने में ज्यादा व्यस्त रहे और उन्होंने उपनिवेशों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। इससे उपनिवेशों के प्रशासन की उपेक्षा हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि उपनिवेशों के प्रवासी लोग अपना शासन अपनी इच्छानुसार चलाने के अभ्यस्त हो गये और अब वे अपने प्रशासन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

सप्तवर्षीय युद्ध: उत्तरी अमेरिका में क्यूबेक से लेकर मिसीसिपी घाटी तक फ्रांसीसी उपनिवेश फैले हुए थे। इस क्षेत्र में ब्रिटेन और फ्रांस के हित टकराते थे। फलतः 1756-63 के बीच दोनों के बीच सप्तवर्षीय युद्ध हुआ और इसमें इंग्लैंड विजयी रहा तथा कनाडा स्थित फ्रांसीसी उपनिवेशों पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप अमेरिका में उत्तर से फ्रांसीसी खतरा खत्म हो गया। युद्ध काल में उपनिवेशों की आबादी और समृद्धि में काफी वृद्धि हुई, जिससे उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ था। हजारों रंगरूटों ने इंग्लैंड की सेना में भी भाग लिया था और युद्धों में विजय प्राप्त की थी। 1754 में सात उपनिवेशों ने मिलकर संघ बनाने का भी विचार किया था। इस परिवर्तित स्थिति में उपनिवेशवासियों की इंग्लैंड पर निर्भरता समाप्त हो गई। इससे अमेरिका का स्वाधीनता युद्ध अवश्यंभावी हो गया।

दूसरा परिणाम यह हुआ कि इंग्लैंड ने उत्तरी अमेरिका में मिसीसिपी नदी से लेकर अलगानी पर्वतमाला तक के क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले लिया। फलतः अमेरिकी बस्ती के निवासी अपनी सीमाएँ अब पश्चिमी की ओर बढ़ाना चाहते थे और इस क्षेत्र में रहने वाले मूल निवासी ‘रेड इंडियन्स’ को खदेड़ देना चाहते थे। फलतः वहाँ संघर्ष हुआ। इंग्लैंड की सरकार ने 1763 में एक शाही घोषणा द्वारा फ्लोरिडा, मिसीसिपी आदि पश्चिमी के क्षेत्र रेड इंडियन्स के लिए सुरक्षित कर दिया। इससे उपनिवेशवासियों का पश्चिमी की ओर प्रसार रूक गया और वे इंग्लैंड की सरकार को अपना शत्रु समझने लगे।

सप्तवर्षीय युद्ध के काल में उपनिवेशों में अस्त्र-शस्त्र तथा अन्य सामग्री बनने लगी जिससे उपनिवेशों को सैनिक शक्ति में वृद्धि हुई। युद्ध काल में कृषक और श्रमिकों को पूरा लाभ और मजदूरी मिली, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और उनमें राजनीतिक चेतना उत्पन्न हुई। युद्ध समाप्त होने के बाद आर्थिक संकट, बेरोजगारी, करों के भार में वृद्धि हुई। इसलिए जब इंग्लैंड की सरकार ने करों में वृद्धि करना चाहा तब उपनिवेशों ने विद्रोह कर दिया क्योंकि वे समझते थे कि उनके आर्थिक संकट का हल स्वतंत्रता थी।

इसके अतिरिक्त, सप्तवर्षीय युद्ध के दौरान इंग्लैंड को बहुत अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ी थी जिसके कारण इंग्लैंड को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। अंग्रेज राजनीतिज्ञों का मानना था कि इंग्लैंड ने उपनिवेशों की रक्षा हेतु धन खर्च किया है, इसलिए उपनिवेशों को इंग्लैंड को और अधिक कर देने चाहिए। यही कारण है कि पहले से लागू जहाजरानी कानून, व्यापारिक कानून, सुगर एक्ट आदि कड़ाई से लागू किये गये। किंतु उपनिवेशवासी नये करों के भुगतान के लिए तैयार नहीं थे। इस प्रकार सप्तवर्षीय युद्ध ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के सूत्रपात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बौद्धिक चेतना का विकास: उपनिवेशों में जीवन के स्थायित्व के साथ ही शिक्षा और पत्रकारिता का विकास हुआ जिसने बौद्धिक चेतना के विकास में अपना योगदान दिया। 1637 में मैसाचुसेट्स के कैंब्रिज नगर में हार्वर्ड कॉलेज की स्थापना हुई। 1639 में वर्जीनिया में विलियम एंड मैरी कॉलेज शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र बन गया। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक विचार-केंद्र की स्थापना की, जो बाद में अमेरिकन फिलोसॉफिकल सोसायटी के नाम से विख्यात हुआ। 1704 में ‘पोस्ट न्यूज़लेटर’ नामक पहला समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ। टॉमस पेन की किताब ‘कॉमनसेंस’ ने अमेरिका में राष्ट्रवादी विचारों को बढ़ावा दिया। अमेरिका के अनेक बुद्धिजीवियों जैसे- बेंजामिन फ्रैंकलिन, थॉमस जेफरसन, जेम्स विल्सन, जॉन एडम्स, टॉमस पेन, जेम्स ओटिस, सैमुअल एडम्स आदि ने जॉन लॉक, मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो जैसे चिंतकों के विचारों का उपनिवेशों में प्रसार किया जिससे उपनिवेशों में बौद्धिक चेतना जाग्रत हुई और स्वशासन की माँग को बल मिला।

आर्थिक शोषण की नीतियाँ: इंग्लैंड द्वारा उपनिवेशों का आर्थिक शोषण, उपनिवेशों और मातृदेश के बीच असंतोष का मुख्य कारण था। वाणिज्यवाद के सिद्धांतों के प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार की धारणा थी कि, ‘उपनिवेश इंग्लैंड को लाभ पहुँचाने के लिए हैं।’ प्रचलित वाणिज्यवादी सिद्धांत के अनुसार इंग्लैंड उपनिवेशों के व्यापार पर नियंत्रण रखना चाहता था और उनके बाजारों पर एकाधिकार रखना चाहता था। इंग्लैंड की सरकार और जनता यह मानती थी कि उपनिवेश उन वस्तुओं का उत्पादन करें, जिसकी इंग्लैंड को आवश्यकता थी और मातृदेश की वस्तुओं से स्पर्धा करके उसे हानि न पहुँचाये। इंग्लैंड यह भी चाहता था कि उपनिवेश सेना, नौसेना तथा प्रशासन का व्यय भी उठाये। इंग्लैंड ने इस नीति को क्रियान्वित करने के लिए समय-समय पर नेवीगेशन कानूनों, व्यापारिक एवं औद्योगिक अधिनियमों द्वारा इन उपनिवेशों पर कठोर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इंग्लैंड में आयात की जाने वाली वस्तुएँ इंग्लैंड या उपनिवेशों के जहाजों में ही लाई जा सकती थीं। उपनिवेश अपना माल इंग्लैंड को दूसरे देशों के जहाजो में नहीं भेज सकते थे। यद्यपि यह कानून डच लोगों के विरुद्ध बताया गया था, लेकिन इससे उपनिवेशों के हितों को हानि पहुँची। अब वे अपना माल दूसरे देश के सस्ते जहाजों में नहीं भेज सकते थे। इन कानूनों के अनुसार उपनिवेश शक्कर, तंबाकू, कपास, ऊन, नील, रंग आदि वस्तुओं का निर्यात केवल इंग्लैंड को ही कर सकते थे। दूसरे शब्दों में, उपनिवेशों को कम दामों पर इन वस्तुओं को इंग्लैंड को बेचना पड़ता था और ऊँचे दाम मिलने पर भी उपनिवेश इनका निर्यात दूसरे देशों को नहीं कर सकते थे। उपनिवेशों पर यह भी प्रतिबंध था कि वे अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ केवल इंग्लैंड से ही मँगा सकते थे। दूसरे देशों में ये वस्तुएँ भले ही कम मूल्यों पर उपलब्ध थीं, वे नहीं मँगा सकते थे। इसके अलावा, जिन औद्योगिक वस्तुओं को इंग्लैंड में तैयार किया जाता था, उन वस्तुओं को अमेरिकी उपनिवेशों में तैयार करने की अनुमति नहीं थी। इस प्रकार 1689 के कानून द्वारा उपनिवेशों से ऊनी माल और टोपियों का निर्यात बंद कर दिया गया।

यद्यपि नेवीगेशन कानून तथा आर्थिक व व्यापारिक प्रतिबंध उपनिवेशों के लिए हानिकारक थे और इनके विरुद्ध उपनिवेशों में असंतोष था, फिर भी उपनिवेशों ने 1765 तक अपने असंतोष को दबा कर रखा। इसके कई कारण थे। एक तो इनको ह्विग पार्टी के शासनकाल में सख्ती से लागू नहीं किया गया था, दूसरे, उत्तरी अमेरिका (कनाडा) में फ्रांस के उपनिवेश थे, जो अंग्रेजी उपनिवेशों पर आक्रमण कर सकते थे। उन्हें इंग्लैंड से सुरक्षा की आवश्यकता थी। तीसरे, उपनिवेशों के निवासियों में एकता का अभाव था और वे एक होकर मातृदेश इंग्लैंड पर दबाव नहीं डाल सकते थे। बाद में जब सप्तवर्षीय युद्ध के बाद फ्रांस का भय समाप्त हो गया और जॉर्ज तृतीय के काल में विभिन्न करों को लगाकर उन्हें सख्ती से वसूलने का प्रयास किया गया तो उपनिवेशों में असंतोष पनपा और यही असंतोष बाद में क्रांति में बदल गया।

ग्रेनविल की नीतियाँ: जार्ज तृतीय 1760 में इंग्लैंड के सिहासन पर बैठा। उसने 1763 में लॉर्ड ग्रेनविल को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। ग्रेनविल ने टोरियों की नीति के अनुसार आर्थिक और व्यापारिक कानूनों को कड़ाई से लागू करने का प्रयास किया। दरअसल सप्तवर्षीय युद्ध के कारण 1763 में इंग्लैंड का उसका राष्ट्रीय ऋण 1,400 करोड़ पौंड हो गया था। जार्ज तृतीय और ग्रेनविल का मानना था कि युद्ध उपनिवेशों की रक्षा के लिए लड़ा गया था, इसलिए युद्ध-व्यय का कुछ भार उपनिवेशों को उठाना चाहिए। फ्रांस से मिसीसिपी क्षेत्र ले लिया गया था, जिससे इंग्लैंड का रक्षा-संबंधी उत्तरदायित्व बढ़ गया था। इसके अतिरिक्त, क्षेत्रों का विस्तार होने के कारण उपनिवेशों के प्रशासनिक व्यय में भी वृद्धि हो गई थी। नवीन प्राप्त क्षेत्रों का प्रशासनिक व्यय 3,50,000 पौंड वार्षिक था। ग्रेनविल का मानना था कि इस व्यय का भार उपनिवेशों को उठाना चाहिए। आर्थिक संकट को हल करने के लिए उसने उपनिवेशों से आय और उन पर होने वाले व्यय की जाँच की और यह निष्कर्ष निकाला कि यदि उपनिवेश प्रतिवर्ष 1,50,000 पौंड दें, तो तात्कालिक समस्याएँ हल हो सकती थीं। उसने आर्थिक संकट से निपटने के लिए जहाजरानी कानूनों की सख्ती से लागू करने और उपनिवेशों पर प्रत्यक्ष कर लगाने के लिए कुछ ऐसे कदम उठाये, जिससे उपनिवेशों में असंतोष की आग भड़क उठी-

  1. ग्रेनविल ने 1764 में शुगर अधिनियम लागू किया जो 1733 के शीरा अधिनियम का परिष्कृत रूप था। इस कानून के द्वारा इंग्लैंड के अतिरिक्त अन्य देशों से आने वाली विदेशी रम का आयात बंद कर दिया गया और शीरे पर आयात कर बढ़ा दिया गया। दूसरी तरफ, शराब, रेशम, कॉफी आदि अन्य वस्तुओं पर भी कर लगा दिया गया। वास्तव में उपनिवेशों में शीरा अधिनियम पहले से लागू था, लेकिन तस्करी के कारण यह कर बहुत कम वसूल हो पाता था। ग्रेनविल ने इस कर को आधा कर दिया, लेकिन इसकी वसूली के लिए कठोर नियम बनाये और नेवीगेशन कानूनों को कठोरता से लागू किया। इससे उपनिवेशों में असंतोष फैल गया
  2. तस्करों को दंडित करने के लिए ग्रेनविल ने ‘एडमिरेल्टी कोर्ट’ की स्थापना की। इससे उपनिवेशों का तस्कर व्यापार बंद हो गया और इंग्लैंड विरोधी भावनाओं का प्रसार हुआ। ग्रेनविल ने कागज-पत्रों को पढ़कर ही इस चोरी का पता लगाया था, इसलिए कहा जाता है कि ‘ग्रेनविल के द्वारा कागज-पत्रों को पढे जाने के कारण ही इंग्लैंड ने अमरीका को खो दिया।’
  3. ग्रेनविल ने करेंसी एक्ट 1765 के अनुसार अमेरिकी उपनिवेशों में दूसरे देशों के साथ प्रचलित मुद्राओं पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे केवल अंग्रेजी मुद्रा का ही प्रयोग हो सकता था।
  4. ग्रेनविल ने उपनिवेशों की रक्षा के लिए उत्तरी अमेरिका में एक स्थायी सेना रखने की घोषणा की थी। उसने 1765 में क्वार्टरिंग ऐक्ट बनाया और अमेरिका में मौजूद ब्रिटिश सेना के व्यय का 1/3 भाग उपनिवेशों को देने को कहा गया। इससे उपनिवेशों के निवासी भड़क उठे।

इसके अलावा, ग्रेनविल ने एक घोषणा द्वारा पश्चिम के मिसीसिपी के नव-प्राप्त क्षेत्र में बड़े-बड़े क्षेत्र रेड इंडियनों के लिए सुरक्षित कर दिया और प्रवासी अंग्रेजों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे उपनिवेशों के कृषकों तथा श्रमिकों में रोष फैल गया, क्योंकि वे इस क्षेत्र में जाकर बसना चाहते थे।

उपनिवेश स्वेच्छा से इंग्लैंड को कोई भी आर्थिक सहयोग देने के लिए तैयार नहीं थे। अतः ग्रेनविल ने 1765 में उपनिवेशों पर स्टाम्प कर लगा दिया। इसके अनुसार सभी सरकारी दस्तावेजों आदि पर सरकारी टिकट लगाना अनिवार्य कर दिया गया। उपनिवेशों के आंतरिक प्रशासन पर लगने वाला यह पहला कर था। उपनिवेशों ने इस कर का सैद्धांतिक आधार पर विरोध किया कि ब्रिटिश सरकार को आंतरिक प्रशासन पर कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है। फलतः उपनिवेशों ने स्टाम्प कर का विरोध करना आरंभ कर दिया। स्टाम्प एक्ट के विरोध में अक्टूबर, 1765 में न्यूयार्क में नौ उपनिवेशों ने कांग्रेस का अधिवेशन किया और ‘स्वाधीनता के पुत्र तथा पुत्रियाँ’ नामक संस्था का गठन किया। उपनिवेशों ने नारा दिया कि ‘प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं’ अर्थात् इंग्लैंड की संसद जिसमें अमेरिकी नहीं बैठते, उसे कर लगाने का अधिकार नहीं है। वर्जीनिया में इसका विरोध हेनरी वर्गिस तथा अन्य क्षेत्रों में पेट्रिक हैनरी ने किया। इस समय पेट्रिक हैनरी ने आह्वान किया कि ‘स्वतंत्रता दो या तो मृत्यु दो।’ अंततः उपनिवेशों की बहिष्कार की नीति के कारण ग्रेनविल मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया और उपनिवेशवासियों को संतुष्ट करने के लिए 1766 में स्टाम्प कर समाप्त कर दिया, किंतु ब्रिटिश सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश पार्लियामेंट को उपनिवेशों पर कर लगाने का पूरा-पूरा अधिकार है। इंग्लैंड की इस घोषणा पर उपनिवेशों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

प्रशा का उत्थान और फ्रेडरिक महान

टाउनसैंड की नई कार्य-योजना: 1767 में इंग्लैंड में विलियम पिट की सरकार बनी और टाउनसैंड वित्तमंत्री बना। उसने 1767 में आयात-कर अधिनियम पारित कर पाँच वस्तुओं- चाय, सीसा, कागज, सिक्का, रंग और धातु पर सीमा-शुल्क लगा दिया, जिसका आयात अमेरिका इंग्लैंड से करता था। इनका उल्लंघन करने वालों के लिए बिना जूरी के मुकदमा चलाने की व्यवस्था की गई थी। उपनिवेशों ने इन बाह्य करों का विरोध किया और तर्क दिया कि वे अंग्रेजी संसद के द्वारा लगाये गये किसी भी कर का भुगातन नहीं करेंगे। इसी के साथ अमेरिका में इन अधिनियमों के खिलाफ व्यापक विरोध आरंभ हो गया और ब्रिटिश आयात का पूर्ण बहिष्कार शुरू हो गया।

युद्ध का तात्कालिक कारण

लॉर्ड नार्थ की चाय नीति: अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण ब्रिटिश सरकार की चाय नीति थी। सम्राट जार्ज तृतीय ने 1771 में लॉर्ड नार्थ को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। लॉर्ड नार्थ ने ईस्ट इंडिया कंपनी को वित्तीय संकट से उबारने के लिए 1773 में चाय नीति की घोषणा की। इस नीति के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी को अब अमेरिका स्थित ब्रिटिश उपनिवेशों में अपने जहाजों के माध्यम से सीधे चाय भेजने की अनुमति मिल गई। अब कंपनी के जहाजों को इंग्लैंड के बंदरगाहों पर आने और चुंगी देने की आवश्यकता नहीं थी। इसका लक्ष्य था कंपनी को घाटे से बचाना और अमेरिकी लोगों को सस्ती चाय उपलब्ध कराना। लेकिन अमेरिकी उपनिवेशों को सिद्धांत रूप में यह स्वीकार नहीं था कि ब्रिटिश सरकार ‘सस्ती चाय’ के माध्यम से बाह्य कर लगाने के अपने अधिकार को बनाये रखे। अतः पूरे देश में चाय योजना के विरूद्ध आंदोलन शुरू हो गया।

इस बीच ब्रिटिश सरकार ने तस्कर व्यापार को रोकने के लिए बोस्टन में 2 सैनिक टुकड़ियों को तैनात कर दिया। 5 मार्च, 1770 को ब्रिटिश सैनिक टुकड़ियों और संस ऑफ लिबर्टी के बीच एक हिंसक झड़प हो गई जिसमें ब्रिटिश सैनिकों की गोली से पाँच व्यक्तियों की मौत हो गई। उपनिवेशों ने इसे ‘बोस्टन हत्याकांड’ की संज्ञा दी और ब्रिटिश सेना को तत्काल हटाने की माँग की।

बोस्टन टी पार्टी: लॉर्ड नार्थ की चाय नीति के विरोध में 16 दिसंबर, 1773 की रात्रि को सैमुअल एडम्स के नेतृत्व में संस ऑफ़ लिबर्टी के सदस्य कुलियों के भेष में बोस्टन बंदरगाह पर खड़े ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों पर चढ़ गये और चाय से भरी हुई 340 पेटियों को समुद्र में फेंक दिया। अमेरिकी इतिहास में इस घटना को ‘बोस्टन टी पार्टी’ कहा गया है।

बोस्टन टी पार्टी ब्रिटिश सरकार के लिए एक कड़ी चुनौती थी। अतः ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी उपनिवेशवासियों को सजा देने के लिए पाँच कठोर एवं दमनकारी कानून बनाये। बोस्टन का बंदरगाह बंद कर दिया गया; मेसाचुसेट्स उपनिवेश का स्वशासन का अधिकार छीन लिया गया; अपराधी अधिकारियों पर इंग्लैंड या दूसरे उपनिवेश में मुकदमा चलाने की व्यवस्था की गई। मेसाचुसेट्स विधान सभा के सदस्यों ने दूसरे स्थान पर अपनी बैठक की, एक मिलीशिया का गठन किया और युद्ध-सामग्री एकत्रित की। इसी समय टॉमस पेन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कामनसेंस’ प्रकाशित की, जिसमें इंग्लैंड की कड़े शब्दों में निंदा की गई और कहा गया था कि ‘यही अलविदा करने का समय है।’

प्रतिक्रियावादी युग का महान नायक: मेटरनिख

पहली महाद्वीपीय कांग्रेस: ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गये नवीन दमनात्मक कानूनों का अमेरिकी उपनिवेशों में जमकर विरोध किया। इनका उद्देश्य मेसाचूसेट्स को दबाना था। वजीर्निया की पहल पर सभी उपनिवेशों का फिलाडेल्फिया में एक सम्मेलन बुलाया गया। 5 सितंबर, 1774 को फिलाडेल्फिया में पहली महाद्वीपीय कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ, जिसमें जॉर्जिया को छोड़कर सभी उपनिवेशों की विधानसभाओं के प्रतिनिधि थे। प्रतिनिधियों में मेसाचूसेट्स के जॉन एडमस तथा सेम्युअल एडम्स, वर्जीनिया के जॉर्ज वाशिंगटन तथा पैट्रिक हेनरी, दक्षिणी केरोलिना के जॉन रूटलेज, क्रिस्टोफर गेडस्टेन, रोड आइलैंड के स्टीफन हॉपकिंस, पेन्सिलवेनिया के जॉन डिकिंसन आदि प्रमुख थे। सम्मेलन का उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य की माँग नहीं, आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वेच्छा का अधिकार प्राप्त करना था।

अधिवेशन के निर्णयानुसार कांग्रेस ने सैनिक तैयारी के साथ-साथ एक प्रार्थना-पत्र ‘ऑलिवर ब्रांच पेरिशन’ के नाम से जार्ज तृतीय के पास इंग्लैंड भेजा। यह एक प्रकार से अधिकारों और शिकायतों की घोषणा थी, जिसमें 1765 के बाद के सभी कानूनों को निरस्त करने और उपनिवेशों में स्वशासन बहाल करने की माँग की गई थी। इसके साथ ही धमकी के रूप में अंग्रेजी सामानों के बहिष्कार का निर्णय भी लिया गया था।

किंतु इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज तृतीय ने अमेरिकी उपनिवेशों के प्रस्तावों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उपनिवेशों के विरुद्ध 30,000 सैनिकों की सेना भेज दी, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार और उपनिवेशवासियों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया।

लॉर्ड विलियम बैंटिंक

स्वतंत्रता-संग्राम की मुख्य घटनाएँ

सम्राट जॉर्ज तृतीय की हठधर्मिता के कारण उपनिवेशों की सामूहिक प्रार्थना अस्वीकार कर दी गई, इसलिए फिलाडेल्फिया की कांग्रेस ने 1775 में इंग्लैंड के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

लेक्सिंगटन का युद्ध: अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का आरंभ 19 अप्रैल, 1775 को लेक्सिंगटन के युद्ध से हुआ। बोस्टन के निकट लेक्सिंगटन में मेसाचुसेट्स की मिलीशिया ने बोस्टन के गवर्नर द्वारा भेजी गई सेना पर आक्रमण कर दिया। इसमें हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका। कुछ दिनों बाद मिलीशिया ने बोस्टन नगर को घेर लिया।

द्वितीय कांग्रेस और स्वतंत्रता की घोषणाः उपनिवेशों ने फिलाडेल्फिया में 1776 में पुनः दूसरी महाद्वीपीय कांग्रेस बुलाई और सभी प्रांतों को मिलाकर ‘संयुक्त राज्य अमरीका’ नाम दिया। कांग्रेस ने महसूस किया कि संघर्ष में विदेशी सहायता लेना आवश्यक है और यह तब संभव नहीं जब तक अमेरिका इंग्लैंड से अपना संबंध विच्छेद नहीं कर लेता। 7 जून, 1776 को वर्जीनिया के रिचर्ड हेनरी ली ने कांग्रेस में यह प्रस्ताव रखा कि उपनिवेशों को स्वतंत्र होने का अधिकार है। इस प्रस्ताव पर वाद-विवाद के उपरांत ‘स्वतंत्रता की घोषणा’ तैयार करने का कार्य वर्जीनिया के टॉमस जेफर्सन को सौंपा गया। 4 जुलाई, 1776 को सभी राज्यों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से ‘स्वतंत्रता का घोषणा-पत्र’ जारी किया। इस घोषणा में कहा गया था कि, ‘ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। ईश्वर ने उन्हें कुछ ऐसे अधिकार दिये हैं, जिन्हें उनसे कोई छीन नहीं सकता। इन अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता और सुख के लिए प्रयत्न शामिल हैं।’ इस प्रकार ब्रिटेन के 13 उत्तर अमेरिकी उपनिवेशों ने 4 जुलाई, 1776 को स्वयं को ब्रिटेन से स्वतंत्र घोषित कर लिया। स्वतंत्रता की घोषणा के बाद उपनिवेशों की महाद्वीपीय कांग्रेस ने वाशिंगटन को अपना सेनापति नियुक्त किया और निश्चय किया कि सभी उपनिवेश मिलकर एक साथ कार्यवाही करेंगे।

आंग्ल-सिख युद्ध और पंजाब की विजय

अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम (America's War of Independence)
अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा’

बंकर हिल का युद्ध: वाशिंगटन के नेतृत्व में संयुक्त सेना ने बोस्टन के पास बंकर हिल पर ब्रिटिश सेना का सामना किया, किंतु इस युद्ध में वाशिंगटन को पराजित होकर पीछे हटना पड़ा। इसका कारण यह था कि उपनिवेशों की सेना अभी पूर्ण रूप से संगठित नहीं हुई थी। ब्रिटिश सेना ने फिलाडेल्फिया, न्यूयार्क, चार्ल्सटन बंदरगाहों पर अधिकार कर लिया।

ब्रुकलिन का युद्ध: यद्यपि जॉर्ज वाशिंगटन के पास सीमित संसाधन थे, किंतु उसने धैर्य और सूझबूझ से काम लिया। उसने सेना के संगठन और प्रशिक्षण पर पूरा ध्यान दिया और कनाडा को अपनी ओर मिलाने का असफल प्रयत्न किया। वाशिंगटन ने ब्रुकलिन के मैदानों में पुनः ब्रिटिश सेना का सामना किया, किंतु इस बार भी वह पराजित हुआ और उसे न्यूयार्क तथा न्यूजर्सी को खाली करना पड़ा।

उपनिवेशों की सेना लगातार हार से निराश होने लगी थी। अंग्रेज जनरल होय ने भागती हुई अमरीकी सेनाओं का पीछा किया। जॉर्ज वाशिंगटन ने सैनिकों का साहस बढ़ाया और जनरल होय को पीछे से घेरने के लिए कुछ सैनिक टुकड़ियों को भेज दिया। वाशिंगटन की इस रणनीति का परिणाम हुआ कि जनरल होय घबड़ाकर न्यूयार्क वापस लौट गया, जिससे उपनिवेशिक सेना में पुनः उत्साह की लहर दौड़ गई।

1777 में अंग्रेज जनरल बरगोयने ने कनाडा में एक सेना तैयार की और जनरल होय के साथ मिलकर फिलाडेल्फिया को घेर लिया। वाशिंगटन ने वीरतापूर्वक अंग्रेजों का सामना किया, किंतु उसे पराजित होकर फिलाडेल्फिया छोड़कर अपने सर्दियों के स्थान सूकिल के किनारे जाना पड़ा। इस समय वाशिंगटन और उनकी सेना कठिनाइयों के दौर से गुजर रही थी। उनके पास आवश्यक आवश्यकता की वस्तुएँ तक नहीं थीं। फिर भी, वाशिंगटन के समर्थक उसके साथ डटे रहे और शीघ्र ही उन्हें अपनी सफलता नजर आने लगी।

साराटोगा का युद्ध: उपनिवेशों को पहली महत्वपूर्ण सफलता साराटोगा के युद्ध में मिली। उपनिवेशों के एक जनरल गेट्स ने साराटोगा के युद्ध में ब्रिटिश सेनापति बरगोयने को 17 अक्टूबर, 1777 को हथियार डालने पर विवश कर दिया। इस पराजय से इंग्लैंड में घबड़ाहट फैल गई और लॉर्ड चैथम, जो पहले ही अमरीका से संधि करने के पक्ष में था, ने कहा, ‘तुम अमरीका को नहीं जीत सकते। मैं एक अंग्रेज हूँ लेकिन यदि मैं अमरीकी होता तो विदेशी आक्रमण के समय अपने हथियार न डालता, कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं।’

गुप्त युग का मूल्यांकन

उपनिवेशी सेना की साराटोगा विजय से इंग्लैंड के पुराने शत्रुओं को विश्वास हो गया कि अब इंग्लैंड की हार निश्चित है, इसलिए उन्होंने अपना हिसाब चुकता करने के लिए अमेरिकी उपनिवेशों का साथ देने का निर्णय किया। फ्रांस ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन में सहायता देकर सप्तवर्षीय युद्ध का बदला लेना चाहता था। बेंजामिन फ्रैंकलिन के सहयोग से 6 फरवरी, 1778 को अमेरिकी उपनिवेशों और फ्रांस में समझौता हो गया कि कोई भी अलग से इंग्लैंड के साथ शांति-वार्ता नहीं करेगा। जब तक अमेरिकी बस्तियाँ पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हो जाती, युद्ध जारी रखा जायेगा। 1778 में फ्रांस इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध में कूद पड़ा। 1779 में स्पेन भी इंग्लैंड के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी क्योंकि वह भी इंग्लैंड से जिब्राल्टर वापस लेना चाहता था। 1780 में हॉलैंड भी इंग्लैंड के विरूद्ध युद्ध में शामिल हो गया क्योंकि वह इंग्लैंड के नेवीगेशन कानूनों से असंतुष्ट था। रूस, डेनमार्क, स्वीडन और पर्शिया ने भी इंग्लैंड के विरुद्ध सशस्त्र तटस्थता की घोषणा कर दी। इस प्रकार अमेरिका का स्वातंत्र्य युद्ध विश्वयुद्ध बन गया।

इंग्लैंड की पराजय: स्पेन और फ्रांस ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में इंग्लैंड के अधिकृत क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया। फ्रांस ने अपना जहाजी बेड़ा और सेना अमेरिका भेजी, जिसने संयुक्त राज्यों की सेनाओं के साथ ब्रिटिश सेनाओं से युद्ध किया। अंत में अंग्रेजीं सेनाध्यक्ष लॉर्ड कार्नवालिस ने 19 अक्टूबर, 1781 को यार्कटाउन के युद्ध में आत्मसमर्पण कर दिया। इस समाचार को सुनकर इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लॉर्ड नॉर्थ के मुँह से निकला, ‘सब कुछ समाप्त हो गया।’ उसने त्यागपत्र दे दिया। रॉकिंघम प्रधानमंत्री बना और उसने उपनिवेशों से संधि की बातचीत शुरू की।

सिंध का विलय

फ्रांस ने भारत के, बंगाल के अतिरिक्त समस्त प्रांतों की माँग की। स्पेन ने जिबाल्टर की माँग की। आयरलैंड ने भी अपनी सेना तैयार कर ली। लग रहा था कि इंग्लैंड के साम्राज्य का पतन हो जायेगा, किंतु इंग्लैंड की नौसेना ने आशा बंधाई। दो साल तक युद्ध चलता रहा। वेस्टइंडीज के निकट अंग्रेजी जहाजी बेड़े ने फ्रांसीसी जहाजी बेड़े को पराजित कर दिया। फ्रांसीसी बेड़े की हार से अमरीका की विदेशी सहायता की उम्मीद टूट गई। अंततः 3 सितंबर, 1783 को पेरिस की संधि के द्वारा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम का अंत हो गया।

पेरिस की संधि: इंग्लैंड के राजनीतिज्ञों को स्पष्ट हो गया था कि अमरीकी उपनिवेश नाममात्र के लिए भी इंग्लैंड से संबंध नहीं रखना चाहते थे। इसलिए पेरिस की संधि के अनुसार इंग्लैंड ने तेरह उपनिवेशों वाले संयुक्त राज्य अमरीका को एक स्वतंत्र देश मान लिया। इसी के साथ वर्साय की संधि हुई। फ्रांस को इंग्लैंड से वेस्टइंडीज में सेंट लूसिया, टोबेगो, अफ्रीका में सेनेगाल व गोरी तथा भारत के कुछ क्षेत्र मिले। स्पेन को मैनोरिका और फ्लोरिडा वापस मिल गये।

क्या युद्ध अवश्यंभावी था?

कुछ लेखकों का अनुमान है कि इंग्लैंड और अमेरिकन उपनिवेशों के बीच युद्ध अनिवार्य नहीं था और इससे बचा जा सकता था। उपनिवेश आर्थिक व व्यापारिक स्वतंत्रता के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन पर अपना नियंत्रण चाहते थे। वे इंग्लैंड के राजा या पार्लियामेंट के विरोधी नहीं थे। इंग्लैंड में चैथम और बर्क जैसे राजनीतिक समझौते पर जोर दे रहे थे और उपनिवेशों की आकांक्षाओं का सम्मान करना चाहते थे। दुर्भाग्य से, जार्ज तृतीय निरंकुश सत्ता में विश्वास रखता था और प्रजा के विद्रोहों को कठोरता से कुचलने की नीति का पक्षधर था। उसने अमेरिकन उपनिवेशों की जनता और इंग्लैंड की अपनी प्रजा में भेद नहीं समझा। यही दृष्टिकोण विनाशकारी सिद्ध हुआ। उसके समय के अन्य राजनीतिज्ञों, जैसे- ग्रेनविल और लॉर्ड नॉर्थ में दूरदर्शिता नहीं थीं। उन्होंने राजा की इच्छा के पालन में ही अपना कर्तव्य समझा। पार्लियामेंट के सदस्य भी स्थिति की गंभीरता को समझने में असफल रहे।

कुछ विद्वानों का मानना है कि उपनिवेश स्वतंत्रता चाहते थे और यदि इस समय संघर्ष टल भी जाता तो बाद में फिर कभी यही स्थिति उत्पन्न हो जाती। किंतु 1765 में उठाये गये कदमों ने इस संकट को जल्दी बुला लिया, लेकिन इस संकट को तो आना ही था जब तक कि इंग्लैंड उपनिवेशों के प्रति अपना दृष्टिकोण न बदलता।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-1

इंग्लैंड की पराजय के कारण

ब्रिटेन एक अजेय राष्ट्र माना जाता था और प्रारंभ में इंग्लैंड को विजय भी मिली थी, किंतु अंततः अमेरिकी उपनिवेशों के हाथों उसकी हार हुई। अमेरिकनों का अंग्रेजों के सामने कोई अस्तित्व नहीं था, फिर भी उपनिवेशों की विजय हुई। इसके पीछे अनेक कारणों के साथ-साथ ‘प्रकृति, फ्रांस और जॉर्ज वाशिगंटन’ की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इंग्लैंड की पराजय और अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम की सफलता के कुछ अन्य प्रमुख कारण इस प्रकार थे-

  1. अमेरिका की शक्ति का गलत अनुमान: अमेरिका की साधन संपन्नता का अंग्रेजों को अनुमान नहीं था। अमेरिका में कृषि, उद्योग का विकास हो चुका था और उपनिवेश समृद्धिशाली थे। उपनिवेश के लोग स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कितने दृढ संकल्प थे, इसका अनुमान भी अंग्रेजों को नहीं था। अंग्रेजों का विश्वास था कि उपनिवेशवासी अंग्रेजी सेनाओं का सामना नहीं कर पायेंगे। वे अमेरिका के स्वाधीनता युद्ध को विद्रोह मात्र समझते रहे। अंग्रेज सेनापति गेज का मत था कि इस विद्रोह का दमन करने के लिए चार ब्रिटिश रेजीमेंटें पर्याप्त थीं। यह गलत अनुमान अंग्रेजों की पराजय का कारण था।
  2. अमेरिका की इंग्लैंड से दूरी: भौगोलिक रूप से अमेरिका, इंग्लैंड से 3,000 मील दूर है। इंग्लैंड को अपनी सेनाएँ तथा रसद-सामग्री अटलांटिक महासागर को पार करके भेजनी पड़ती थी। अमेरिका में भी उन्हें लगभग 1,000 मील के जंगलों को पार करना पड़ता था। दूसरी ओर अमरीकावासी अपने देश में ही लड़ रहे थे और उनको संचार, यातायात की समस्या नहीं थी। अमेरिकी तट इतना अधिक विस्तृत था कि ब्रिटिश नौसेना प्रभावहीन हो गई और इंग्लैंड के यूरोपीय शत्रुओं उपनिवेशवासियों का पक्ष लिया और युद्ध क्षेत्र और भी विस्तृत हो गया।
  3. इंग्लैंड का अकेला होना: प्रारंभ में इंग्लैंड की स्थिति संतोषजनक थी, लेकिन जब युद्ध लंबा खिंचने लगा और उपनिवेश के लोगों ने साहस और दृढ़ता से अंग्रेजी सेनाओं का सामना किया, तब उन्हें यूरोप के अन्य देशों का भी समर्थन मिलने लगा। इंग्लैंड के पुराने शत्रु फ्रांस, स्पेन और हालैंड अपना पुराना हिसाब चुकता करने के लिए युद्ध में कूद पड़े। अन्य यूरोपीय देशों, जैसे-डेनमार्क, स्वीडेन, रूस ने भी सशस्त्र तटस्थ संघ बना लिये और उपनिवेशों की हरसंभव सहायता की। इस प्रकार इंग्लैंड अकेला रह गया और उसकी पराजय निश्चित हो गई।
  4. अंग्रेजी सेना के अयोग्य सेनापति: उपनिवेशों की सेना में उत्साह, साहस और दृढ़ता थी। उनके सेनापति योग्य और दृढ-संकल्प के धनी थे। ब्रिटिश सेना एक आक्रमणकारी विदेशी सेना की तरह जनता विरोध कर रही थी। अंग्रेज सेनापति होय और बरगोयने में परस्पर सहयोग का अभाव था। ब्रिटिश युद्धमंत्री जर्मेन भी अयोग्य था। उसने इस बात की कभी चिंता नहीं की कि अंग्रेजों की अमरीका में क्या स्थिति है? कहा जाता है कि वह अमेरिका से आई डाक को खोलने का भी कष्ट नहीं करता था। उसने ‘पिट दि एल्डर’ की योजना के अनुसार फ्रांसीसी बेड़े को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, जिससे अमरीकी उपनिवेशों को समय से विदेशी सहायता मिल गई और कॉर्नवालिस को हथियार डालने पड़े।
  5. जार्ज तृतीय का चरित्र: जॉर्ज तृतीय अहंकारी और जिद्दी शासक था। यह स्वयं शासन करना चाहता था और मंत्रियों के परामर्श की अवहेलना करता था। उसकी व्यक्तिगत नीतियों और अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण ही ब्रिटेन को पराजित होना पड़ा था। उस समय सबसे योग्य और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ चैथम था, लेकिन जॉर्ज तृतीय ने उससे परामर्श नहीं किया और अपनी अदूरदर्शी नीति पर चलता रहा। उसके मंत्रियों में विवेक से कार्य करने की योग्यता नहीं थी। क्लेरटाउन जैसे योग्य सेनापति को हटाकर बरगोयने को सेनापति नियुक्त किया जाना आत्मघाती साबित हुआ। जॉर्ज तृतीय की हठधर्मिता के कारण ही उपनिवेशों से कोई समझौता नहीं हो सका, इसलिए अमेरिकन उपनिवेशों को खोने के लिए जॉर्ज तृतीय को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना गया।
  6. इंग्लैंड में राजनीतिज्ञों का अभाव: अमेरिका के उपनिवेशों के प्रति किस प्रकार की नीति अपनाई जाये, इस संबंध में इंग्लैंड के राजनीतिज्ञों और जनता में एकमत नहीं था। जॉर्ज तृतीय ने अपने निरंकुश शासन को स्थापित करने के लिए ह्विग और टोरी दलों के मतभेदों तथा द्वेषों का लाभ उठाया। इंग्लैंड की जनता को जॉर्ज तृतीय पर विश्वास नहीं था। इंग्लैंड में लॉर्ड चैथम और एडमंड बर्क जैसे बहुत से लोग अमेरिकन उपनिवेशों की स्वतंत्रता के समर्थक थे। एडमंड बर्क ने कहा था, ‘मैं अमेरिका के विरोध से संतुष्ट हूँ। अन्याय और अत्याचार के कारण अमेरिकी पागल हो उठे हैं। क्या अंग्रेज इस पागलपन के लिए उन्हें सजा देंगे जिसका बीजारोपण अंग्रेजों ने ही किया है।’ किंतु जॉर्ज ने इस विवेकपूर्ण सलाह की उपेक्षा की। इस समय इंग्लैंड में योग्य राजनीतिज्ञ लॉर्ड चैथम था, लेकिन वह अपनी अस्वस्थता के कारण इंग्लैंड की युद्धनीति का संचालन करने में असमर्थ था। लॉर्ड नार्थ, रॉकिंघम, शेलबोर्न साधारण योग्यता के राजनीतिज्ञ थे, जो संकट का वास्तविक रूप समझने में असमर्थ रहे और बार-बार गलतियाँ करते रहे।
  7. इंग्लैंड की शक्ति का विभाजन: इस समय इंग्लैंड की सैनिक शक्ति भारत, आयरलैंड तथा यूरोप में बँटी हुई थी। भारत में फ्रांसीसियों की सहायता से हैदरअली अंग्रेजों से निपटने की तैयारी कर रहा था। आयरलैंड में भी विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेजी सेना की आवश्यकता थी। यूरोप में भी फ्रांस और स्पेन के आक्रमण का भय था। अतः अंग्रेज अपनी पूरी शक्ति अमेरिकी उपनिवेशों के विरुद्ध नहीं लगा सके।
  8. आदर्शों में भिन्नता: दोनों पक्षों के आदशों में अंतर था। उपनिवेश का प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता के आदर्श से प्रेरित था और इसके लिए संघर्ष तथा बलिदान के लिए तैयार था। इस प्रकार का उच्च आदर्श अंग्रेजों में नहीं था। वे साम्राज्यवाद के लिए युद्ध कर रहे थे और उपनिवेशों को गुलाम बनाकर रखना चाहते थे। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों की पराजय निश्चित थी।
  9. जॉर्ज वाशिंगटन का नेतृत्व: अंग्रेजों की पराजय का एक प्रमुख कारण जॉर्ज वाशिंगटन का असाधारण व्यक्तित्व था। उपनिवेश अपनी स्वतंत्रता के लिए कृत संकल्प थे, लेकिन सौभाग्य से उन्हें वाशिंगटन जैसा योग्य नेतृत्व मिल गया। उसने उपनिवेशों में एकता स्थापित की और सैनिकों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरणा दी। वाशिंगटन दृढ़-निश्चय और उच्च चरित्र का व्यक्ति था। वह क्रामवेल की तरह योग्य सेनापति था। उसने निराशापूर्ण परिस्थितियों में भी बड़े धैर्य और साहस के साथ संकटों का सामना किया और अंततः विजय प्रापत की। रेम्जे म्योर ने लिखा है कि, ‘वाशिंगटन के नेतृत्व ने उपनिवेशवासियों के मन में विश्वास और साहस को उत्पन्न किया जिसके कारण उन्हें इस महान् और दुष्कर संघर्ष में अंतिम विजय प्राप्त हुई।’

मौर्योत्तरकालीन समाज, धार्मिक जीवन, कलात्मक एवं साहित्यिक विकास

अमेरिका के स्वातंत्र्य युद्ध का परिणाम और प्रभाव

आधुनिक मानव की प्रगति में अमेरिका की क्रांति एक सीमाचिन्ह है। ग्रीन के अनुसार ‘अमेरिका के स्वतंत्रता युद्ध का महत्व इंग्लैंड के लिए चाहे कुछ भी क्यों न हो, परंतु विश्व इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना है।’ वास्तव में अमेरिका के स्वातंत्र्य युद्ध के अनेक तात्कालिक तथा दूरगामी परिणाम सामने आये। इसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि इससे संयुक्त राज्य अमेरिका नाम के एक नये राष्ट्र का उत्थान हुआ। इस स्वतंत्रता संग्राम के अन्य महत्वपूर्ण परिणाम इस प्रकार थे-

अमेरिका पर प्रभाव

प्रजातांत्रिक राष्ट्र की स्थापना: अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का महत्व इस बात में नहीं है कि स्पेन या फ्रांस को क्षेत्रीय लाभ हुए या हॉलैंड को व्यापारिक हानि हुई। इसका महत्व इस बात में है कि इस युद्ध से अमेरिकन क्रांति की सफलता सुनिश्चित हो गई और इससे संभवतः अप्रत्यक्ष रूप से राजाओं के देवी अधिकार तथा अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों का अंत हुआ। प्रजातंत्र की स्थापना में अमेरिकन स्वातंत्र्य युद्ध ने प्यूरिटन क्रांति (1649) और शानदार क्रांति (1688) का कार्य पूरा कर दिया। स्वतंत्रता के बाद इन उपनिवेशों ने अपने देश में प्रजातांत्रिक शासन का संगठन किया और इस प्रकार पूरे विश्व में प्रजातंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस स्वतंत्रता संग्राम ने जनता के प्रभुसत्ता के सिद्धांत और मनुष्य के मौलिक अधिकारों को स्पष्ट रूप से स्थापित किया।

नये संयुक्त राज्य अमेरिका ने विश्व के समक्ष चार नये राजनीतिक आदर्श- गणतंत्र, जनतंत्र संघवाद और संविधानवाद को प्रस्तुत किया। यद्यपि ये सिद्धांत विश्व में पहले भी प्रचलित थे, किंतु अमेरिका ने इसे व्यवहार में लाकर एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया।

गणतंत्र की स्थापना अमेरिकी क्रांति की सबसे बड़ी देन थी। अमेरिका में प्रतिनिधि सरकार की स्थापना हुई, लिखित संविधान का निर्माण हुआ और संघात्मक शासन-व्यवस्था की स्थापना की गई।

पुरातन व्यवस्था का अंत: अमेरिका के उपनिवेशों ने पुरातन व्यवस्था पर आधारित प्रशासन को परिवर्तित कर दिया। उपनिवेश अब स्वतंत्र राज्य थे। इन राज्यों में गवर्नरों का निर्वाचन होता था। राज्यों में व्यापक मताधिकार था और मतदाताओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले, इसकी भी व्यवस्था की गई। अधिकारों की घोषणा से उपनिवेश के निवासियों में नवीन राजनीतिक चेतना पैदा हुई और स्वतंत्रता का महत्व समझा गया। अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए उपनिवेशों ने संयुक्त राज्य अमेरिका को औपचारिक रूप देकर सुदृढ़ किया, संघ को स्थायी रखा और संविधान का निर्माण किया।

धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना: आधुनिक इतिहास में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में ही पहली बार धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना हुई। नये संविधान के अनुसार चर्च को राज्य से अलग कर दिया गया। अब कांग्रेस को अधिकार नहीं था कि वह किसी धर्म को राज्यधर्म घोषित करे या किसी धर्म के स्वतंत्र पालन पर कोई प्रतिबंध लगाये।

सामाजिक प्रभाव: क्रांति के परिणामस्वरूप अमेरिकी जनता को एक परिवर्तित सामाजिक व्यवस्था प्राप्त हुई जिसमें मानवीय समानता पर विशेष बल दिया गया। स्त्रियों को संपत्ति पर पुत्र के समान उत्तराधिकार प्राप्त हुआ और उनकी शिक्षा के लिए स्कूलों की स्थापना की गई। इस तरह उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ। क्रांति से मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ी।

आर्थिक प्रभाव: क्रांति ने आर्थिक क्षेत्र में मूलतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विकास को प्रोत्साहित किया। खनिज और वन साधनों पर से राजशाही स्वामित्व समाप्त हो गया, जिससे साहसिक वर्ग ने इनका स्वतंत्रतापूर्वक देश के आर्थिक विकास के लिए प्रयोग किया। कृषि के क्षेत्र में भी सुधार हुआ। वस्तुतः युद्धकाल में आये विदेशियों से यूरोप के कृषि सुधारों के संदर्भ में अमेरिका को जानकारी प्राप्त हुई और अभी तक जो कृषि मातृदेश के हित का साधन बनी थी, अब वह स्वतंत्र राष्ट्र के विकास का मूलाधार हो गई। क्रांति से अमेरिकी उद्योग धंधे भी दो तरीकों से लाभान्वित हुए-एक, अंग्रेजों द्वारा लगाये गये व्यापारवादी प्रतिबंधों से अमेरिकी उद्योग मुक्त हो गये और दूसरा, युद्धकाल में इंग्लैंड से वस्तुओं का आयात बंद हो जाने के कारण अमेरिकी उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन मिला। स्वतंत्रता के पश्चात् अमेरिकी बंदरगाहों को विश्व व्यापार के लिए खोल दिया गया, जिससे व्यापार में वृद्धि हुई।

फ्रांस की पुरातन व्यवस्था

इंग्लैंड पर प्रभाव

जॉर्ज तृतीय के शासन का अंत: इंग्लैंड में इस असफलता के लिए जॉर्ज तृतीय एवं प्रधानमंत्री लॉर्ड नार्थ दोनों को उत्तरदायी ठहराया गया। राज्यारोहण के बाद से ही जॉर्ज तृतीय राज्य की पार्लियामेंट की उपेक्षा कर सत्ता को निरंकुश बनाने का प्रयास करता रहा था और उसकी नीतियों के कारण ही अमेरिकन उपनिवेशों में विद्रोह हुआ था। अतः पार्लियामेंट की शक्ति में वृद्धि की माँग उठी और एक सदस्य डनिंग ने प्रस्ताव रखा कि, ‘राजा का अधिकार बढ़ गया है, बढ़ रहा है और उसका कम होना आवश्यक है।’ राजा के अधिकारों को सीमित करने का यह प्रस्ताव पारित किया, लॉर्ड नार्थ को प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा और इसके साथ ही जॉर्ज तृतीय के व्यक्तिगत शासन का अंत हो गया। इस प्रकार इंग्लैंड में वैधानिक विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ।

इंग्लैंड की औपनिवेशिक नीति में परिवर्तन: कुछ विद्वानों का मानना है कि युद्ध इंग्लैंड के लोगों की अज्ञानता के कारण ही हुआ था और इसकी असफलता के लिए राजा या उसके मंत्रियों को उत्तरदायी ठहराना उचित नहीं है। अमेरिका को खोने के लिए मुख्यतः इंग्लैंड की जनता उत्तरदायी थी, जो उपनिवेशों के विरुद्ध शक्तिशाली कानून चाहते थे और उपनिवेशों की स्वतंत्रता का विरोध करते थे। अमेरिकन उपनिवेशों के हाथ से निकल जाने से इंग्लैंड की औपनिवेशिक नीति की असफलता स्पष्ट हो चुकी थी, इसलिए इंग्लैंड के राजनीतिज्ञों ने उपनिवेशों के प्रति नीति में परिवर्तन की माँग की। ब्रिटिश सरकार ने भी अनुभव किया यदि शेष बचे हुए उपनिवेशों को अपने अधीन रखना है तो उसे औपनिवेशिक शोषण की नीति को छोड़ना होगा और उपनिवेशों की जनता के अधिकारों एवं माँगों का सम्मान करना होगा। फलतः उपनिवेशों की प्रशासन व्यवस्था में भी परिवर्तन किये गये। 1843 ई. की डरतम रिपोर्ट में इंग्लैंड के इस नवीन औपनिवेशिक दृष्टिकोण और प्रशासनिक परिवर्तन को व्यक्त किया गया। इस परिवर्तित नीति के आधार पर ही बाद में ब्रिटिश सरकार ने ‘ब्रिटिश राष्ट्रमंडल’ की स्थापना की।

इंग्लैंड द्वारा नये उपनिवेशों की स्थापना: अमेरिकी उपनिवेशों के स्वतंत्र हो जाने से इंग्लैंड के औपनिवेशिक साम्राज्य को ठेस पहुँची। अपनी खोई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने एवं व्यापारिक हितों को सुरक्षित करने हेतु नये क्षेत्रों में उपनिवेशीकरण का प्रयास किया और इसी संदर्भ में आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड में नये ब्रिटिश उपनिवेशों की स्थापना हुई।

वाणिज्यवादी सिद्धांत का परित्याग: यह सही है कि उपनिवेशों के छिन जाने के बाद इंग्लैंड के व्यापार-वाणिज्य की बड़ी हानि हुई थी। किंतु कुछ ही वर्षों बाद इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका में पहले से भी अधिक व्यापार होने लगा, जिससे अधिकांश देशों का ‘वाणिज्य सिद्धांत’ से विश्वास उठ गया। स्वयं इंग्लैंड ने भी इस नीति का परित्याग कर दिया और मुक्त व्यापार की नीति को स्वीकार कर लिया।

इंग्लैंड के प्रभाव में वृद्धि: यद्यपि इंग्लैंड के विरुद्ध उपनिवेशों ने शानदार सफलता प्राप्त की थी। उन्होंने सैनिक तथा कूटनीति दोनों क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की थी। उनकी इस सफलता ने अप्रत्यक्ष रूप से इंग्लैंड के प्रभाव में भी वृद्धि की क्योंकि अमेरिका में भी अंग्रेजों का ही राष्ट्र था। अब अटलांटिक महासागर के दोनों ओर अंग्रेजी राष्ट्र थे।

आयरलैंड पर प्रभाव: अमेरिकी क्रांति का प्रभाव आयरलैंड पर भी पड़ा। अमेरिका के उपनिवेशों के समान आयरलैंड के लोग भी इंग्लैंड के विरूद्ध अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे। अमेरिकी क्रांति ने उन्हें स्वतंत्र रूप से प्रेरणा प्रदान की। अमेरिकी नारा ‘प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं’ आयरलैंड में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। अमेरिका की स्वतंत्रता के बाद इंग्लैंड के राजनीतिज्ञों ने उदारता की नीति अपनाई और 1782 में आयरलैंड की संसद को वैधानिक स्वतंत्रता अर्थात कानून बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की। कैथोलिकों पर जो अयोग्यताएँ लगाई गई थीं, उनमें भी शिथिलता बरती गई। यद्यपि वे पार्लियामेंट के सदस्य नहीं बन सकते थे, फिर भी, उन्हें मताधिकार दिया गया।

भारत पर प्रभाव: अमेरिकी क्रांति का भारत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के समय फ्रांस के युद्ध में शामिल होने से भारत में भी आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध की स्थिति पैदा हो गई, जिसका लाभ उठाकर अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों की शक्ति क्षति नष्ट कर अपने साम्राज्य-विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। एक अन्य दृष्टिकोण से भी अमेरिकी क्रांति का भारत पर प्रभाव पड़ा। अमेरिकी क्रांति के अनेक कारणों में एक कारण यह भी था कि आरंभ में इंग्लैंड ने अमेरिकी उपनिवेशों के शासन में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया था, जिसके कारण अमेरिकी उपनिवेशवासियों में स्वातंत्र्य चेतना एवं स्वशासन की पद्धति का विकास हो गया था और जब उसमें हस्तक्षेप किया गया तो असंतोष पैदा हुआ। ब्रिटेन ने इस स्थिति से सीख लेकर भारतीय उपनिवेश के आंतरिक मामलों सक्रिय हस्तक्षेप किया और यहाँ के निवासियों की स्वतंत्रता को सीमित रखा। दूसरे शब्दों में, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटेन को एक साम्राज्य से तो वंचित कर दिया, लेकिन एक दूसरे साम्राज्य की नींव को मजबूत कर दिया। इसके अलावा, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी स्वेच्छाचारिता और अत्याचार न कर सके, इसके लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल स्थापित किया गया और 1784 में पिट्स अधिनियम पारित किया गया।

फ्रांस पर प्रभाव: अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का दूरगामी परिणाम फ्रांस की क्रांति के रूप में प्रकट हुआ। फ्रांसीसी सैनिक अमेरिका गये थे जहाँ उन्होंने अमेरिकन सेनाओं के साथ अंग्रेजी सेनाओं से युद्ध किया था। जब सैनिक लौट कर आये तो वे भी क्रांतिकारी भावनाओं से प्रभावित थे। उन पर भी अमेरिकी समानता, स्वतंत्रता, मानव अधिकारों का प्रभाव था। लफायत जैसे सैनिकों ने अमेरिकी क्रांति की भावना को फ्रांसीसी जनमानस तक पहुँचाया। इतिहासकार हेज के अनुसार, ‘स्वतंत्रता की यह मशाल जो अमेरिका में जली और जिसके फलस्वरूप गणतंत्र की स्थापना हुई, का फ्रांस में तीव्र प्रभाव पड़ा और इसने फ्रांस को क्रांति के मार्ग की ओर प्रेरित किया।’

अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का दूरगामी परिणाम फ्रांस की क्रांति के रूप में प्रकट हुआ। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण फ्रांस का खजाना खाली हो गया और देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो गई। फलतः फ्रांस में भीषण आर्थिक संकट पैदा हुआ, जिसके कारण छः वर्ष बाद ही फ्रांस में क्रांति हो गई।

इसके अलावा, 1783 की पेरिस की संधि के अनुसार फ्रांस को टोबेगो तथा सेनीगल के प्रदेश प्राप्त हुए, जिससे फ्रांस की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हो गई। फ्रांस ने 1763 के सप्तवर्षीय युद्ध में अपनी पराजय का बदला भी इंग्लैंड से ले लिया।

इस प्रकार अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम मानव इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। इस स्वातंत्र्य युद्ध के फलस्वरूप नई दुनिया में न केवल एक नये राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरिका का जन्म हुआ, बल्कि मानव जाति की प्रगति की दृष्टि से भी एक नये युग का सूत्रपात हुआ।

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